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एक देश, एक चुनाव! क्या बदलेगा भारत का चुनावी सिस्टम और क्यों हो रही है इतनी बहस?

One Nation One Election : जानिए 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (ONOE) क्या है, यह कैसे लागू होगा और इसके क्या फायदे व संवैधानिक चुनौतियां हैं। रामनाथ कोविंद समिति की सिफारिशों से लेकर 2029 के रोडमैप का पूरा विश्लेषण पढ़ें।
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Jul 25, 2026
One Nation One Election
One Nation One Election : क्या देश में 2029 में होंगे एक साथ चुनाव, PC- Patrika

One Nation One Election : भारत में पिछले कुछ वर्षों से 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (ONOE) पर चर्चा तेज है। इसका मतलब है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं, ताकि देश में बार-बार चुनाव कराने की जरूरत न पड़े। केंद्र सरकार ने रामनाथ कोविंद समिति की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है, संसद में विधेयक पेश हो चुका है, और अब लक्ष्य 2029 के आम चुनाव तक इसे लागू करने का रखा जा रहा है।

अभी भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। किसी राज्य की सरकार का कार्यकाल खत्म होते ही वहां चुनाव कराए जाते हैं। नतीजा यह है कि देश लगभग स्थायी रूप से 'चुनावी मोड' में रहता है।

'वन नेशन, वन इलेक्शन' से होंगे यह बदलाव

  • लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे।
  • बाद के चरण में पंचायत और नगर निकाय चुनाव भी इसी चक्र से जोड़े जा सकते हैं।
  • मतदाता एक ही अवधि में लोकसभा और विधानसभा के लिए वोट डालेंगे (हालांकि मतदान देशभर में अलग-अलग चरणों में हो सकता है)।

पहले भी होता था ऐसा?

बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी के बाद भारत में शुरुआत में चुनाव लगभग एक साथ ही होते थे।

  • 1951-52
  • 1957
  • 1962
  • .1967

संविधान लागू होने के बाद पहले चार आम चुनावों (1952, 1957, 1962, 1967) में लोकसभा और लगभग सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे। लेकिन 1968-69 में कई राज्य सरकारें समय से पहले गिर गईं, और 1970 में चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग हो गई। जिससे 1971 में नए सिरे से राष्ट्रीय चुनाव कराने पड़े और चुनावी कैलेंडर हमेशा के लिए अलग-अलग हो गया।

सालघटनाक्रम
1983चुनाव आयोग की रिपोर्ट में चुनावी खर्च और प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की गई।
1999विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (जस्टिस बी.पी. जीवन रेड्डी) ने समकालिक चुनावों के पक्ष में सुझाव दिए।
2015संसदीय स्थायी समिति ने बार-बार लगने वाली आचार संहिता और चुनावी खर्च को बड़ी चुनौती बताते हुए एक साथ चुनाव पर विचार करने की सिफारिश की।
2017नीति आयोग के डिस्कशन पेपर में चरणबद्ध तरीके से लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समकालिकरण का प्रस्ताव रखा गया।
2018विधि आयोग के मसौदा पत्र में "रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव" (Constructive Vote of No Confidence) जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सरकार गिरने पर भी चुनावी चक्र न टूटे।
2023–24पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समिति (HLC) गठित की गई, जिसने चरणबद्ध तरीके से "वन नेशन, वन इलेक्शन" लागू करने की सिफारिश की।
18 सितंबर 2024केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोविंद समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी।
दिसंबर 2024संविधान (129वां संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक लोकसभा में पेश किए गए। विपक्ष के विरोध के बाद इन्हें संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया।
मार्च 2025 – मार्च 2026संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का कार्यकाल कई बार बढ़ाया गया और मामले की विस्तृत समीक्षा जारी रही।
जुलाई 2026JPC अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने कहा कि 2029 के आम चुनाव तक "वन नेशन, वन इलेक्शन" लागू करने के लिए आवश्यक तंत्र तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

कैसे होंगे चुनाव?

कोविंद समिति की सिफारिश के अनुसार इसे दो चरणों में लागू किया जा सकता है। चरण 1 में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ। चरण 2 में पंचायत और नगर निकाय चुनाव लोकसभा-विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के भीतर होंगे। इसके लिए एक साझा मतदाता सूची (Common Electoral Roll) और एक समान EPIC (मतदाता पहचान पत्र) का भी प्रस्ताव है।

अनुच्छेद 82A और 'अपूर्ण कार्यकाल' नियम

129वें संशोधन विधेयक में एक नया अनुच्छेद 82A जोड़ने का प्रस्ताव है। इसके तहत राष्ट्रपति एक 'नियत तारीख' (नई लोकसभा की पहली बैठक) अधिसूचित करेंगे, जिसके बाद नई चुनी गई सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल घटाकर या बढ़ाकर लोकसभा के पांच साल के कार्यकाल के साथ मिला दिया जाएगा।

अगर सरकार बीच में गिर गई तो?

यही सबसे बड़ा सवाल है। अनुच्छेद 83 और 172 में प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, अगर लोकसभा या किसी राज्य विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले खत्म हो जाता है, तो नए चुनाव पूरे पांच साल के लिए नहीं बल्कि सिर्फ 'बचे हुए कार्यकाल' (unexpired term) के लिए होंगे। ताकि अगला चुनाव फिर राष्ट्रीय चक्र के साथ ही जुड़ा रहे। इसके अलावा, चुनाव आयोग (ECI) को यह विवेकाधिकार भी मिलेगा कि वह स्थानीय हालात के आधार पर किसी राज्य का चुनाव टालने की सिफारिश कर सके। भले ही उस विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के साथ ही खत्म हो।

संवैधानिक और कानूनी पेच

आधारभूत ढांचा सिद्धांत: 1973 के केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसदीय लोकतंत्र और स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव संविधान के 'आधारभूत ढांचे' का हिस्सा हैं, जिन्हें सामान्य संशोधन से भी नहीं बदला0 जा सकता। आलोचकों का तर्क है कि विधानसभाओं का कार्यकाल घटाना-बढ़ाना अनुच्छेद 83 और 172 में मौजूद "no longer" (पांच साल से ज्यादा नहीं) वाले प्रावधान से सीधे टकराता है, जो संविधान सभा ने जानबूझकर बिना नए जनादेश के कार्यकाल बढ़ने से रोकने के लिए रखा था।

चुनाव आयोग की शक्ति पर सवाल: पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने चुनाव टालने के ECI के विवेकाधिकार को "अनियंत्रित" बताते हुए कहा है कि यह अनुच्छेद 14 (समानता) और आधारभूत ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन कर सकता है, और परोक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति बना सकता है। इससे पहले पूर्व CJI यू.यू. ललित, डी.वाई. चंद्रचूड़ और जे.एस. खेहर भी इस पर चिंता जता चुके हैं।

एक साथ चुनाव होने से क्या फायदे होंगे

चुनावी खर्च और वित्तीय घाटे में कमी

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (CMS) के अनुसार 2024 के आम चुनाव पर करीब ₹1.35 लाख करोड़ खर्च हुए — 2019 के ₹60,000 करोड़ से दोगुने से ज्यादा। JPC का दावा है कि एक साथ चुनाव कराने से सुरक्षा बलों की आवाजाही, खरीद और व्यवस्था के दोहराव से बचकर लगभग ₹7 लाख करोड़ तक बचाए जा सकते हैं।

बार-बार आचार संहिता का झंझट नहीं

हर चुनाव के साथ 45-60 दिनों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होती है, जिसमें नई परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों पर रोक लग जाती है। कई राज्यों में साल के 4-6 महीने प्रशासन इसी रोक में बीत जाते हैं।

शासन और प्रशासनिक व्यवस्था पर ज्यादा फोकस

चुनाव के दौरान जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी और नौकरशाही का बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग के अधीन आ जाता है, जिससे नियमित प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है। साथ ही, लाखों सरकारी शिक्षकों को भी बार-बार चुनाव ड्यूटी में लगाया जाता है जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है।

सुरक्षा बलों की थकान कम होगी

बार-बार अलग-अलग राज्यों में केंद्रीय सुरक्षा बलों (CRPF, BSF, CISF आदि) को ट्रांसपोर्ट करना पड़ता है, जिससे उन पर लगातार दबाव रहता है। एक साथ चुनाव होने पर एक ही समन्वित तैनाती योजना बनाई जा सकती है।

वोटर टर्नआउट बढ़ सकता है

समर्थकों का तर्क है कि बार-बार मतदान केंद्र जाने की जरूरत खत्म होने से मतदान प्रतिशत बढ़ सकता है, खासकर प्रवासी मजदूरों के लिए जिन्हें एक ही बार अपने गृह क्षेत्र जाना पड़ेगा।

संभवत: क्या हो सकते हैं नुकसान

क्षेत्रीय मुद्दे और दल दब सकते हैं

आलोचकों का कहना है कि जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं, तो मतदाता अक्सर दोनों स्तरों पर एक ही बड़ी राष्ट्रीय पार्टी को चुनते हैं (वेव इफेक्ट)। इससे सड़क, पानी, बिजली, स्थानीय रोजगार जैसे स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में दब सकते हैं, और क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंच सकता है।

संघीय ढांचे पर गहरी बहस

कांग्रेस, AAP, TMC, CPI(M) समेत ज्यादातर विपक्षी दलों का कहना है कि यह प्रस्ताव राज्यों की स्वायत्तता और संघवाद पर सीधा हमला है। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने इसे "भारत एक संघ है" के सिद्धांत पर हमला बताया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने इसे लागू करना व्यावहारिक रूप से असंभव बताया। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दलों (AIADMK, BJD, JD(U), शिवसेना, अकाली दल) का तर्क है कि इससे संघीय ढांचे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि 1952-67 के दौर में भी यह व्यवस्था सफलतापूर्वक चली थी।

आर्थिक तर्कों पर भी सवाल

कोविंद समिति के अध्ययन में दावा किया गया है कि एक साथ चुनाव से GDP वृद्धि दर में करीब 1.6% तक इजाफा हो सकता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह दावा इतिहास से मेल नहीं खाता। 1952-67 का 'एक साथ चुनाव' दौर धीमी वृद्धि (हिंदू विकास दर, ~3.5%) का दौर था, जबकि 2003-2011 की तेज़ वृद्धि (8-9%) अलग-अलग चुनावों के दौर में हुई। आलोचकों के अनुसार चुनाव पर सरकारी खर्च कुल बजट का 0.1% से भी कम है। असली समस्या राजनीतिक फंडिंग का अघोषित 'काला धन' है (अकेले 2024 के लोकसभा चुनाव में अनुमानित ₹1 लाख करोड़ से ऊपर), जिसे ONOE हल नहीं करेगा, सिर्फ एक ही समय पर केंद्रित कर देगा।

लागू करना आसान नहीं

28 राज्य, 8 केंद्र शासित प्रदेश और लाखों मतदान केंद्रों वाले इतने बड़े देश में एक साथ चुनाव के लिए चुनाव आयोग के अनुमान के अनुसार करीब 46.75 लाख बैलट यूनिट, 33.63 लाख कंट्रोल यूनिट और 36.62 लाख VVPAT मशीनों की जरूरत होगी — जिनके रखरखाव पर हर 15 साल में करीब ₹10,000 करोड़ का खर्च आएगा। साथ ही सभी मतदान केंद्रों पर एक साथ सुरक्षा बल तैनात करना भी बड़ी चुनौती होगी।

दुनिया के कौन-कौन से देशों में ऐसी व्यवस्था है?

पूरी तरह यह मॉडल बहुत कम देशों में है, लेकिन कई देशों में राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ या तय चक्र में कराए जाते हैं।

  • दक्षिण अफ्रीका - राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ होते हैं।
  • स्वीडन - राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय चुनाव एक ही दिन कराए जाते हैं।
  • बेल्जियम - कई स्तरों के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था है।
  • इंडोनेशिया - राष्ट्रपति, संसद और कई अन्य चुनाव एक ही चुनावी चक्र में कराए जाते हैं।

हालांकि भारत की जनसंख्या और संघीय संरचना इन देशों की तुलना में कहीं अधिक जटिल है।

एक नजर में...

सवालजवाब
वन नेशन, वन इलेक्शन क्या है?लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना
पहले भारत में ऐसा हुआ है?हां, 1951 से 1967 तक
सरकार गिर गई तो?सिर्फ बचे हुए कार्यकाल के लिए ही चुनाव
मुख्य फायदाखर्च, चुनावी व्यवधान और प्रशासनिक बोझ में कमी
मुख्य चिंताक्षेत्रीय मुद्दों, दलों, संघवाद और आधारभूत ढांचे पर असर
कैबिनेट मंजूरी18 सितंबर 2024
विधेयक कब पेश हुआ?दिसंबर 2024 (129वां संविधान संशोधन विधेयक)
अभी स्थितिJPC के पास लंबित, कार्यकाल मानसून सत्र 2026 तक बढ़ाया गया
लागू होने का लक्ष्य2029 का आम चुनाव (JPC प्रमुख का बयान, जुलाई 2026)
कानून बनने के लिए क्या चाहिए?संसद में दो-तिहाई विशेष बहुमत + स्थानीय निकाय जोड़ने के लिए कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी
Updated on:
25 Jul 2026 11:37 am
Published on:
25 Jul 2026 11:37 am