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कैंसर के खिलाफ AI की ‘सुपर-मिसाइल’: अब सालों का इंतजार खत्म, महज कुछ हफ्तों में तैयार होंगी ट्यूमर-किलर सेल्स!

Immunotherapy: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया है जो मात्र 4 से 6 हफ्तों में कैंसर से लड़ने वाले विशेष प्रोटीन तैयार कर सकता है। यह तकनीक मरीज की अपनी टी-कोशिकाओं को सुपर-चार्ज करके बिना किसी गंभीर साइड-इफेक्ट के ट्यूमर को सटीक रूप से नष्ट करती है।
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भारत

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MI Zahir

Jul 25, 2026

Cancer treatment News.

वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज का एक नया तरीका निकाला है। (विजुअल: Google Gemini AI.)

AI Cancer Immunotherapy T Cells: कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के इलाज में विज्ञान ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। अब तक जिस कैंसर इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy) को तैयार करने में वैज्ञानिकों को बरसों का लंबा समय लग जाता था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानि AI की मदद से वह काम अब महज 4 से 6 हफ्तों में संभव हो सकेगा। रिसर्चर्स ने एक ऐसा अनूठा एआई प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जो मरीज की अपनी ही इम्यून सेल्स को अत्यधिक सटीक 'कैंसर-किलर' में बदल देता है। यह नई तकनीक न केवल समय की बचत करेगी, बल्कि कैंसर के इलाज को पहले से कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाएगी।

एआई ने कैंसर सेल्स को कैसे सुपर सैनिक बनाया, विजुअल से जानिए। (विजुअल: Google Gemini AI.)

आखिर क्या है यह पूरी तकनीक ?

रिसर्च के अ​नुसार हमारे शरीर के अंदर बीमारियों से लड़ने के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र होता है जिसे प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) कहते हैं। इस प्रणाली में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका टी-कोशिकाएं (T-Cells) निभाती हैं। टी-कोशिकाएं हमारे शरीर के सिपाही की तरह होती हैं जो वायरस, बैक्टीरिया और असामान्य कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें खत्म करती हैं। हालांकि, कैंसर कोशिकाएं बहुत चालाक होती हैं। वे अक्सर अपनी बनावट बदलकर टी-कोशिकाओं से छुप जाती हैं, जिससे शरीर का सुरक्षा तंत्र उन्हें पहचान नहीं पाता।

एआई का जादू: 'आणविक चाबी' (Molecular Key)

रिसर्चर्स विकसित एआई प्लेटफॉर्म एक 'आणविक चाबी' या 'डिजाइनर प्रोटीन' तैयार करता है। यह प्रोटीन टी-कोशिकाओं के ऊपर एक गाइड की तरह फिट हो जाता है। इसे PMHC (peptide-MHC) अणुओं को लक्षित करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो कैंसर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद होते हैं। जैसे ही यह प्रोटीन टी-कोशिका में डाला जाता है, टी-कोशिका को कैंसर का सटीक ठिकाना मिल जाता है और वह बिना किसी चूक के सीधे कैंसर कोशिकाओं पर हमला कर देती है।

इम्पैक्ट-टी (IMPACT-T): कैंसर के खिलाफ टारगेटेड मिसाइल

रिसर्च के मुताबिक प्रयोगशाला में जब इस एआई-डिजाइन किए गए प्रोटीन को मरीज की टी-कोशिकाओं में जोड़ा गया, तो एक नया और शक्तिशाली सेल उत्पाद बनकर तैयार हुआ, जिसे वैज्ञानिकों ने 'IMPACT-T' नाम दिया है। यह तकनीक किसी सामान्य कीमोथेरेपी की तरह पूरे शरीर पर अंधाधुंध असर नहीं करती, बल्कि केवल ट्यूमर कोशिकाओं को ही निशाना बनाती है। रिसर्चर्स ने सबसे पहले इसे NY-ESO-1 नामक एक मशहूर कैंसर टारगेट पर आजमाया, जो कई प्रकार के कैंसर में पाया जाता है। परिणाम बेहद सकारात्मक रहे। इतना ही नहीं, रिसर्चर्स ने एक एडवांस मेलेनोमा ( स्किन कैंसर) के मरीज के ट्यूमर सैम्पल पर भी इसका परीक्षण किया और उस विशिष्ट कैंसर के लिए भी सफलतापूर्वक 'बाइंडर' तैयार कर लिया।

कैंसर के इलाज की नई तकनीक मरीजों के जीवन के लिए खुशखबरी लाई है। (विजुअल: Google Gemini AI.)

'वर्चुअल सेफ्टी चेक': बिना किसी साइड-इफेक्ट के इलाज

कैंसर के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती होती है- हेल्दी सेल्स को नुकसान से बचाना। कई बार इम्यूनोथेरेपी बॉडी के हेल्दी पाटर्स पर हमला कर देती है, जिससे गंभीर दुष्प्रभाव (Side Effects) हो सकते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने 'आभासी सुरक्षा जांच' (Virtual Safety Check) की व्यवस्था की है। एआई प्रयोगशाला में वास्तविक प्रयोग शुरू होने से पहले ही बनाए गए प्रोटीन की जांच करता है। एआई यह अनुमान लगा लेता है कि कौन सा डिजाइन शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं के साथ गलत तरीके से प्रतिक्रिया (Cross-reaction) कर सकता है। खतरनाक या नुकसानदेह लगने वाले प्रोटीन डिजाइन को शुरू में ही खारिज कर दिया जाता है। इससे मरीज के लिए केवल सबसे सुरक्षित और असरदार दवा या प्रोटीन ही चुनी जाती है।

एआई पावर्ड कैंसर थैरेपी किस तरह और कैसे काम करती है, इन चार लेवल से जानें। (विजुअल: Google Gemini AI.)

कब तक उपलब्ध होगी यह थेरेपी?

रिसर्च के प्रमुख लेखक टिमोथी पी. जेनकिंस के अनुसार, इस तकनीक को प्रयोगशाला से निकालकर इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trials) के लिए तैयार करने में लगभग 5 साल का समय लग सकता है। हालांकि, एक बार प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद, किसी भी मरीज के लिए नया इलाज विकसित करने का समय सालों से घट कर मात्र 4 से 6 सप्ताह रह जाएगा।

मेन रिसर्च इंस्टीटयूशन : डेनमार्क का तकनीकी विश्वविद्यालय (DTU)।

सहयोगी संस्थान : द स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट , अमेरिका।

प्रमुख शोधकर्ता : टिमोथी पी. जेनकिंस एसोसिएट प्रोफेसर, क्रिस्टोफर हौरम जोहानसन, और साइन रेकर हैड्रुप।

जर्नल रेफरेंस: क्रिस्टोफ़र हॉरम जोहानसन, डेरियन स्टीफ़न वुल्फ, बीट्राइस स्कैपोलो, मोनिका एल. फर्नांडीज-क्विन्टेरो, चार्लोट राइजर क्रिस्टेंसन, जोहान्स आर. लोफ्लर, एस्पेरांज़ा रिवेरा-डी-टोरे, मैक्स डी. ओवरथ, कामिला केजोरगार्ड मंक, ओलिवर म्यूरल, मैरी क्रिस्टीन विओफ, इनिगो लैकुंजा, अल्बर्टे टी. डैम एंगलंड, मैथिल्डे ड्यू, अनंत घरपुरे, स्टेफ़ानो फोर्ली, कार्लोस रोड्रिग्ज पार्डो, तृप्ति तम्हाने, एम्मा किंग्ज़ी एंडरसन, कैस्पर हल्द्रुप ब्योर्नसन, जॉर्डन सिल्वेस्टर फर्नांडीस, लासे फ्रैंक वॉस, सुथिमोन थुम्टेचो, एंड्रयू बी वार्ड, मारिया ओरमहोज, साइन रेकर हैड्रुप, टिमोथी पी. जेनकिंस। 'डी नोवो डिज़ाइन किए गए पीएमएचसी बाइंडर्स कैंसर कोशिकाओं के प्रति टी सेल-मध्यस्थ साइटोटोक्सिसिटी की सुविधा देते हैं।'