
One Nation One Election : क्या देश में 2029 में होंगे एक साथ चुनाव, PC- Patrika
One Nation One Election : भारत में पिछले कुछ वर्षों से 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (ONOE) पर चर्चा तेज है। इसका मतलब है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं, ताकि देश में बार-बार चुनाव कराने की जरूरत न पड़े। केंद्र सरकार ने रामनाथ कोविंद समिति की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है, संसद में विधेयक पेश हो चुका है, और अब लक्ष्य 2029 के आम चुनाव तक इसे लागू करने का रखा जा रहा है।
अभी भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। किसी राज्य की सरकार का कार्यकाल खत्म होते ही वहां चुनाव कराए जाते हैं। नतीजा यह है कि देश लगभग स्थायी रूप से 'चुनावी मोड' में रहता है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी के बाद भारत में शुरुआत में चुनाव लगभग एक साथ ही होते थे।
संविधान लागू होने के बाद पहले चार आम चुनावों (1952, 1957, 1962, 1967) में लोकसभा और लगभग सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे। लेकिन 1968-69 में कई राज्य सरकारें समय से पहले गिर गईं, और 1970 में चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग हो गई। जिससे 1971 में नए सिरे से राष्ट्रीय चुनाव कराने पड़े और चुनावी कैलेंडर हमेशा के लिए अलग-अलग हो गया।
| साल | घटनाक्रम |
|---|---|
| 1983 | चुनाव आयोग की रिपोर्ट में चुनावी खर्च और प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की गई। |
| 1999 | विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (जस्टिस बी.पी. जीवन रेड्डी) ने समकालिक चुनावों के पक्ष में सुझाव दिए। |
| 2015 | संसदीय स्थायी समिति ने बार-बार लगने वाली आचार संहिता और चुनावी खर्च को बड़ी चुनौती बताते हुए एक साथ चुनाव पर विचार करने की सिफारिश की। |
| 2017 | नीति आयोग के डिस्कशन पेपर में चरणबद्ध तरीके से लोकसभा और विधानसभा चुनावों के समकालिकरण का प्रस्ताव रखा गया। |
| 2018 | विधि आयोग के मसौदा पत्र में "रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव" (Constructive Vote of No Confidence) जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सरकार गिरने पर भी चुनावी चक्र न टूटे। |
| 2023–24 | पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समिति (HLC) गठित की गई, जिसने चरणबद्ध तरीके से "वन नेशन, वन इलेक्शन" लागू करने की सिफारिश की। |
| 18 सितंबर 2024 | केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोविंद समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी। |
| दिसंबर 2024 | संविधान (129वां संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक लोकसभा में पेश किए गए। विपक्ष के विरोध के बाद इन्हें संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया। |
| मार्च 2025 – मार्च 2026 | संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का कार्यकाल कई बार बढ़ाया गया और मामले की विस्तृत समीक्षा जारी रही। |
| जुलाई 2026 | JPC अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने कहा कि 2029 के आम चुनाव तक "वन नेशन, वन इलेक्शन" लागू करने के लिए आवश्यक तंत्र तैयार करने की कोशिश की जा रही है। |
कोविंद समिति की सिफारिश के अनुसार इसे दो चरणों में लागू किया जा सकता है। चरण 1 में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ। चरण 2 में पंचायत और नगर निकाय चुनाव लोकसभा-विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के भीतर होंगे। इसके लिए एक साझा मतदाता सूची (Common Electoral Roll) और एक समान EPIC (मतदाता पहचान पत्र) का भी प्रस्ताव है।
129वें संशोधन विधेयक में एक नया अनुच्छेद 82A जोड़ने का प्रस्ताव है। इसके तहत राष्ट्रपति एक 'नियत तारीख' (नई लोकसभा की पहली बैठक) अधिसूचित करेंगे, जिसके बाद नई चुनी गई सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल घटाकर या बढ़ाकर लोकसभा के पांच साल के कार्यकाल के साथ मिला दिया जाएगा।
यही सबसे बड़ा सवाल है। अनुच्छेद 83 और 172 में प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, अगर लोकसभा या किसी राज्य विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले खत्म हो जाता है, तो नए चुनाव पूरे पांच साल के लिए नहीं बल्कि सिर्फ 'बचे हुए कार्यकाल' (unexpired term) के लिए होंगे। ताकि अगला चुनाव फिर राष्ट्रीय चक्र के साथ ही जुड़ा रहे। इसके अलावा, चुनाव आयोग (ECI) को यह विवेकाधिकार भी मिलेगा कि वह स्थानीय हालात के आधार पर किसी राज्य का चुनाव टालने की सिफारिश कर सके। भले ही उस विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के साथ ही खत्म हो।
आधारभूत ढांचा सिद्धांत: 1973 के केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसदीय लोकतंत्र और स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव संविधान के 'आधारभूत ढांचे' का हिस्सा हैं, जिन्हें सामान्य संशोधन से भी नहीं बदला0 जा सकता। आलोचकों का तर्क है कि विधानसभाओं का कार्यकाल घटाना-बढ़ाना अनुच्छेद 83 और 172 में मौजूद "no longer" (पांच साल से ज्यादा नहीं) वाले प्रावधान से सीधे टकराता है, जो संविधान सभा ने जानबूझकर बिना नए जनादेश के कार्यकाल बढ़ने से रोकने के लिए रखा था।
चुनाव आयोग की शक्ति पर सवाल: पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने चुनाव टालने के ECI के विवेकाधिकार को "अनियंत्रित" बताते हुए कहा है कि यह अनुच्छेद 14 (समानता) और आधारभूत ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन कर सकता है, और परोक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति बना सकता है। इससे पहले पूर्व CJI यू.यू. ललित, डी.वाई. चंद्रचूड़ और जे.एस. खेहर भी इस पर चिंता जता चुके हैं।
एक साथ चुनाव होने से क्या फायदे होंगे
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (CMS) के अनुसार 2024 के आम चुनाव पर करीब ₹1.35 लाख करोड़ खर्च हुए — 2019 के ₹60,000 करोड़ से दोगुने से ज्यादा। JPC का दावा है कि एक साथ चुनाव कराने से सुरक्षा बलों की आवाजाही, खरीद और व्यवस्था के दोहराव से बचकर लगभग ₹7 लाख करोड़ तक बचाए जा सकते हैं।
हर चुनाव के साथ 45-60 दिनों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होती है, जिसमें नई परियोजनाओं और नीतिगत फैसलों पर रोक लग जाती है। कई राज्यों में साल के 4-6 महीने प्रशासन इसी रोक में बीत जाते हैं।
चुनाव के दौरान जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी और नौकरशाही का बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग के अधीन आ जाता है, जिससे नियमित प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है। साथ ही, लाखों सरकारी शिक्षकों को भी बार-बार चुनाव ड्यूटी में लगाया जाता है जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है।
बार-बार अलग-अलग राज्यों में केंद्रीय सुरक्षा बलों (CRPF, BSF, CISF आदि) को ट्रांसपोर्ट करना पड़ता है, जिससे उन पर लगातार दबाव रहता है। एक साथ चुनाव होने पर एक ही समन्वित तैनाती योजना बनाई जा सकती है।
समर्थकों का तर्क है कि बार-बार मतदान केंद्र जाने की जरूरत खत्म होने से मतदान प्रतिशत बढ़ सकता है, खासकर प्रवासी मजदूरों के लिए जिन्हें एक ही बार अपने गृह क्षेत्र जाना पड़ेगा।
संभवत: क्या हो सकते हैं नुकसान
आलोचकों का कहना है कि जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं, तो मतदाता अक्सर दोनों स्तरों पर एक ही बड़ी राष्ट्रीय पार्टी को चुनते हैं (वेव इफेक्ट)। इससे सड़क, पानी, बिजली, स्थानीय रोजगार जैसे स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में दब सकते हैं, और क्षेत्रीय दलों को नुकसान पहुंच सकता है।
कांग्रेस, AAP, TMC, CPI(M) समेत ज्यादातर विपक्षी दलों का कहना है कि यह प्रस्ताव राज्यों की स्वायत्तता और संघवाद पर सीधा हमला है। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने इसे "भारत एक संघ है" के सिद्धांत पर हमला बताया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने इसे लागू करना व्यावहारिक रूप से असंभव बताया। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दलों (AIADMK, BJD, JD(U), शिवसेना, अकाली दल) का तर्क है कि इससे संघीय ढांचे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि 1952-67 के दौर में भी यह व्यवस्था सफलतापूर्वक चली थी।
कोविंद समिति के अध्ययन में दावा किया गया है कि एक साथ चुनाव से GDP वृद्धि दर में करीब 1.6% तक इजाफा हो सकता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह दावा इतिहास से मेल नहीं खाता। 1952-67 का 'एक साथ चुनाव' दौर धीमी वृद्धि (हिंदू विकास दर, ~3.5%) का दौर था, जबकि 2003-2011 की तेज़ वृद्धि (8-9%) अलग-अलग चुनावों के दौर में हुई। आलोचकों के अनुसार चुनाव पर सरकारी खर्च कुल बजट का 0.1% से भी कम है। असली समस्या राजनीतिक फंडिंग का अघोषित 'काला धन' है (अकेले 2024 के लोकसभा चुनाव में अनुमानित ₹1 लाख करोड़ से ऊपर), जिसे ONOE हल नहीं करेगा, सिर्फ एक ही समय पर केंद्रित कर देगा।
28 राज्य, 8 केंद्र शासित प्रदेश और लाखों मतदान केंद्रों वाले इतने बड़े देश में एक साथ चुनाव के लिए चुनाव आयोग के अनुमान के अनुसार करीब 46.75 लाख बैलट यूनिट, 33.63 लाख कंट्रोल यूनिट और 36.62 लाख VVPAT मशीनों की जरूरत होगी — जिनके रखरखाव पर हर 15 साल में करीब ₹10,000 करोड़ का खर्च आएगा। साथ ही सभी मतदान केंद्रों पर एक साथ सुरक्षा बल तैनात करना भी बड़ी चुनौती होगी।
पूरी तरह यह मॉडल बहुत कम देशों में है, लेकिन कई देशों में राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव एक साथ या तय चक्र में कराए जाते हैं।
हालांकि भारत की जनसंख्या और संघीय संरचना इन देशों की तुलना में कहीं अधिक जटिल है।
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| वन नेशन, वन इलेक्शन क्या है? | लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना |
| पहले भारत में ऐसा हुआ है? | हां, 1951 से 1967 तक |
| सरकार गिर गई तो? | सिर्फ बचे हुए कार्यकाल के लिए ही चुनाव |
| मुख्य फायदा | खर्च, चुनावी व्यवधान और प्रशासनिक बोझ में कमी |
| मुख्य चिंता | क्षेत्रीय मुद्दों, दलों, संघवाद और आधारभूत ढांचे पर असर |
| कैबिनेट मंजूरी | 18 सितंबर 2024 |
| विधेयक कब पेश हुआ? | दिसंबर 2024 (129वां संविधान संशोधन विधेयक) |
| अभी स्थिति | JPC के पास लंबित, कार्यकाल मानसून सत्र 2026 तक बढ़ाया गया |
| लागू होने का लक्ष्य | 2029 का आम चुनाव (JPC प्रमुख का बयान, जुलाई 2026) |
| कानून बनने के लिए क्या चाहिए? | संसद में दो-तिहाई विशेष बहुमत + स्थानीय निकाय जोड़ने के लिए कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी |
Updated on:
25 Jul 2026 11:37 am
Published on:
25 Jul 2026 11:37 am
