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भारत-पाक का इतिहास एक, लेकिन पाकिस्तान उसे कैसे पढ़ा रहा? जानिए पाक में कितनी बदल गई ‘1947 में आजादी’ की कहानी?

pakistan history books: भारत-पाक बंटवारे की कहानी बड़ी दर्दनाक रही और दोनों देशों का इतिहास साझा अतीत रहा है, लेकिन 1947 में आजादी के वक्त बंटवारे में केवल एक जमीन के का टुकड़ा अलग नहीं हुआ था, बल्कि पाक की ऐतिहासिक कहानी भी अलग हो गई
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Aug 17, 2026
Pakistan History books
Pakistan History books: भारत के साथ साझा इतिहास रखने वाले पाकिस्तान के बनते ही जानें कैसे और कितनी अलग हो गई आजादी की कहानी? जानिए पाक में कैसे पढ़ाया जाता है 1947 का इतिहास? (Photo AI Creative)

Pakistan history books: भारत और पाकिस्तान की आजादी की तारीखें भले अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों देशों की कहानी की शुरुआत एक ही साझा अतीत से होती है। सिंधु घाटी सभ्यता, प्राचीन भारत, दिल्ली सल्तनत, मुगल काल, अंग्रेजी शासन, स्वतंत्रता आंदोलन और फिर 1947 का बंटवारा, इनमें से ज्यादातर अध्याय दोनों देशों की साझा ऐतिहासिक जमीन से निकलते हैं। लेकिन जब किताब खुली तो बड़ा दिलचस्प सवाल उठा, अगर दोनों देशों की जमीन और अतीत का बड़ा हिस्सा साझा था, तो पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चों को यह इतिहास किस नजरिए से पढ़ाया जाता है?

पाकिस्तान की इतिहास की किताब में शुरुआत सिर्फ 1947 से नहीं होती

यह मान लेना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान के बच्चे स्कूल में केवल जिन्ना, पाकिस्तान आंदोलन और 1947 के बारे में पढ़ते हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में इतिहास की पढ़ाई प्राचीन सभ्यताओं से शुरू होती है। आधिकारिक पाठ्यक्रम के अनुसार छठी कक्षा के स्तर पर मेसोपोटामिया, मिस्र, सिंधु और चीनी सभ्यताओं के साथ-साथ आर्य, कुषाण और गुप्त काल जैसे विषय आते हैं। आगे चलकर दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य, यूरोप का मध्यकाल, पुनर्जागरण और इस्लामी साम्राज्यों का अध्ययन कराया जाता है। यानी पाकिस्तान का इतिहास पाठ्यक्रम अपने अतीत को एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा के रूप में पेश करता है। लेकिन आठवीं कक्षा के आसपास पहुंचते-पहुंचते कहानी का केंद्र तेजी से बदलने लगता है।

फिर कहानी पहुंचती है अंग्रेजों और पाकिस्तान आंदोलन तक

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में आठवीं कक्षा के लिए ब्रिटिशों के भारतीय उपमहाद्वीप में आने, सुधार आंदोलनों, दोनों विश्व युद्धों, भारत में राजनीतिक जागृति और फिर 1947 से आज तक के पाकिस्तान को शामिल किया गया है। यानी बच्चों के सामने इतिहास की एक ऐसी कड़ी बनाई जाती है जिसमें, ब्रिटिश शासन से राजनीतिक जागृति और फिर पाकिस्तान के निर्माण तक की यात्रा दिखाई जाती है। यहीं पर ये इतिहास सिर्फ घटनाओं की सूची भर नहीं रह जाता। वह यह बताने का माध्यम भी बन जाता है कि 'हम कौन हैं और हमारा देश क्यों बना?'

पाकिस्तान के इतिहास की सबसे अहम धुरी क्या है?

पाकिस्तान में इतिहास और पाकिस्तान अध्ययन को समझने के लिए एक शब्द बेहद महत्वपूर्ण है, दो राष्ट्र सिद्धांत। इस विचार के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदू और मुसलमान अलग राजनीतिक राष्ट्र थे और इसी विचार ने पाकिस्तान की मांग को वैचारिक आधार दिया।

पाकिस्तान के पाकिस्तान अध्ययन से जुड़े पाठ्यक्रम और पुस्तकों में यह विचार राष्ट्रीय पहचान की व्याख्या का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। हाल के अकादमिक अध्ययन भी बताते हैं कि पाकिस्तान के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम में दो राष्ट्र सिद्धांत को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसका असर यह होता है कि 1947 को केवल ब्रिटिश भारत के विभाजन की घटना के तौर पर नहीं, बल्कि पाकिस्तान के निर्माण और उसकी राष्ट्रीय पहचान की निर्णायक घटना के रूप में देखा जाता है।

सबसे दिलचस्प बात: एक ही इतिहास, दो अलग नजरिए

यही वह जगह है जहां भारत और पाकिस्तान की पाठ्यपुस्तकें दिलचस्प तुलना पेश करती हैं। दोनों देशों के बच्चों को 1857, ब्रिटिश शासन, स्वतंत्रता आंदोलन, मुस्लिम लीग, कांग्रेस, जिन्ना और गांधी जैसे विषय मिल सकते हैं। लेकिन किसी घटना को किस क्रम में रखा गया, किस व्यक्ति को नायक के रूप में दिखाया गया और किस घटना को पाकिस्तान के निर्माण से जोड़ा गया। इनमें अंतर दिखाई देता है।

इतिहास की किताबों पर हुए शोध में भी यह बात सामने आई है कि भारत और पाकिस्तान ने साझा अतीत को अलग-अलग राष्ट्रीय दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया गया है। एक अध्ययन के मुताबिक दोनों देशों की पाठ्यपुस्तकें एक ही साझा अतीत से दो अलग ऐतिहासिक कथाएं तैयार करती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि पाकिस्तान की हर किताब एक जैसी है या हर स्कूल में बिल्कुल वही भाषा पढ़ाई जाती है। पाठ्यक्रम, प्रांत, कक्षा और पुस्तक के अनुसार सामग्री बदल सकती है।

नई पीढ़ी के लिए इतिहास का मतलब सिर्फ तारीखें नहीं

पाकिस्तान के मौजूदा राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में इतिहास पढ़ाने का घोषित उद्देश्य केवल घटनाओं और तारीखों को याद कराना नहीं है। आधिकारिक दस्तावेज इतिहास को अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों से समझने की बात करता है। साथ ही विद्यार्थियों को घटनाओं के बीच कारण और परिणाम समझने पर जोर दिया गया है।नयह एक महत्वपूर्ण बदलाव है।

क्योंकि आधुनिक इतिहास शिक्षा का उद्देश्य केवल यह याद कराना नहीं कि 'क्या हुआ?' बल्कि यह समझाना भी है कि 'क्यों हुआ, किसे फायदा हुआ, किसे नुकसान हुआ और अलग-अलग लोग इसे कैसे देखते हैं?'

फिर भारत का जिक्र कहां आता है?

भारत पाकिस्तान के इतिहास से अलग कोई बाहरी अध्याय नहीं है। पाकिस्तान के वर्तमान इतिहास पाठ्यक्रम में ब्रिटिशों का आगमन, भारतीय सुधार आंदोलन, राजनीतिक जागृति और उपमहाद्वीप के इतिहास के अनेक हिस्से शामिल हैं।

लेकिन पाकिस्तान की राष्ट्रीय कथा का अंतिम केंद्र पाकिस्तान का निर्माण बन जाता है। इसीलिए वहां इतिहास की पढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि पाकिस्तान एक अलग देश के रूप में क्यों अस्तित्व में आया। यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान के बच्चे एक ही घटना पढ़कर भी अलग निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं।

इसका असर सिर्फ किताब तक सीमित नहीं रहता

बच्चा जिस तरह इतिहास पढ़ता है, उसी से उसकी राष्ट्रीय पहचान का एक हिस्सा बनता है। अगर किसी देश की पाठ्यपुस्तक किसी घटना को राष्ट्रीय संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करती है, तो विद्यार्थी उस घटना को उसी नजरिए से याद करता है। यही कारण है कि इतिहास की किताबें सिर्फ पढ़ाई की किताबें नहीं होतीं, वे आने वाली पीढ़ी को यह समझाने का माध्यम भी होती हैं कि उसका देश किस कहानी से बना है। भारत और पाकिस्तान के साझा इतिहास को लेकर किए गए शोध में भी पाठ्यक्रम और राष्ट्रीय पहचान के बीच इस संबंध को रेखांकित किया गया है।

असली कहानी यही है कि पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चों को केवल यह नहीं पढ़ाया जाता कि '1947 में पाकिस्तान बना।' उन्हें उससे पहले की सभ्यताओं, इस्लामी इतिहास, दिल्ली सल्तनत, मुगल काल, ब्रिटिश शासन, राजनीतिक जागृति और पाकिस्तान आंदोलन की एक लंबी ऐतिहासिक कड़ी का जानते हुए आगे बढ़ना होता है। इसके बाद 1947 से बने पाकिस्तान की कहानी पढ़ाई जाती है। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतिहास को राष्ट्रीय पहचान के नजरिए से भी देखा जाता है।

यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान की सीमा सिर्फ जमीन पर नहीं खिंची थी। 1947 के बाद दोनों देशों ने अपने-अपने अतीत को भी अलग-अलग तरीके से याद करना शुरू किया। कहना होगा कि सीमा बनने के बाद सिर्फ देश अलग नहीं हुए, आने वाली पीढ़ियों को सुनाई जाने वाली इतिहास की कहानी भी काफी हद तक अलग हो गई।

Updated on:
17 Aug 2026 11:20 am
Published on:
17 Aug 2026 11:20 am