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दवा लेने के बाद भी कम नहीं हो रहा BP, जानिए हाईपरटेंशन की क्या है वजह?

BP or Hypertension control: तमिलमाडु के नए अध्ययन और NFHS-5 के जिला स्तरीय आंकड़े बताते हैं कि भारत में उच्च रक्तचाप (Hypertension/BP) की चुनौती सिर्फ इलाज तक पहुंच पाती है या नहीं, बल्कि बीपी को कंट्रोल में रखने की भी है
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 14, 2026

BP Control in India

BP Control in India: दवा लेने के बाद भी कंट्रोल में नहीं बीपी, जानिए क्या है वजह? (AI Creative)

BP or Hypertension control: ब्लड प्रेशर बढ़ना अब सिर्फ उम्र बढ़ने की समस्या नहीं रह गई है। लेकिन भारत में उच्च रक्तचाप की चुनौती का एक ऐसा पहलू है, जिस पर आमतौर पर सबसे कम बात होती है, कितने लोगों को बीमारी का पता है, कितने इलाज करा रहे हैं और आखिर कितनों का रक्तचाप वास्तव में नियंत्रण में है?

2026 में प्रकाशित तमिलनाडु के एक नए अध्ययन ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है। 2019-20 और 2023-24 के दो प्रतिनिधि सर्वेक्षणों की तुलना करने वाले इस अध्ययन में 18 से 69 वर्ष के लोगों को शामिल किया गया। 2023-24 में उच्च रक्तचाप वाले लोगों में बीमारी की जानकारी रखने वालों का अनुपात 30.1% से बढ़कर 36.8%, इलाज कराने वालों का अनुपात 21.7% से बढ़कर 32.2% और रक्तचाप नियंत्रण में रखने वालों का अनुपात 7% से बढ़कर सिर्फ 14.4% हुआ। यानी चार साल में सुधार हुआ, लेकिन तस्वीर अभी भी अधूरी है।

दवा तक पहुंच और बीमारी पर नियंत्रण, दो अलग बातें

अध्ययन का सबसे अहम संकेत यही है कि इलाज तक पहुंच बढ़ने का मतलब यह नहीं कि बीमारी पूरी तरह नियंत्रण में आ गई। तमिलनाडु में उच्च रक्तचाप के इलाज के लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों का इस्तेमाल करने वालों की हिस्सेदारी 47.5% से बढ़कर 62.4% हुई। इन सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों से इलाज लेने वालों में रक्तचाप नियंत्रण भी 31% से बढ़कर 44.5% हुआ। यह आंकड़ा स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी बताता है कि इलाज शुरू होने के बाद अगली चुनौती क्या है, रक्तचाप को लगातार लक्ष्य सीमा में रखना।

भारत की तस्वीर तमिलनाडु से भी बड़ी है

राष्ट्रीय स्तर पर NFHS-5 के 7.43 लाख से अधिक वयस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले 2025 के अध्ययन ने भारत के जिलों के बीच भारी अंतर दिखाया। उच्च रक्तचाप वाले लोगों में बीमारी की जानकारी का औसत स्तर 46% था, लेकिन जिलों के बीच यह 6.1% से 89.6% तक था। इलाज की औसत दर सिर्फ 18.7% रही, जबकि रक्तचाप नियंत्रण 32.9% लोगों में पाया गया।

अध्ययन ने गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों को कमजोर प्रदर्शन वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया। इसका अर्थ यह है कि भारत में उच्च रक्तचाप की कहानी पूरे देश के लिए एक जैसी नहीं है। समस्या का स्तर जिले, सामाजिक स्थिति, उम्र, जीवनशैली और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के साथ बदलता है।

मध्य प्रदेश में भी तस्वीर एक जैसी नहीं

NFHS-5 आधारित जिला-स्तरीय विश्लेषण में मध्य प्रदेश में कभी रक्तचाप मापे जाने की दर 62.4% थी। राज्य में 35.5% वयस्कों में पूर्व-उच्च रक्तचाप और 14.3% में बढ़ा हुआ रक्तचाप दर्ज किया गया। लेकिन राज्य के भीतर बड़ा अंतर दिखाई देता है। खरगोन में केवल 32.2% लोगों का कभी रक्तचाप मापा गया था, जबकि अलीराजपुर में यह आंकड़ा 33.8% था। दूसरी ओर कुछ जिलों में रक्तचाप जांच की पहुंच काफी बेहतर थी। यानी सिर्फ राज्य का औसत देखकर पूरी तस्वीर समझना संभव नहीं। एक ही राज्य में कहीं जांच तक पहुंच कमजोर हो सकती है, कहीं बीमारी का जोखिम ज्यादा और कहीं इलाज के बाद नियंत्रण की समस्या बड़ी हो सकती है।

सबसे बड़ा खतरा, 'मुझे कुछ नहीं हुआ' वाली सोच

उच्च रक्तचाप की सबसे मुश्किल बात यह है कि लंबे समय तक इसके स्पष्ट लक्षण नहीं दिख सकते। ऐसे में व्यक्ति को बीमारी का पता ही नहीं चलता। यही वजह है कि केवल अस्पतालों में आने वाले मरीजों को देखकर समस्या का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं है। भारत के राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग निगरानी सर्वेक्षण में 10,000 से अधिक वयस्कों के विश्लेषण में 28.5% लोगों में उच्च रक्तचाप पाया गया था। इनमें सिर्फ 27.9% को अपनी स्थिति की जानकारी, 14.5% को इलाज और 12.6% में रक्तचाप नियंत्रण दर्ज हुआ था। यानी बीमारी की पहचान से इलाज और फिर नियंत्रण तक हर चरण में लोगों की संख्या घटती जाती है। इसी को स्वास्थ्य नीति में केयर कैस्केड कहा जाता है- बीमारी - जानकारी - इलाज - नियंत्रण। भारत की चुनौती इसी पूरी श्रृंखला को मजबूत करने की है।

युवाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

उच्च रक्तचाप को अक्सर बुजुर्गों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन राष्ट्रीय आंकड़ों में उम्र के साथ जोखिम बढ़ने के बावजूद कम उम्र के लोगों में भी पूर्व-उच्च रक्तचाप मौजूद है। NFHS-5 विश्लेषण में 30 वर्ष से कम उम्र के लोगों में पूर्व-उच्च रक्तचाप का स्तर 27.8% बताया गया। इसका मतलब यह नहीं कि हर युवा आगे चलकर उच्च रक्तचाप का मरीज बनेगा। लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि रोकथाम की शुरुआत बीमारी का इंतजार करने के बाद नहीं, उससे पहले होनी चाहिए।

अब सवाल सिर्फ दवा का नहीं

भारत में उच्च रक्तचाप पर नीति बनाते समय केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं होगा कि कितने मरीजों को दवा मिल रही है। सवालों की पूरी लिस्ट होगी-

  • कितने लोगों ने कभी अपना रक्तचाप जांचा?
  • कितनों को पता है कि उनका रक्तचाप बढ़ा हुआ है?
  • कितने नियमित इलाज करा रहे हैं?
  • कितने मरीजों का रक्तचाप वास्तव में नियंत्रण में है?
  • किन जिलों में यह पूरी श्रृंखला सबसे ज्यादा टूट रही है?

यही वह जगह है जहां राष्ट्रीय आंकड़ों का जिला स्तर तक विश्लेषण बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती शायद 'बीपी की दवा पहुंचाना' नहीं, बल्कि 'बीपी को नियंत्रण में रखना' है। तमिलनाडु के नए अध्ययन में नियंत्रण की दर चार साल में दोगुने से अधिक हुई है, लेकिन वह भी केवल 14.4% तक पहुंची। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज लेने वालों में नियंत्रण बेहतर जरूर रहा, लेकिन वहां भी हर मरीज का रक्तचाप नियंत्रित नहीं था।

इसलिए भारत की अगली स्वास्थ्य लड़ाई का सवाल सीधा है, दवा कितने लोगों तक पहुंची या नहीं, दवा लेने के बाद कितने लोगों का रक्तचाप सच में नियंत्रण में आया? क्योंकि उच्च रक्तचाप में असली जीत इलाज शुरू होने पर नहीं, नियंत्रण हासिल होने पर होती है।