
Reels Addiction: आपका बच्चा अगर खाना खाते वक्त, खेलते वक्त या यूं ही मोबाइल स्क्रीन पर रील्स देखने की जिद करता है, तो यह आदत सिर्फ एक 'आम पेरेंटिंग चुनौती' नहीं, बल्कि डॉक्टरों की भाषा में एक गंभीर चिकित्सीय चिंता बन चुकी है। हाल ही में सामने आए विशेषज्ञों के आकलन और अस्पतालों के केस बताते हैं कि छोटे बच्चों में तेजी से बढ़ता स्क्रीन टाइम, खासकर रील्स और शॉर्ट्स की लत, उनकी भाषा और बोलने की क्षमता के विकास को सीधे प्रभावित कर रहा है।
दिल्ली के एक अस्पताल में हाल ही में सामने आए एक मामले में एक छोटा बच्चा इतना मोबाइल का आदी हो चुका था कि, वह खाना भी मोबाइल देखते हुए खाता था, और फोन हटाने पर चिड़चिड़ा हो जाता था। जांच में डॉक्टरों ने पाया कि उसके समग्र विकास में मुख्य रूप से बोलने की क्षमता अपेक्षाकृत धीमी थी। परिवार से बातचीत में पता चला कि माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के चलते बच्चे के साथ आमने-सामने की बातचीत और इंटरैक्टिव खेल का समय काफी सीमित हो गया था।
विशेषज्ञों के हवाले से सामने आए एक अध्ययन के मुताबिक, हर 30 मिनट का मोबाइल स्क्रीन टाइम बच्चों में स्पीच डिले यानी देर से बोलना शुरू करने के जोखिम को 49 प्रतिशत तक बढ़ा देता है। यही नहीं, बाल रोग विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर दो से पांच वर्ष की उम्र के बच्चे दिन में एक घंटे से अधिक समय मोबाइल और टैबलेट पर वीडियो देखने में बिताते हैं, तो उनके मस्तिष्क के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
यह सिर्फ भारतीय डॉक्टरों की चिंता नहीं है, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही सिफारिश कर चुका है कि दो से पांच साल तक के बच्चों को रोजाना एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं दिया जाना चाहिए और दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखा जाए। दुनियाभर के स्वास्थ्य संगठन इसी सीमा को मानक मानते आए हैं।
आम टीवी शो या लंबे वीडियो के मुकाबले रील्स और शॉर्ट्स का प्रभाव अलग और ज़्यादा गहरा माना जा रहा है। बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, रील्स और शॉर्ट्स जैसे वीडियो हर कुछ सेकेंड में नया कंटेंट दिखाते हैं, जिससे मस्तिष्क को लगातार उत्तेजक संकेत मिलते रहते हैं और इसके चलते पढ़ाई, किताबें या ऐसी अन्य गतिविधियां, जिनका परिणाम धीरे-धीरे मिलता है, बच्चों को अपेक्षाकृत कम रोचक लगने लगती हैं।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण आमने-सामने की बातचीत, कहानी सुनाना, किताबें पढ़ना और खेल जैसी गतिविधियां कम हो जाती हैं। जबकि यही गतिविधियां शुरुआती वर्षों में भाषा सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
अकेले भाषा ही नहीं, विशेषज्ञों की चेतावनी इससे आगे तक जाती है। एम्स से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में मोबाइल, टीवी और अन्य डिजिटल स्क्रीन के अधिक इस्तेमाल का बच्चों के मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और लंबे समय तक स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
राहत की बात यह है कि डॉक्टर इसे पूरी तरह बदला जा सकने वाला असर मानते हैं, बशर्ते समय रहते कदम उठाए जाएं।
डिजिटल दौर में स्क्रीन को पूरी तरह जीवन से बाहर करना अव्यावहारिक हो सकता है, लेकिन विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है, शुरुआती वर्षों में जो समय बच्चों को असली बातचीत, कहानियों और खेल में मिलना चाहिए, वह रील्स की चमक-दमक में कहीं खो न जाए।
भाषा का विकास एक बार पिछड़ जाए, तो उसकी भरपाई में समय और मेहनत दोनों कहीं ज्यादा लगते हैं। इसीलिए विशेषज्ञ बार-बार यही कह रहे हैं, बच्चे को स्क्रीन नहीं, आपकी आवाज चाहिए।