
आज दुनिया में शरणार्थी संकट एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुका है, और भारत का दृष्टिकोण इस परिदृश्य में एक संतुलित, किंतु जटिल भूमिका निभा रहा है। हाल ही में जारी आंकड़ों और रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि यह संकट अब केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मानवता और सुरक्षा दोनों के लिए एक बड़ा प्रश्न बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) की 11 जून 2026 को जारी Global Trends रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2025 तक लगभग 117.8 मिलियन लोग अर्थात् 11.78 करोड़ विस्थापित थे, जिनमें शरणार्थी, आश्रय चाहने वाले और आंतरिक रूप से विस्थापित लोग शामिल हैं। यह संख्या पिछले एक दशक में पहली बार थोड़ी कम हुई है - लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट लेकिन फिर भी अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है।
इनमें से 41.6 मिलियन लोग शरणार्थी हैं, 9 मिलियन आश्रय चाहने वाले हैं, और 68.7 मिलियन लोग अपने ही देश में विस्थापित हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह गिरावट अफगानिस्तान, सूडान और सीरिया जैसे बड़े संकटों से लोगों की बड़े पैमाने पर वापसी के कारण आई लेकिन साथ ही ईरान और लेबनान में नए संघर्ष ने इस राहत को धुंधला भी कर दिया है।
भारत 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन या 1967 के प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं है, और अब तक कोई राष्ट्रीय शरणार्थी नीति नहीं बनाई गई है। फिर भी, भारत दशकों से विभिन्न देशों से आए शरणार्थियों को आश्रय देता रहा है जैसे तिब्बती, श्रीलंकाई तमिल, चकमा, रोहिंग्या और अन्य।
UNHCR के साथ मिलकर, भारत ने 2024 के अंत तक लगभग 2,40,000 शरणार्थियों और आश्रय चाहने वालों को पंजीकृत किया, जिनमें अधिकांश म्यांमार और अफगानिस्तान से आए थे; इनमें लगभग 46% महिलाएं और 36% बच्चे शामिल थे।
UNHCR ने 12 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली के रजिस्ट्रेशन सेंटर में अपना डिजिटल गेटवे लॉन्च किया, जिसे "My Services" नाम दिया गया है। यह एक ऑनलाइन सेल्फ-सर्विस पोर्टल है, जो पंजीकृत शरणार्थियों और आश्रय चाहने वालों को अंग्रेजी, बर्मी, दारी, अरबी, सोमाली और पश्तो जैसी भाषाओं में सेवाएं उपलब्ध कराता है, ताकि उन्हें बार-बार दफ्तर के चक्कर न लगाने पड़ें। लॉन्च के पहले ही दिन 15 परिवारों के 35 सदस्यों ने इस नई व्यवस्था को समझने के लिए दफ्तर का रुख किया।
पोर्टल तक पहुंच पाने से पहले 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पंजीकृत शरणार्थियों को नई दिल्ली और हैदराबाद स्थित रजिस्ट्रेशन केंद्रों पर आमने-सामने सत्यापन साक्षात्कार से गुजरना होता है, जो 2026 और 2027 के दौरान चरणबद्ध तरीके से आयोजित किए जा रहे हैं। साक्षात्कार पूरा होने के बाद ही उनका डिजिटल खाता सक्रिय किया जाता है।
यह पहल UNHCR की व्यापक डिजिटल परिवर्तन रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद तकनीक के जरिए मानवीय सेवाओं को अधिक पारदर्शी, तेज और गरिमामय बनाना है न कि आमने-सामने की सुरक्षा-जांच को खत्म करना।
जनवरी 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश के ज़रिए USRAP को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया था, और यह निलंबन आज तक जारी है। वित्त वर्ष 2026 के लिए शरणार्थी प्रवेश की सीमा घटाकर मात्र 7,500 कर दी गई है जो कार्यक्रम के 45 साल के इतिहास में सबसे कम है। जून 2026 के अंत तक वास्तव में केवल 7,730 शरणार्थियों को ही प्रवेश मिल सका।
तुलना के लिए, वित्त वर्ष 2024 में यह संख्या करीब 1 लाख थी। अमेरिकी अदालतों में इस निलंबन को चुनौती देने वाले मुकदमे अभी भी लंबित हैं, लेकिन नौवीं सर्किट कोर्ट ने मार्च 2026 में सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इस प्रतिबंध को जारी रहने की अनुमति दे दी। इसका सीधा असर यह हुआ है कि दुनिया भर में पुनर्वास चाहने वाले लाखों शरणार्थियों के लिए एक बड़ा रास्ता लगभग बंद हो चुका है, जिससे भारत जैसे देशों पर दबाव और बढ़ सकता है।
एक हालिया Ipsos सर्वेक्षण में पाया गया कि 63% भारतीय मानते हैं कि सरकारों को ईरान और लेबनान से विस्थापित लोगों का समर्थन मौजूदा घरेलू शरणार्थी नीतियों के आधार पर करना चाहिए - यह दर्शाता है कि भारत में शरणार्थियों के प्रति नीति-आधारित और व्यवस्थित दृष्टिकोण की मांग है।
दिलचस्प बात यह भी है कि इसी सर्वे में 63% भारतीय यह भी मानते हैं कि युद्ध या उत्पीड़न से बचकर आए लोगों को शरण मिलनी चाहिए, लेकिन साथ ही 74% यह भी मानते हैं कि भारत को फिलहाल अपनी सीमाएं बंद कर देनी चाहिए और और अधिक शरणार्थी स्वीकार नहीं करने चाहिए। यह विरोधाभास भारतीय जनमानस की एक अहम विशेषता को उजागर करता है लोग सैद्धांतिक रूप से करुणा का समर्थन करते हैं, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर स्पष्ट नियमों और जवाबदेही की मांग करते हैं।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि UNHCR का नेतृत्व अभी हाल ही में बदला है। फिलिप्पो ग्रांडी का 10 साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो गया, और 1 जनवरी 2026 से इराक के पूर्व राष्ट्रपति बरहम सालिह ने नए उच्चायुक्त के तौर पर पदभार संभाला। ग्रांडी ने अपने कार्यकाल के दौरान सीरिया, यूक्रेन और सूडान जैसे बड़े संकटों की अगुवाई की थी, और अब यह ज़िम्मेदारी सालिह के कंधों पर है, जो खुद एक पूर्व शरणार्थी रह चुके हैं।
UNHCR ने वैश्विक स्तर पर "50 by 35" नाम की एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू की है, जिसका लक्ष्य 2035 तक दीर्घकालिक विस्थापन पर निर्भरता को आधा करना है। भारत, एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, इस दिशा में सहयोग और नेतृत्व कर सकता है।
भारत में शरणार्थी नीति की स्पष्टता न होने के कारण, शरणार्थियों को कानूनी सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच में बाधा आती है। यदि एक राष्ट्रीय ढांचा बने, तो यह न केवल शरणार्थियों के जीवन को बेहतर बनाएगा, बल्कि भारत की वैश्विक छवि को भी सुदृढ़ करेगा। साथ ही, नीति-आधारित समर्थन की मांग यह दर्शाती है कि आम जनता भी इस दिशा में बदलाव चाहती है।
भारत को चाहिए कि वह:
इस प्रकार, भारत न केवल एक जिम्मेदार पड़ोसी और वैश्विक नागरिक के रूप में उभर रहा है। बल्कि एक ऐसा देश बनने की राह में है जो संकट में पड़े लोगों को आश्रय देने में अग्रणी है। बस इस प्रक्रिया को संवैधानिक और कानूनी रूप से अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।