
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। (Photo: ChatGpt)
चंद्रशेखरन का सफर इसलिए भी खास है क्योंकि वह टाटा परिवार से नहीं आते। उन्होंने समूह के भीतर एक प्रोफेशनल के तौर पर शुरुआत की और करीब तीन दशक की मेहनत के बाद उस पद तक पहुंचे, जहां से टाटा समूह की दर्जनों कंपनियों की रणनीति और दिशा तय होती है। टाटा समूह में उनका सफर 1987 में शुरू हुआ था और 2017 में वह टाटा संस के चेयरमैन बने।
नटराजन चंद्रशेखरन का जन्म तमिलनाडु में हुआ। उन्होंने कोयंबटूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एप्लाइड साइंस में स्नातक की पढ़ाई की और इसके बाद रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, त्रिची से कंप्यूटर एप्लिकेशंस में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की। तकनीक और कंप्यूटर के क्षेत्र में शिक्षा ने उनके करियर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1987 में वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी TCS से जुड़े। उस समय TCS आज की तरह वैश्विक आईटी दिग्गज नहीं थी। चंद्रशेखरन ने कंपनी के भीतर अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते हुए धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। करीब 30 साल के करियर में वह कंपनी के शीर्ष पद तक पहुंचे।
चंद्रशेखरन के करियर का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय TCS रहा। 2009 में उन्हें कंपनी का CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। उनके नेतृत्व में TCS ने वैश्विक आईटी बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की और भारत की सबसे मूल्यवान कंपनियों में अपनी जगह बनाई। टाटा समूह की प्रोफाइल के मुताबिक, उनके नेतृत्व में TCS देश की सबसे मूल्यवान कंपनी बनी थी।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि TCS को केवल एक भारतीय आईटी कंपनी से आगे बढ़ाकर दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी और कंसल्टिंग कंपनियों की कतार में खड़ा करने में चंद्रशेखरन की भूमिका रही। टाटा संस के चेयरमैन पद पर नियुक्ति से पहले उनका करीब 30 वर्षों का पूरा कारोबारी अनुभव TCS में ही बना।
जनवरी 2017 में टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त किया। उन्होंने 21 फरवरी 2017 से पद संभाला। यह नियुक्ति उस दौर के बाद हुई, जब टाटा समूह नेतृत्व के स्तर पर बड़े बदलाव से गुजर रहा था।
उनके सामने चुनौती केवल कंपनियों के कारोबार को आगे बढ़ाने की नहीं थी, बल्कि टाटा समूह की अलग-अलग कंपनियों को एक साझा रणनीतिक दिशा देना भी बड़ा काम था। इसी सोच के साथ चंद्रशेखरन ने 'वन टाटा' (One Tata) की अवधारणा पर जोर दिया। उनका फोकस तीन शब्दों - सिंप्लिफाई, सिनर्जाइज़ और स्केल पर रहा, यानी कारोबार को सरल बनाना, कंपनियों के बीच तालमेल बढ़ाना और बड़े पैमाने पर विस्तार करना।
चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने पारंपरिक कारोबारों के साथ-साथ नए दौर के क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की। टाटा की आधिकारिक प्रोफाइल के मुताबिक, उनके कार्यकाल में समूह ने सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमर इंटरनेट जैसे नए क्षेत्रों में कदम बढ़ाया। उनका व्यापक लक्ष्य टाटा समूह को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करना रहा।
यह बदलाव ऐसे समय में हुआ जब दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक और टेक्नोलॉजी आधारित हो रही थी। चंद्रशेखरन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीक के तौर पर देखा। 2026 में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में उन्होंने AI को 'इंफ्रास्ट्रक्चर ऑफ इंटेलिजेंस' बताया और भारत को AI को लेकर आशावादी देश के रूप में पेश किया।
चेयरमैन के तौर पर चंद्रशेखरन ने टाटा समूह की कई प्रमुख कंपनियों के बोर्ड का नेतृत्व किया। उनकी जिम्मेदारियों में टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, एयर इंडिया, टाटा केमिकल्स, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, इंडियन होटल्स और TCS जैसी कंपनियां शामिल रहीं।
इस दौर में समूह ने एयरलाइन कारोबार में भी बड़ा दांव लगाया। एयर इंडिया का टाटा समूह में वापस आना भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में विस्तार ने टाटा समूह की महत्वाकांक्षा को पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़ाया।
चंद्रशेखरन की प्रोफाइल को रतन टाटा के संदर्भ के बिना पूरा करना मुश्किल है। 2017 में जब उन्हें टाटा संस की कमान सौंपी गई, तब रतन टाटा समूह के चेयरमैन एमेरिटस थे और चयन प्रक्रिया में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 2022 में टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन का कार्यकाल पांच साल के लिए बढ़ाया था, और उस समय रतन टाटा ने भी उनके नेतृत्व में समूह की प्रगति पर संतोष जताया था।
रतन टाटा के निधन के बाद चंद्रशेखरन ने उन्हें अपना मेंटर, गाइड और मित्र बताया था। यह रिश्ता टाटा समूह के प्रोफेशनल नेतृत्व और उसके संस्थागत मूल्यों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी को दिखाता है।
चंद्रशेखरन का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब टाटा संस के नेतृत्व और टाटा ट्रस्ट्स के बीच शासन और उत्तराधिकार से जुड़े मतभेदों की खबरें हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, विवाद के केंद्र में टाटा संस की भविष्य की संरचना और उसके संभावित सार्वजनिक सूचीबद्ध होने जैसे मुद्दे भी हैं। हालांकि, चंद्रशेखरन या टाटा संस की ओर से इन घटनाक्रमों पर तत्काल सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की गई है।
टाटा संस टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है, और टाटा ट्रस्ट्स के पास इसमें करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यही वजह है कि चेयरमैन पद पर होने वाला कोई भी बदलाव केवल एक कंपनी का नेतृत्व परिवर्तन नहीं होता, बल्कि पूरे टाटा समूह की भविष्य की रणनीति पर असर डाल सकता है।
2017 से लेकर अब तक चंद्रशेखरन का कार्यकाल टाटा समूह के लिए बदलाव और विस्तार का दौर रहा। TCS से आए एक प्रोफेशनल के रूप में उन्होंने समूह की कमान संभाली और 'वन टाटा' के जरिए अलग-अलग कारोबारों को एक व्यापक रणनीति से जोड़ने की कोशिश की। सेमीकंडक्टर से लेकर एयरलाइन और डिजिटल कारोबार तक, समूह के नए क्षेत्रों में उतरने के पीछे उनकी रणनीतिक सोच दिखाई देती है।
अब उनके इस्तीफे के साथ टाटा समूह के सामने अगली पीढ़ी के नेतृत्व का सवाल खड़ा हो गया है। चंद्रशेखरन की सबसे बड़ी विरासत शायद यही होगी कि उन्होंने टाटा समूह को केवल मौजूदा कारोबारों का समूह बनाए रखने के बजाय भविष्य की तकनीक और नए उद्योगों की ओर मोड़ने की कोशिश की। उनकी कहानी एक ऐसे प्रोफेशनल की कहानी है, जिसने टाटा समूह में एक कर्मचारी के रूप में प्रवेश किया और उसी समूह के शीर्ष पद तक पहुंचकर भारतीय कॉरपोरेट इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई।
Updated on:
12 Aug 2026 12:20 pm
Published on:
12 Aug 2026 12:17 pm
