
भारत में लाखों छोटे व्यापारी, किराना स्टोर, मेडिकल स्टोर, मोबाइल शॉप, रेस्टोरेंट और सर्विस सेंटर किराये की दुकानों से संचालित होते हैं। दूसरी ओर कई कारोबारियों के पास अपनी दुकान या व्यावसायिक संपत्ति होती है। अधिकांश लोगों को लगता है कि बिजनेस लोन केवल कारोबार के टर्नओवर, मुनाफे और बैंकिंग रिकॉर्ड के आधार पर मिलता है, लेकिन हकीकत यह है कि दुकान का स्वामित्व भी बैंक के जोखिम मूल्यांकन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
यही वजह है कि कई बार दो समान कारोबारों को अलग-अलग ब्याज दर, लोन राशि या लोन स्वीकृति मिलती है। इसका एक बड़ा कारण दुकान का स्वामित्व होता है।
जब कोई बैंक या NBFC (नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी) बिजनेस लोन का आवेदन देखती है, तो वह यह समझने की कोशिश करती है कि कारोबार कितना स्थिर है। यदि कोई व्यवसाय कई वर्षों से एक ही स्थान पर चल रहा है और उस स्थान का स्वामित्व कारोबारी के पास है, तो इसे अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला माना जाता है।
इसके विपरीत, यदि दुकान किराये पर है और किरायानामा जल्द समाप्त होने वाला है, तो बैंक को यह जोखिम दिखाई देता है कि भविष्य में व्यवसाय को स्थान बदलना पड़ सकता है। इससे कारोबार प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि दुकान का स्वामित्व सीधे तौर पर लोन की पात्रता, राशि और शर्तों को प्रभावित कर सकता है।
यदि कारोबारी के पास अपनी दुकान है, तो बैंक इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखते हैं। सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि व्यवसाय की स्थिरता अधिक मानी जाती है। बैंक को लगता है कि कारोबारी को अचानक स्थान खाली नहीं करना पड़ेगा और व्यवसाय लंबे समय तक उसी जगह से संचालित हो सकता है।
यदि दुकान व्यावसायिक क्षेत्र में अच्छी लोकेशन पर स्थित है, तो उसकी बाजार कीमत भी बैंक के मूल्यांकन में सकारात्मक भूमिका निभा सकती है।
किराये की दुकान से व्यवसाय चलाना कोई नकारात्मक बात नहीं है। भारत में बड़ी संख्या में सफल व्यवसाय किराये की जगह से संचालित होते हैं। लेकिन बैंक कुछ अतिरिक्त पहलुओं की जांच करते हैं। उदाहरण के लिए समझते हैं।
यदि व्यवसाय कई वर्षों से एक ही किराये की दुकान से सफलतापूर्वक चल रहा है और उसके वित्तीय रिकॉर्ड मजबूत हैं, तो केवल किराये की दुकान होने से लोन मिलने में बड़ी बाधा नहीं आती। हालांकि कुछ मामलों में बैंक अपनी दुकान वाले कारोबारी की तुलना में थोड़ा अधिक जोखिम मान सकते हैं।
कई कारोबारी लंबी अवधि की लीज पर दुकान या कमर्शियल स्पेस लेते हैं। यह स्थिति किराये और स्वामित्व के बीच मानी जा सकती है। यदि लीज 10, 15 या 20 वर्षों जैसी लंबी अवधि की है और कानूनी रूप से मजबूत दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो बैंक इसे सामान्य किराये की व्यवस्था की तुलना में अधिक स्थिर मान सकते हैं। विशेष रूप से मॉल, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और औद्योगिक क्षेत्रों में संचालित व्यवसायों के लिए लीज मॉडल आम है।
हां, बिल्कुल मिल सकता है। वास्तव में कई बैंक और NBFC आज बिना किसी संपार्श्विक (Collateral) के भी MSME और बिजनेस लोन प्रदान करते हैं। ऐसे मामलों में दुकान का स्वामित्व अकेला निर्णयकारी कारक नहीं होता। बैंक मुख्य रूप से इन बातों पर ध्यान देते हैं।
यदि ये सभी पहलू मजबूत हैं, तो किराये की दुकान से संचालित व्यवसाय भी अच्छी लोन सीमा प्राप्त कर सकता है।
यदि दुकान अपनी है, तो आमतौर पर स्वामित्व संबंधी दस्तावेज मांगे जा सकते हैं, जैसे संपत्ति दस्तावेज, रजिस्ट्री, संपत्ति कर रसीद, बिजली बिल आदि। यदि दुकान किराये की है, तो बैंक यह दस्तावेज मांग सकते हैं। यदि दुकान लीज पर है, तो लीज एग्रीमेंट और उससे संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
कई बार हां। हालांकि ब्याज दर का मुख्य आधार व्यवसाय की वित्तीय स्थिति होती है, लेकिन बैंक के समग्र जोखिम मूल्यांकन में संपत्ति और व्यवसाय की स्थिरता भी शामिल होती है। यदि बैंक को लगता है कि व्यवसाय कम जोखिम वाला है, तो बेहतर शर्तों पर वित्त उपलब्ध होने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि यह हर बैंक और हर मामले में अलग-अलग हो सकता है।
दुकान अपनी हो या किराये की, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यवसाय का वित्तीय रिकॉर्ड मजबूत हो। विशेषज्ञों के अनुसार छोटे कारोबारियों को इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।