
Rocket Eastward Launch:जब भी कोई रॉकेट अंतरिक्ष की तरफ उड़ान भरता है, एक बात गौर करने लायक होती है, ज्यादातर रॉकेट पूर्व दिशा की तरफ ही लॉन्च किए जाते हैं। क्या यह कोई परंपरा है, या फिर इसके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक वजह छिपी है? दरअसल साइंटिस्ट के मुताबिक इसका जवाब है पृथ्वी रॉकेट की स्पीड को बूस्ट करने में मदद करती है।
पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमती है। भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की सतह की यह घूर्णन गति करीब 465 मीटर प्रति सेकंड, यानी लगभग 1,675 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। अब जब कोई रॉकेट लॉन्च पैड पर खड़ा होता है, तो वह भी पृथ्वी के साथ-साथ इसी गति से पहले से ही घूम रहा होता है। भले ही वो स्थिर खड़ा दिखे।
अब अगर रॉकेट को उसी दिशा में यानी पूर्व की तरफ उड़ाया जाए, तो पृथ्वी की यह मौजूदा गति उसकी अपनी स्पीड में जुड़ जाती है। इसे समझने का सबसे आसान तरीका है। किसी घूमते हुए प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर उसी दिशा में छलांग लगाना। आपकी छलांग में प्लेटफॉर्म की गति अपने आप शामिल हो जाती है। रॉकेट के साथ भी बिल्कुल यही होता है।
किसी सैटेलाइट को धरती की कक्षा में स्थिर रखने के लिए सिर्फ ऊंचाई पर पहुंच जाना काफी नहीं है। रॉकेट को इतनी तेज क्षैतिज (horizontal) गति हासिल करनी होती है कि वह पृथ्वी की तरफ गिरते हुए भी लगातार उसकी सतह को 'मिस' करता रहे। इसी को ऑर्बिटल मोशन कहते हैं। पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) तक पहुंचने के लिए करीब 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार चाहिए होती है।
अगर लॉन्च से पहले ही 1,675 km/h की गति मुफ्त में मिल जाए, तो रॉकेट के इंजन पर बोझ कुछ कम हो जाता है। हालांकि यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है, यह पूरा हिसाब इतना सीधा नहीं कि 28,000 में से बस 1,675 घटा दिया जाए। असल मिशन में लेटिट्यूड, ऑर्बिट का झुकाव (inclination), ग्रेविटी लॉसेस, एटमॉस्फेरिक ड्रेग जैसी कई चीजें शामिल होती हैं। फिर भी, कम झुकाव वाली कक्षाओं के लिए भूमध्य रेखा के करीब से लॉन्च करना ईंधन बचाने या ज्यादा वजन ऑर्बिट में भेजने में काफी मदद करता है।
भारत का सतीश धवन स्पेस सेंटर, यानी श्रीहरिकोटा, देश के पूर्वी समुद्री तट पर स्थित है। इसकी वजह सिर्फ 'पूर्व में होना' नहीं है। यह भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब है, समुद्र की तरफ एक लंबा और खुला रास्ता (launch corridor) मिलता है और आसपास आबादी भी कम है। इससे रॉकेट का ट्रैजेक्टरी समुद्र की तरफ रखा जा सकता है, जिससे किसी दुर्घटना की स्थिति में आबादी वाले इलाकों को खतरा कम होता है।
नहीं, और यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ है। रॉकेट किस दिशा में जाएगा, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि सैटेलाइट को किस तरह की कक्षा में पहुंचाना है। अगर मिशन कम झुकाव वाली (low-inclination) कक्षा का है, तो पूर्व दिशा का फायदा भरपूर मिलता है। लेकिन अगर सैटेलाइट को पोलर ऑर्बिट यानी उत्तर-दक्षिण दिशा वाली कक्षा में भेजना हो, तो पृथ्वी के घूर्णन का यह 'फ्री राइड' काफी हद तक बेअसर हो जाता है और उतनी ही ऊंचाई तक पहुंचने के लिए ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ सकती है।
भारत के PSLV मिशन इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। 2017 में PSLV-C37 ने एक साथ 104 सैटेलाइट को करीब 506 किमी की सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित किया, जिसका झुकाव 97.46 डिग्री था। इसी तरह PSLV-C52 ने EOS-04 सैटेलाइट को 529 किमी की सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में पहुंचाया। दूसरी तरफ, PSLV-C30 ने AstroSat को महज 6 डिग्री झुकाव वाली 650 किमी ऑर्बिट में भेजा। यहां पूर्व दिशा का पूरा फायदा उठाया गया।
इसका जवाब है, दोनों। दरअसल लॉन्च ट्रैजेक्टरी सिर्फ इस आधार पर तय नहीं होती कि किस दिशा में सबसे ज्यादा एनर्जी बचेगी। यह भी देखा जाता है कि अगर रॉकेट में कोई खराबी आए, तो उसका मलबा कहां गिर सकता है और रास्ता किसी आबादी वाले इलाके के ऊपर से तो नहीं गुजर रहा।
तो 'रॉकेट हमेशा पूर्व दिशा में लॉन्च होते हैं', यह बात पूरी तरह सही नहीं है। असली सच यह है कि पृथ्वी की अपनी घूर्णन गति की वजह से पूर्व दिशा में लॉन्च करना कई मिशनों के लिए ऊर्जा बचाने का एक स्मार्ट तरीका है। खासकर तब जब, सैटेलाइट को कम झुकाव वाली कक्षा में भेजना हो। लेकिन असल दिशा हमेशा सैटेलाइट की मंजिल, पृथ्वी का घूर्णन और नीचे मौजूद लोगों की सुरक्षा, इन तीनों को मिलाकर ही तय की जाती है।