
आज भारतीय फिल्म उद्योग में महिला संगीतकारों की मौजूदगी सामान्य बात लगती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब फिल्म संगीत की दुनिया पूरी तरह पुरुषों के कब्जे में मानी जाती थी। ऐसे दौर में एक महिला ने न सिर्फ इस क्षेत्र में कदम रखा, बल्कि अपनी प्रतिभा से इतिहास रच दिया। वह थीं सरस्वती देवी, जिन्हें हिंदी सिनेमा की पहली महिला संगीतकार माना जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस नाम से उन्हें आज याद किया जाता है, वह उनका जन्म का नाम नहीं था। उनकी जिंदगी की कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उतनी ही रोचक भी।
सरस्वती देवी का जन्म 1912 में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम खुर्शीद मिनोचर होमजी था। बचपन से ही उनका झुकाव संगीत की ओर था और परिवार ने भी उनकी इस रुचि को प्रोत्साहित किया।
उनके पिता ने उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने प्रसिद्ध संगीताचार्य विष्णु नारायण भातखंडे के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया। बाद में उन्होंने लखनऊ के प्रतिष्ठित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक से औपचारिक संगीत शिक्षा हासिल की।
संगीत की दुनिया में उनकी शुरुआती पहचान रेडियो के माध्यम से बनी। अपनी बहन मानेक के साथ वे ‘होमजी सिस्टर्स’ के नाम से कार्यक्रम प्रस्तुत करती थीं। उस दौर में उनकी प्रस्तुतियां काफी लोकप्रिय थीं और यहीं से उनकी प्रतिभा व्यापक स्तर पर पहचानी जाने लगी।
खुर्शीद मिनोचर होमजी का फिल्मी दुनिया से परिचय बॉम्बे टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु राय के जरिए हुआ। राय अपने स्टूडियो के लिए ऐसे संगीतकार की तलाश में थे जो पारंपरिक सोच से अलग होकर काम कर सके। यह तलाश उन्हें खुर्शीद तक ले आई। यहीं उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जो आज भी उनकी कहानी का सबसे चर्चित हिस्सा है।
अक्सर यह कहा जाता है कि पारसी समुदाय के विरोध के कारण उन्होंने अपना नाम बदला, लेकिन घटनाक्रम इससे थोड़ा अलग था। दरअसल, नाम बदलने का निर्णय खुद खुर्शीद ने नहीं लिया था। एक अवसर पर संभावित विवाद और सामाजिक तनाव को देखते हुए हिमांशु राय ने उनका नया नाम 'सरस्वती देवी' रख दिया।
इसके बाद जब उनकी पहली फिल्म ‘जवानी की हवा’ (1935) रिलीज हुई, तब पारसी समुदाय के कुछ वर्गों ने इसका विरोध किया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि फिल्म के कुछ शो पुलिस निगरानी में आयोजित करने पड़े। हालांकि बाद में बॉम्बे टॉकीज़ के पारसी ट्रस्टियों ने हस्तक्षेप कर विवाद को शांत कराया। यानी नाम परिवर्तन विरोध का परिणाम नहीं था, बल्कि विरोध नाम बदलने के बाद सामने आया।
1935 में रिलीज हुई ‘जवानी की हवा’ के साथ सरस्वती देवी का फिल्मी सफर शुरू हुआ। हालांकि उनकी वास्तविक पहचान अगले वर्ष आई फिल्म ‘अछूत कन्या’ (1936) से बनी, जो उस दौर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक थी।
इस फिल्म की सफलता ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख संगीतकारों की कतार में ला खड़ा किया। उनकी धुनों में शास्त्रीय संगीत की गहराई भी थी और लोकप्रियता का आकर्षण भी, यही वजह थी कि वे जल्दी ही दर्शकों और फिल्मकारों की पसंद बन गईं।
1936 में ही आई फिल्म ‘जन्मभूमि’ सरस्वती देवी के करियर की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि लेकर आई। यह फिल्म स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से प्रेरित थी। इसी फिल्म के लिए उन्होंने 'जय जय जननी जन्मभूमि' गीत को संगीतबद्ध किया। इसे हिंदी सिनेमा का पहला देशभक्ति गीत माना जाता है।
उस समय जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, यह गीत केवल मनोरंजन का हिस्सा नहीं था, बल्कि राष्ट्रभावना को मजबूत करने वाला सांस्कृतिक माध्यम भी बन गया।
बॉम्बे टॉकीज़ की पहचान बनीं सरस्वती देवी : इसके बाद सरस्वती देवी ने बॉम्बे टॉकीज़ की कई महत्वपूर्ण फिल्मों में संगीत दिया। जानें उनकी कुछ फिल्में…।
बॉम्बे टॉकीज़ के स्वर्णिम दौर में बनने वाली अधिकांश चर्चित फिल्मों के गीतों और पार्श्व संगीत में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
1930 और 1940 के दशक में फिल्म उद्योग में काम करना ही महिलाओं के लिए आसान नहीं था। अभिनय और संगीत जैसे क्षेत्रों को समाज सम्मानजनक पेशे के रूप में नहीं देखता था। ऐसे समय में एक महिला का संगीत निर्देशक बनना असाधारण उपलब्धि थी।
सरस्वती देवी और उनकी बहन को अपने समुदाय के भीतर भी आलोचना और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने इन बाधाओं को अपनी राह का अंत नहीं बनने दिया।
उन्होंने उस क्षेत्र में पहचान बनाई, जहां लगभग सभी बड़े नाम पुरुषों के थे। यही वजह है कि उनका योगदान केवल संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा में महिलाओं की भागीदारी के इतिहास का भी महत्वपूर्ण अध्याय है।
सरस्वती देवी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा और समर्पण किसी लैंगिक सीमा को नहीं मानते। उन्होंने ऐसे समय में संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली, जब महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में जगह बनाना लगभग असंभव माना जाता था। उनकी सफलता ने आने वाली पीढ़ियों की महिला कलाकारों और संगीतकारों के लिए रास्ता खोला।
आज जब भारतीय फिल्म उद्योग में महिलाएं संगीत निर्देशन, लेखन, निर्देशन और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं, तो उसकी बुनियाद में सरस्वती देवी जैसी अग्रणी हस्तियों का संघर्ष और साहस भी शामिल है।
खुर्शीद मिनोचर होमजी से सरस्वती देवी बनने तक का सफर सिर्फ नाम बदलने की कहानी नहीं है। यह उस महिला की कहानी है जिसने सामाजिक विरोध, परंपरागत सोच और पुरुष वर्चस्व वाली व्यवस्था को चुनौती देकर अपनी जगह बनाई।