
करीब 28 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची (World Heritage List) में शामिल कर लिया गया है। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि दशकों तक चले वैज्ञानिक शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रयासों का परिणाम है। आइए विस्तार से समझते हैं कि सारनाथ को यह दर्जा क्यों मिला, इसकी प्रक्रिया क्या होती है और इसका महत्व कितना बड़ा है।
दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति (World Heritage Committee) के 48वें सत्र में सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की घोषणा की गई। इसके साथ ही सारनाथ भारत का 45वां और उत्तर प्रदेश का चौथा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बन गया। इससे पहले उत्तर प्रदेश से केवल ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी ही इस सूची में शामिल थे।
यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त संपत्ति में दो प्रमुख हिस्से शामिल हैं। पहला, चौखंडी स्तूप, जो उस स्थान का प्रतीक है जहां भगवान बुद्ध का अपने पांच प्रथम शिष्यों से मिलन हुआ था। दूसरा, सारनाथ का पुरातात्विक परिसर, जिसमें धमेख स्तूप, प्राचीन विहारों के अवशेष और सम्राट अशोक का स्तंभ शामिल हैं। आइए जानते हैं सारनाथ को यह दर्जा क्यों मिला?
ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। यहीं से बौद्ध संघ की स्थापना हुई और करुणा, शांति तथा मध्यम मार्ग का संदेश दुनिया भर में फैला। लगभग 2,600 वर्षों से यह स्थल बौद्ध श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
यूनेस्को की मूल्यांकन टीम ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया था कि निर्माण काल से लेकर आज तक ऐसी कौन-सी परंपरा जीवित है, जो सीधे इस स्तूप से जुड़ी हो।
इसका उत्तर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के माध्यम से दिया। उनके अनुसार, धमेख स्तूप पर उकेरी गई फूल-बेल जैसी नक्काशी काशी की पारंपरिक रेशमी बुनाई शैली का प्रतीक है, जिसे 'देवदुष्य' (दैवीय वस्त्र) परंपरा से जोड़ा जाता है।
शोध के अनुसार, मौर्य सम्राट अशोक के काल में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान बौद्ध अनुयायी स्तूप पर रेशमी वस्त्र लपेटते थे। यह परंपरा आज भी किसी न किसी रूप में जीवित है। इसी सांस्कृतिक निरंतरता ने सारनाथ की दावेदारी को मजबूत आधार प्रदान किया।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस फैसले को भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत का सम्मान बताया। उनके अनुसार, यह मान्यता ज्ञान, करुणा और सद्भाव के उस शाश्वत संदेश को वैश्विक स्तर पर स्वीकार करती है, जो सारनाथ से दुनिया तक पहुंचा।
| 📅 वर्ष | 🏛️ प्रमुख घटना |
|---|---|
| 1968 | अमेरिका और उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से सारनाथ पर वैज्ञानिक अध्ययन शुरू |
| 1993 | प्रो. राणा पी.बी. सिंह और अन्य विशेषज्ञों का पहला अंतरराष्ट्रीय शोध प्रकाशित |
| 3 जुलाई 1998 | UNESCO की टेंटेटिव (संभावित) सूची में शामिल |
| 2023 | पर्यटन और प्रशासनिक चुनौतियों पर शोध रिपोर्ट |
| 2024 | संशोधित नामांकन प्रस्ताव ICOMOS को प्रस्तुत |
| अक्टूबर 2025 | ICOMOS विशेषज्ञ प्रो. मोहम्मद हबीब द्वारा निरीक्षण |
| दिसंबर 2025 | अंतिम मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार |
| जनवरी–फरवरी 2026 | रिपोर्ट ICOMOS को सौंपी गई, फिर UNESCO को भेजी गई |
| जुलाई 2026 | बुसान में 48वें सत्र में विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की घोषणा |
यानी आधिकारिक नामांकन प्रक्रिया भले ही 28 वर्षों तक चली हो, लेकिन इसकी वैज्ञानिक नींव लगभग 58 वर्ष पहले रखी जा चुकी थी। इस पूरी यात्रा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और अंतरराष्ट्रीय संस्था ICOMOS की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यूनेस्को का विश्व धरोहर दर्जा कैसे मिलता है? यह एक लंबी और बहुस्तरीय प्रक्रिया है, जिसे समझना जरूरी है।
सबसे पहले किसी देश को अपनी सरकार के माध्यम से संबंधित स्थल को यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट (Tentative List) में शामिल कराना होता है। यह नामांकन प्रक्रिया का पहला औपचारिक चरण होता है। सारनाथ को यह दर्जा 1998 में मिला था।
इसके बाद देश को एक विस्तृत नामांकन दस्तावेज (Nomination Dossier) तैयार करना पड़ता है। इसमें यह साबित करना होता है कि संबंधित स्थल में "असाधारण सार्वभौमिक मूल्य" (Outstanding Universal Value - OUV) मौजूद है।
यूनेस्को के निर्धारित 10 मानदंडों में से कम-से-कम एक मानदंड को पूरा करना अनिवार्य होता है। उदाहरण के लिए, मानव प्रतिभा की उत्कृष्ट कृति होना, किसी सांस्कृतिक परंपरा का असाधारण प्रमाण होना या किसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना से जुड़ा होना।
सांस्कृतिक स्थलों के लिए ICOMOS और प्राकृतिक स्थलों के लिए IUCN जैसी संस्थाएं स्थल का विस्तृत निरीक्षण करती हैं। वे उसकी प्रामाणिकता (Authenticity), अखंडता (Integrity) और संरक्षण की स्थिति का मूल्यांकन करती हैं। सारनाथ के मामले में यह प्रक्रिया अक्टूबर 2025 में पूरी हुई थी।
सलाहकार संस्थाओं की रिपोर्ट और सिफारिशों के आधार पर यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति अपने वार्षिक सत्र में अंतिम निर्णय लेती है। यह समिति दुनिया के 21 सदस्य देशों से मिलकर बनती है और हर वर्ष अलग-अलग शहर में बैठक आयोजित करती है। इस बार यह सत्र दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित हुआ।
विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद कोई भी स्थल केवल उस देश की संपत्ति नहीं रह जाता, बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत बन जाता है। इसके बाद संबंधित देश को उसके संरक्षण, प्रबंधन और निगरानी की जिम्मेदारी निभानी होती है। यूनेस्को समय-समय पर इसकी समीक्षा भी करता है।