
आज 10 अगस्त है। यही वह तारीख है जब 1977 में स्वतंत्रता सेनानी, कवि और राष्ट्रभक्त श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' का निधन हुआ था। उन्हें भारत हमेशा एक विशेष कारण से याद रखेगा। उन्होंने वह अमर गीत लिखा, जो आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर झंडारोहण के अवसर पर गूंजता है। 'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।'
लेकिन, इस गीत और इसके रचनाकार की कहानी उतनी सरल नहीं है, जितनी अक्सर सुनाई जाती है। यह कहानी स्वतंत्रता आंदोलन, जेल की सलाखों, साहित्य और अद्भुत संकल्प से होकर गुजरती है।
श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' का जन्म कानपुर जिले के नरवल गांव में हुआ था। हालांकि उनकी जन्मतिथि को लेकर विभिन्न स्रोतों में मतभेद मिलता है। कुछ स्रोत 9 सितंबर 1896 का उल्लेख करते हैं, जबकि विकिपीडिया सहित कई अन्य स्रोत 16 सितंबर 1893 को उनकी जन्मतिथि बताते हैं।
बचपन से ही उनके भीतर साहित्य और देशभक्ति के संस्कार गहरे थे। स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से प्रभावित होकर उन्होंने फतेहपुर को अपनी कर्मभूमि बनाया और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी शुरू की।
इस सक्रियता की कीमत उन्हें जेल जाकर चुकानी पड़ी। 21 अगस्त 1921 को उन्हें रानी असोथर के महल से गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन जेल उनके विचारों को कैद नहीं कर सकी।
झंडा गीत की कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि इसकी रचना किसी खुले मंच पर नहीं, बल्कि फतेहपुर जेल की बैरक नंबर 9 में हुई थी। 3-4 मार्च 1924 की रात, जेल की उसी कोठरी में पार्षद जी ने वे पंक्तियां लिखीं, जो आगे चलकर करोड़ों भारतीयों की आवाज बन गईं।
सुबह होते ही उन्होंने यह गीत गणेश शंकर विद्यार्थी को भेजा। विद्यार्थी जी को यह रचना बेहद पसंद आई और यहीं से इस गीत की ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई।
गीत लिखे जाने के लगभग एक महीने बाद, 13 अप्रैल 1924 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की बरसी पर कानपुर के फूलबाग मैदान में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। उस कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। हजारों लोगों ने सामूहिक रूप से यह गीत गाया और इसकी गूंज दूर तक सुनाई दी। बताया जाता है कि नेहरू इस गीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा - भले ही लोग श्यामलाल गुप्त को व्यक्तिगत रूप से न जानते हों, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज पर लिखे उनके इस गीत से अब पूरा देश परिचित हो चुका है।
दिलचस्प बात यह है कि इस गीत को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया एक दिन में पूरी नहीं हुई। इसे अलग-अलग अवसरों पर पहचान और सम्मान मिलता गया।
इन्हीं पड़ावों से गुजरते हुए यह गीत धीरे-धीरे पूरे देश का 'झंडा गीत' बन गया। यह किसी सरकारी घोषणा का परिणाम नहीं, बल्कि जनता और राष्ट्रीय आंदोलन द्वारा मिली स्वीकृति का प्रतीक था।
आजादी के बाद 15 अगस्त 1952 को श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' ने स्वयं लाल किले की प्राचीर से यह गीत गाया। एक कवि के लिए इससे बड़ा सम्मान शायद ही कोई हो सकता है कि जिस गीत की रचना उसने जेल में एक बंदी के रूप में की थी, उसी गीत को वह स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय मंच से स्वयं प्रस्तुत करे।
पार्षद जी केवल कवि नहीं थे, बल्कि पूर्णतः समर्पित स्वतंत्रता सेनानी भी थे। 1921 में उन्होंने एक प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक भारत स्वतंत्र नहीं होगा, तब तक वे न जूते-चप्पल पहनेंगे और न ही धूप या बारिश से बचने के लिए छाते का उपयोग करेंगे। उन्होंने यह संकल्प पूरी निष्ठा से निभाया। फतेहपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहने के बावजूद वे वर्षों तक नंगे पांव चलते रहे।
उनकी सादगी से जुड़ा एक भावुक प्रसंग भी अक्सर याद किया जाता है। जनवरी 1973 में जब उन्हें पद्मश्री सम्मान ग्रहण करने के लिए राष्ट्रपति भवन बुलाया गया, तब वे नंगे पांव, खादी की साधारण धोती और सिकुड़े हुए कुर्ते में वहां पहुंचे।
कहा जाता है कि उनकी सादगी देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं उनके पास आईं और भावुक हो गईं। इससे एक वर्ष पहले, 1972 में, लाल किले पर भी उनका विशेष सम्मान किया गया था।
श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' का योगदान केवल एक गीत तक सीमित नहीं है। उनकी स्मृति आज भी विभिन्न रूपों में जीवित है।
'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा' केवल एक देशभक्ति गीत नहीं है। यह उस अदम्य विश्वास की कहानी है, जो जेल की चारदीवारी के भीतर भी जीवित रहा। यह एक ऐसे कवि की कहानी है जिसने कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के शब्द गढ़े।