
उत्तर प्रदेश में बीते कुछ वर्षों में सरकारी जमीन, ग्राम समाज, तालाब, सड़क, नहर और अन्य सार्वजनिक भूमि पर बने अवैध निर्माणों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाए गए हैं। कई जगह प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर कब्जे हटाए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी व्यक्ति का घर सरकारी जमीन पर बना है तो उसका क्या होगा? क्या प्रशासन कभी भी घर गिरा सकता है? क्या नोटिस देना जरूरी है? और लोगों के क्या अधिकार हैं?
यह पूरा मामला केवल यूपी सरकार की नीति से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों से भी जुड़ा हुआ है। लेकिन इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक बात साफ समझ लेनी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की नोटिस और सुनवाई वाली सुरक्षा हर तरह की सरकारी जमीन पर लागू नहीं होती। सड़क, फुटपाथ, तालाब, नहर और रेलवे भूमि पर बने कब्जों को इस सुरक्षा से बाहर रखा गया है।
सरकारी जमीन वह भूमि होती है जिसका मालिकाना हक राज्य सरकार, केंद्र सरकार, ग्राम पंचायत, विकास प्राधिकरण, नगर निगम, सिंचाई विभाग, रेलवे या किसी सरकारी संस्था के पास होता है।
इसके अंतर्गत शामिल हो सकती हैं:
यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति इन जमीनों पर निर्माण करता है तो उसे अतिक्रमण माना जाता है। लेकिन जैसा आगे बताया गया है, इनमें से हर तरह की जमीन पर कानूनी सुरक्षा एक जैसी नहीं है।
अवैध कब्जा
- जमीन सरकारी हो और उस पर बिना अनुमति निर्माण किया गया हो।
- नक्शा पास न हो।
- राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज न हो।
- पट्टा या स्वामित्व का कोई वैध दस्तावेज न हो।
वैध मकान
- जमीन का मालिकाना हक या वैध पट्टा हो।
- राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज हो।
- नगर निकाय या विकास प्राधिकरण से आवश्यक अनुमति ली गई हो।
- निर्माण नियमों का पालन किया गया हो।
कई बार मकान निजी जमीन पर बना होता है लेकिन नक्शा स्वीकृत नहीं होता। ऐसे मामलों में पूरा मकान अवैध नहीं माना जाता, बल्कि निर्माण का संबंधित हिस्सा नियमों के विरुद्ध माना जा सकता है।
योगी सरकार ने सार्वजनिक जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए विशेष अभियान चला रखा है। राजस्व विभाग, नगर निकाय, विकास प्राधिकरण और पुलिस संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हैं।
सरकार का तर्क है कि तालाब, सड़क, नहर, चारागाह और ग्राम समाज की भूमि पर अवैध कब्जे हटाना जरूरी है ताकि सार्वजनिक संपत्ति बचाई जा सके। हाल के वर्षों में हजारों हेक्टेयर सरकारी भूमि को कब्जामुक्त कराने का दावा किया गया है।
हालांकि कार्रवाई करते समय प्रशासन को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। लेकिन, यह प्रक्रिया किस तरह की जमीन पर कितनी लागू होती है, यह समझना जरूरी है।
13 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने Directions in the Matter of Demolition of Structures मामले में पैन-इंडिया दिशा-निर्देश जारी किए। यह फैसला मूल रूप से उन मामलों को रोकने के लिए आया था जहां किसी व्यक्ति का घर सिर्फ इसलिए गिरा दिया जाता था क्योंकि वह किसी अपराध में आरोपी या दोषी था। इसे 'बुलडोजर जस्टिस' या दंडात्मक तोड़फोड़ कहा गया। कोर्ट ने कहा कि यह तरीका कानून के शासन और सत्ता के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि किसी के दोषी होने का फैसला सिर्फ अदालत कर सकती है, प्रशासन नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में एक अपवाद रखा है- यह दिशा-निर्देश उन अनधिकृत निर्माणों पर लागू नहीं होते जो सड़क, गली, फुटपाथ, रेलवे लाइन के किनारे, या किसी नदी/तालाब/जलाशय जैसी सार्वजनिक जगह पर बने हों, और न ही उन मामलों पर जहां किसी अदालत ने पहले से तोड़फोड़ का आदेश दे रखा हो।
इसका सीधा मतलब है: तालाब, सड़क, नहर, फुटपाथ, रेलवे भूमि पर बना अतिक्रमण, इस पर प्रशासन बिना 15-दिन के कारण बताओ नोटिस के भी कार्रवाई कर सकता है। यहां सुप्रीम कोर्ट की यह विशेष सुरक्षा लागू नहीं होती। ग्राम समाज या आवासीय प्रयोजन की सरकारी जमीन पर बने घर, खासकर जहां कार्रवाई किसी आरोपी/दोषी को दंडित करने के इरादे से हो रही हो। यहां नोटिस, सुनवाई और लिखित आदेश की प्रक्रिया अनिवार्य मानी जाएगी।
यानी सिर्फ 'जमीन सरकारी है' कह देने भर से यह तय नहीं होता कि किसी घर को कितनी कानूनी सुरक्षा मिलेगी। जमीन की प्रकृति (सड़क/तालाब जैसी सार्वजनिक उपयोग की भूमि बनाम सामान्य ग्राम समाज/आवासीय भूमि) और कार्रवाई का मकसद (सामान्य अतिक्रमण हटाना बनाम किसी को दंडित करना), दोनों मायने रखते हैं।
यह पूरी तरह से जमीन की प्रकृति पर निर्भर करता है। अगर मामला सड़क, तालाब, नहर, फुटपाथ या रेलवे भूमि जैसी सार्वजनिक जगह का है, तो प्रशासन स्थानीय कानूनों के तहत सामान्य प्रक्रिया अपनाकर कार्रवाई कर सकता है; सुप्रीम कोर्ट की 15-दिन वाली विशेष सुरक्षा यहां लागू नहीं मानी जाएगी।
अगर मामला आवासीय सरकारी/ग्राम समाज भूमि का है, खासकर जहां कार्रवाई किसी को दंडित करने की तरह दिख रही हो, तो सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि निर्धारित प्रक्रिया - नोटिस, सुनवाई, लिखित आदेश - का पालन किए बिना संपत्ति नहीं गिराई जा सकती।
यह पूरी तरह मामले की प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि जमीन सार्वजनिक उपयोग की है (सड़क, तालाब, नहर आदि) और कब्जा साबित हो जाता है, तो प्रशासन सामान्यतः बिना विस्तृत नोटिस-सुनवाई प्रक्रिया के भी निर्माण हटा सकता है।
वहीं अगर जमीन आवासीय प्रकृति की सरकारी/ग्राम समाज भूमि है, तो कब्जा साबित होने पर भी नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण हटाने पर पूर्ण रोक नहीं है, लेकिन जहां प्रक्रिया लागू होती है वहां उसका पालन जरूरी है। यानी अदालत ने अवैध कब्जों को संरक्षण नहीं दिया, बल्कि तय किया कि प्रक्रिया कहां लागू होगी और कहां नहीं।
यदि कार्रवाई गलत लगती है तो व्यक्ति जिलाधिकारी के समक्ष अपील, राजस्व न्यायालय, सिविल कोर्ट या हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
यदि किसी वैध निर्माण को गलत तरीके से या प्रक्रिया का पालन किए बिना गिरा दिया जाता है, तो अदालत मुआवजा देने और जिम्मेदार अधिकारियों पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दे सकती है।
एक फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि "बुलडोजर जस्टिस" कानून के शासन के अनुरूप नहीं है और किसी भी कार्रवाई में वैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य की शक्ति का उपयोग बदले की भावना से नहीं किया जा सकता।
16 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 के फैसले के कथित उल्लंघन से जुड़ी अवमानना याचिकाओं को सीधे सुनने से इनकार कर दिया और इन्हें संबंधित हाईकोर्ट को भेज दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हर मामले में तथ्यात्मक विवाद अलग-अलग होते हैं, इसलिए शीर्ष अदालत हर मामले पर तथ्यों के आधार पर फैसला नहीं दे सकती। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि नवंबर 2024 का फैसला अवैध निर्माणों को पूर्ण संरक्षण देने के लिए नहीं था।