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भारत में जलवायु परिवर्तन से घट रहा दुग्ध उत्पादन; मवेशियों की नस्लें हो रहीं प्रभावित, 16 साल की स्टडी में बड़ा खुलासा

Milk Production in India: विश्व में दुग्ध उत्पादन करने वाले देशों में भारत पहले स्थान पर है। देश में साल 2025 में करीब 247.87 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ। अब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का असर देश के दूध उत्पादन (Milk Production) पर पड़ रहा है।
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भारत

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Vinay Shakya

Jul 22, 2026

Milk production in india

भारत में जलवायु परिवर्तन से घट रहा दुग्ध उत्पादन (सांकेतिक इमेज-AI)

Climate Change Impact: भारत करीब 32.8 करोड़ वर्ग किलोमीटर की आबादी में फैला है। विश्व स्तर पर भारत कुल भू-भाग का करीब 2.4 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है। इस बड़ी आबादी वाले देश पर जलवायु परिवर्तन का असर (Climate Change Effect) दिख रहा है। देश की करीब 64 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। बढ़ते तापमान, नमी और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब भारत के कृषि और डेयरी सेक्टर को सीधे प्रभावित कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन से डेयरी सेक्टर प्रभावित

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) की 16 वर्ष की शोध (2004-2019) में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। NDRI की शोध के मुताबिक, देश में दुग्ध उत्पादन घट रहा है। दुग्ध उत्पादन करने वाले राज्यों में शामिल हरियाणा में जलवायु परिवर्तन के कारण दूध का उत्पादन कम हुआ है। यह अध्ययन 19 जिलों के 1,100 से अधिक गांवों के पशुओं और मौसम डेटा पर आधारित है।

शोधकर्ताओं ने दूध उत्पादन के रिकॉर्ड को जलवायु संकेतकों तापमान, नमी, बारिश, तापमान-आर्द्रता सूचकांक और संभावित वाष्पोत्सर्जन से जोड़कर विश्लेषण किया है। संभावित वाष्पोत्सर्जन हवा में नमी की उपस्थिति का एक माप है, जो तापमान, आर्द्रता और सौर विकिरण (Solar Radiation) के असर को मिलाकर गर्मी के तनाव का बेहतर आकलन करता है।

रिसर्च में पाया गया कि जुलाई-अगस्त के मानसून महीनों में 38 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान और 70 प्रतिशत से ज्यादा नमी वाले मौसम में दूध उत्पादन में काफी कमी आई है। संभावित वाष्पोत्सर्जन का ऊंचा स्तर गर्मी के समय तापमान से भी ज्यादा सटीक संकेत देता है। NDRI अध्ययन और अन्य रिपोर्ट्स दोनों इस बात की पुष्टि हुई है कि देसी नस्लें जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा लचीली हैं।

कौन सी नस्लें सबसे ज्यादा प्रभावित?

भैंसें सबसे संवेदनशील: भैस की काली त्वचा ज्यादा सौर विकिरण सोख लेती है और पसीने की ग्रंथियां कम होने से गर्मी निकालना मुश्किल होता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन का असर भैंस पर अधिक होता है।

देसी नस्लें लचीली: साहीवाल, राठी, थारपारकर और हरियाणा जैसी नस्ल की भेंसे ढीली त्वचा, बेहतर पसीना निकालने की क्षमता एवं कम चयापचय ऊष्मा उत्पादन (Metabolic Heat Production) करने में सक्षम हैं। इसलिए देसी नस्ल की भैंसे गर्मी और नमी में भी अपेक्षाकृत स्थिर दूध उत्पादन बनाए रखती हैं।

क्रॉसब्रीड मवेशी: इन मवेशियों में दूध उत्पादन की क्षमता हीटवेव के दौरान तेजी से गिरती है।

NDRI की पूरे देश के लिए चेतावनी

राष्ट्रीय स्तर पर NDRI के शोधार्थियों ने पुष्टि की है कि भैंस और क्रॉसब्रीड पशुधन जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। वहीं, देसी नस्लें बेहतर अनुकूलन क्षमता रखती हैं। NDRI और CEEW जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स इशारा करती हैं कि अगर क्रॉसब्रीड और भैंसों की संख्या बढ़ती रही तो पूरा सेक्टर ज्यादा संवेदनशील हो जाएगा। हरियाणा जैसे राज्य जहां डेयरी अर्थव्यवस्था मजबूत है, वहां तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

किसानों को जलवायु-अनुकूल प्रथाओं छाया, बेहतर चारा प्रबंधन, देसी नस्ल संरक्षण और पानी की उपलब्धता के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। NDRI की यह स्टडी सिर्फ हरियाणा तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे भारत के डेयरी भविष्य के लिए चेतावनी है। बढ़ते तापमान और नमी के बीच दूध उत्पादन बनाए रखना किसानों की आय और देश की पोषण सुरक्षा दोनों के लिए जरूरी है। देसी नस्लों को संरक्षित करते हुए आधुनिक प्रबंधन को अपनाना ही सही रणनीति है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो जलवायु परिवर्तन लाखों डेयरी किसानों की रोजी-रोटी को खतरे में डाल सकता है।

दूध उत्पादन में भारत का विश्व में पहला स्थान

दूध उत्पादन में भारत वैश्विक रैंक में पहले स्थान पर है। PIB की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024-25 के दौरान देश में कुल दूध उत्पादन करीब 247.87 मिलियन टन रहा। यह आकड़ा वर्ष 2023-24 से 3.58 प्रतिशत अधिक है। साल 2023-24 में कुल दूध उत्पादन करीब 239.30 मिलियन टन रहा। आकड़े के हिसाब से 2024-25 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 485 ग्राम/दिन हो गई है।

टॉप-5 दूध उत्पादक राज्य: देश के कुल दूध उत्पादन में 5 राज्य 54.09 प्रतिशत का योगदान करते हैं। इन राज्यों में विदेशी/संकर नस्ल के मवेशियों से दूध उत्पादन होता है। साल 2025 में पूर्व वर्ष की तुलना में 4.97 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। राज्यों के अनुसार, दूध उत्पादन का प्रतिशत-

  • उत्तर प्रदेश -15.66 प्रतिशत
  • राजस्थान - 14.82 प्रतिशत
  • मध्य प्रदेश - 9.12 प्रतिशत
  • गुजरात - 7.78 प्रतिशत
  • महाराष्ट्र - 6.71 प्रतिशत

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

हरियाणा सरकार के पूर्व कमिश्नर और भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के पूर्व सदस्य मोहन सिंह अहलूवालिया ने इस अध्ययन के निष्कर्षों को पूरे भारत की क्षेत्रीय स्थितियों से मिलाजुला बताया है। मोहन सिंह अहलूवालिया ने कहा- गर्म मौसम में भैंस, क्रॉसब्रीड और होल्स्टीन फ्राइजियन (HF) गायों का दूध उत्पादन काफी कम हो जाता है।

साहीवाल, राठी, थारपारकर, कांकरेज, हरियाणा और नागोरी जैसी देसी नस्लें उच्च तापमान और नमी में भी बेहतर ढंग से ढल जाती हैं। मोहन सिंह अहलूवालिया ने बताया कि देसी भैंसें गर्मियों में भी गाढ़ा और पीला दूध देती रहती हैं, जबकि विदेशी नस्लों को बेहतर ताप प्रबंधन की जरूरत पड़ती है। हिमाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में गर्मी कम होने से उत्पादकता बेहतर बनी रहती है।

अनुकूलन की चुनौतियां और समाधान

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। देश के लाखों किसान डेयरी पर निर्भर हैं। अगर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार इसी तरह जारी रही तो आगामी दशकों में दूध उत्पादन में 25 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। NDRI शोधकर्ताओं ने दूध देने वाले मवेशियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं। शोधकर्ताओं ने मवेशियों के लिए छाया, स्प्रिंकलर और पानी में रहने की व्यवस्था बढ़ाने पर जोर दिया है। इसके साथ ही देसी नस्लों को बढ़ावा देने वाले प्रजनन कार्यक्रम एवं प्राकृतिक शीतलन सिस्टम पर जोर देने का सुझाव दिया है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सुझाव

  • सिर्फ कृत्रिम ढांचों पर निर्भर न रहें।
  • बड़े पैमाने पर पेड़ लगाएं और पारंपरिक तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाए।
  • भैंसों के लिए पीने और नहाने के पानी का उचित प्रबंध।
  • भैंसों के लिए तालाब बनाना और पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराना जरूरी।
  • खाली जमीन पर पौष्टिक चारे की फसलें उगानी चाहिए।