विपक्ष अपने-अपने सियासी वजूद को बचाने के लिए रणनीतियां बनाने के साथ-साथ एक महा गठबंधन की तैयारी कर रही हैं।
नई दिल्ली। आम चुनाव 2019 के मद्देनजर सभी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। विपक्ष अपने-अपने सियासी वजूद को बचाने के लिए रणनीतियां बनाने के साथ-साथ एक महा गठबंधन की तैयारी कर रही हैं। तो वहीं सत्ताधारी दल विपक्ष की रणनीति के अनुरूप अपने-आप को तैयार करने की बात कर रहा है। हालांकि देश के विभिन्न हिस्सों में हुए उपचुनाव में विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई वाली एनडीए को रोकने के लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर गठबंधन किए और कामयाबी भी हासिल की। इन चुनाव परिणामों ने मानों विपक्ष को मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए कोई संजीवनी दे दी हो।
बसपा-साप का गठबंधन भाजपा के लिए बनी परेशानी
आपको बता दें कि पिछले महीने देश के अलग-अलग हिस्सों में हुए उपचुनावों में भाजपा की करारी हुई, तो वहीं विपक्षी एकता ने एक बार फिर से बाजी मार ली है। इन उपचुनावों में सबसे महत्वपूर्ण रहा उत्तर प्रदेश का कैराना लोकसभा सीट, जिसमें सपा-बसपा-कांग्रेस समर्थित आरएलडी की उम्मीद्वार तब्बसुम हसन ने भाजपा के उम्मीदवार मृगांका सिंह को मात देकर जीत दर्ज कर की। इससे पहले 35 वर्षों से भाजपा के पास रही गोरखपुर की सीट और फूलपुर सीट पर भाजपा की करारी हार ने सवालिया निशान लगा दिए क्योंकि गोरखपुर की सीट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पारंपरिक सीट थी तो वहीं फूलपुर की सीट पर 2014 में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जीत दर्ज की थी। इन दोनों सीटों पर बसपा-सपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और भाजपा को हराने में कामयाबी पाई। बता दें कि बसपा और सपा एक जमाने में एक-दूसरे के घोर धूर-विरोधी थे लेकिन आज के सियासत में बदले समीकरण ने दोनों विरोधियों को एक मंच पर खड़ा होने के लिए मजबूर कर दिया।
2014 में इन चार राज्यों में कांग्रेस ने 8 सीटें जीतीं थीं
आपको बता दें कि विपक्ष की इसी एकता को देखते हुए कांग्रेस ने 2019 के आम चुनाव में देश के चार विशेष राज्यों पर गठबंधन करने पर जोर दे रही है। इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल शामिल है। इन चार राज्यों में कुल 177 लोकसभा की सीटें आती हैं, जो कि किसी भी दल को दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाने में अहम रोल अदा करता है। बता दें कि 2014 में इन 177 सीटों में कांग्रेस के हिस्से केवल 8 सीटें आई थी, जिसमें झारखंड में तो कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी वहीं उत्तर प्रदेश-बिहार से दो-दो और पश्चिम बंगाल से चार सीटें जीतने में कामयाबी पाई थी। अब कांग्रेस किसी भी तरह से कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है। कांग्रेस चाहती है कि वह इन चार राज्यों में अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर भाजपा के विजय रथ को रोक दे।
कर्नाटक में दिखा था विपक्षी एकता
आपको बता दें कि कर्नाटक के सियासत में एक बार फिर से विपक्षी एकता को मजबूत करने की एक कोशिश की गई। इस दौरान सीएम कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में कई विपक्षी दलों ने आपसी वैचारिक मतभेद को भुलाते हुए एक साथ मंच साझा किया और आगामी आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकता की ताकत को दिखाने की पुरजोर कोशिश की। हालांकि अब आगे क्या होगा ये कहना संभव नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि मोदी सरकार के लिए 2019 को चुनाव आसान नहीं होगा।
सीटों का गणित
आपको बता दें कि यदि आम चुनाव तक विपक्षी दलों के बीच गठबंधन कायम रहता है तो फिर 2019 की सियासत में काफी कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है। देश के कीई राज्यों में सीटों का गणित बदल सकता है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो बसपा-सपा-कांग्रेस के गठबंधन से भाजपा महज 20 सीटों में सिमट सकती है तो वहीं बिहार में राजद-एनसीपी-हम और कांग्रेस गठबंधन भाजपा के लिए एक कड़ी चुनौती पेश कर सकती है। हालांकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के अलावा सीपीआी-सीपीएम के बीच गठबंधन को लेकर तस्वीरें साफ नहीं है लेकिन कयास लगाए जा रे हैं भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन हो सकता है। बता दें कि भाजपा को रोकने के लिए सभी विपक्षी दल एक मंच पर दिखना तो जरूर चाहते हैं लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या मोदी को रोकने के लिए सभी विपक्षी दल त्याग-बलिदान कर एक साथ एक मंच पर खड़ा हो पाएंगे या नहीं।