महाभियोग के मसले पर कांग्रेस के कई दिग्‍गज नेताओं का रुख पार्टी लाइन से अलग है। इन नेताओं का मानना है कि पार्टी को इससे बचना चाहिए था।
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2019 में होगा लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने का जंग शुरू हो गया है। इस जंग में कांग्रेस ने पीएम मोदी पर निशाना साधने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सहयोगी दलों के साथ मिलकर सबसे पहले मोहरा बनाया है। केंद्र पर निशाना साधने के लिए कांग्रेस ने शुक्रवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया। दूसरी तरफ नोटिस देने के बाद से कांग्रेस के अंदर ही इस महाभियोग को लेकर विरोध के सुर नजर आने लगे हैं। आपको बता दें कि महाभियोग से सहमत नहीं होने वालों में कांग्रेस के नौ दिग्गजों का नाम लिया जा रहा है। बताया यह भी जा रहा है कि इससे ज्यादा संख्या में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता युवा नेतृत्व के इस रुख से अहसमत हैं लेकिन ये नेता खुलकर सामने नहीं आना चाहते हैं।
असहमत होने में वालों में शामिल हैं ये नेता
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कांग्रेस के अधिकांश दिग्गज नेता पार्टी के इस लाइन से सहमत नहीं है। इनमें से कुछ का नाम खुलकर सामने आ गया है। जिन दिग्गज नेताओं का नाम चर्चा में है उनमें पूर्व पीएम मनमोहन सिंह , पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों में सलमान खुर्शीद, पी चिदंबरम, अश्विनी कुमार, वीरप्पा मोइली, एमपी में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह , संविधान विशेषज्ञ अभिषेक मनु सिंघवी, मनीष तिवारी, लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम शामिल है। ये वही नेता हैं जिसके दम पर सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस देश को लगातार दो बार सफल नेतृत्व देने में कामयाब रहीं। लेकिन राहुल की नेतृत्व वाली कांग्रेस ने इनके विचारों को तवज्जो देना उचित नहीं समझा है।
प्रस्ताव से 7 विरोधी दलों ने भी बनाई दूरी
महाभियोग प्रस्ताव के मुद्दे पर कांग्रेस 6 दलों को साथ लाने में सफल रही, लेकिन आरजेडी, टीएमसी, बीजेडी, डीएमके, एआईएडीएमके, टीडीपी, टीआरएस ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया है। संख्याबल के लिहाज से राज्यसभा में टीएमसी, टीडीपी और बीजेडी काफी मजबूत स्थिति में है।
ये हैं पांच आरोप
कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ पांच आरोप लगाए हैं। इनमें पहला आरोप प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट से संबंधित व्यक्तियों को गैरकानूनी लाभ देने और मामले को गंभीरता से नहीं लेने की है। जबकि इस मामले में सीबीआई ने प्राथमिकी भी दर्ज कर रखी है। इस मामले में सीबीआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति नारायण शुक्ला के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की इजाजत मांगी और प्रधान न्यायाधीश के साथ साक्ष्य साझा किए लेकिन उन्होंने जांच की इजाजत देने से इनकार कर दिया। दूसरा आरोप उस रिट याचिका को प्रधान न्यायाधीश द्वारा देखे जाने के प्रशासनिक और न्यायिक पहलू के संदर्भ में है जो प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले में जांच की मांग करते हुए दायर की गई थी। तीसरा आरोप भी इसी मामले से जुड़ा है। इसमें कहा गया है कि यह परंपरा रही है कि जब प्रधान न्यायाधीश संविधान पीठ में होते हैं तो किसी मामले को शीर्ष अदालत के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश के पास भेजा जाता है। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। चौथा आरोप गलत हलफनामा देकर जमीन हासिल करने का लगाया है। पांचवा आरोप है कि प्रधान न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय में कुछ महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मामलों को विभिन्न पीठ को आवंटित करने में अपने पद एवं अधिकारों का दुरुपयोग किया।