राजनीति

क्या हैदराबाद गैंगरेप के आरोपियों का एनकाउंटर न्याय हैं?

हैदराबाद गैंगरेप और हत्या बनाम एनकाउंटर को लेकर बहस जारी क्‍या गैंगरेप को रोकने या सजा देने का सही तरीका यही है अगर नहीं, तो लोगों के भरोसे का क होगा
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नई दिल्ली। हैदराबाद गैंगरेप और हत्या मामले में शुक्रवार की सुबह 3.30 बजे के आस-पास हैदराबाद में पशु चिकित्सक के गैंगरेप के चारों आरोपियों का पुलिस ने एनकाउंटर कर दिया। वजह ये बताई गई कि क्राइम सीन रिक्रिएट करते समय चारों आरोपियों ने वहां से भागने की कोशिश की। पुलिस को मजबूरन गोली चलानी पड़ीं। इस घटना में चारों आरोपी मारे गए। बता दें कि ये चारों आरोपी कोर्ट के आदेश पर पुलिस रिमांड में थे।

हैदराबाद पुलिस एनकाउंटर ने महिलाओं के खिलाफ होनेवाली हिंसा को लेकर भारत की राय को वाकई दो टुकड़ों में बांट दिया है। सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर एनकाउंटर के पक्ष और विरोध में कुछ इस कदर शोर मचा है कि हैदराबाद सामूहिक बलात्कार की बात भूलकर लोग पुलिस एनकाउंटर पर एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने में लगे हुए हैं।


इस घटना पर प्रियंका रेड्डी के पिता ने बताया कि मेरी बेटी को गुजरे दस दिन हो गए हैं। मैं, एनकाउंटर के लिए पुलिस और सरकार के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूं। मेरी बेटी की आत्मा को अब जाकर शांति मिली होगी।

इसी तरह 16 दिसंबर 2012 में दिल्ली के कुख्यात निर्भया कांड में जघन्य सामूहिक बलात्कार और शारीरिक हिंसा के बाद अपनी जान गंवा बैठी 23 साल की ज्योति सिंह की मां आशा देवी ने कहा कि कम से कम एक बेटी को न्याय मिला। मैं पुलिस को धन्यवाद देती हूं। मैं 7 सात सालों से चिल्ला चिल्लाकर कह रही हूं कि दोषियों को सजा दो। चाहे इसके लिए कानून ही क्यों ना तोड़ना पड़े, और फिर देखो कि समाज कैसे बदलता है?


दिसंबर, 2012 में निर्भया कांड के बाद बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्टिंग में इजाफा आया है। पुलिस की संवेदनशीलता, फास्टट्रैक सुनवाई, मौत की सजा और बड़े स्तर पर पुरुष प्रधान समाज में बदलाव की जरूरत पर जमकर बहस भी हुई और बलात्कार कानून में बदलाव के कुछ ऐतिहासिक कदम भी उठाए गए जिसमें पॉक्सो एक्ट शामिल था।

लेकिन आशा देवी अभी भी अपराधियों के फांसी पर चढ़ने का इंतजार कर रही हैं। राष्ट्रपति के पास इस मामले में दाखिल दया याचिका आरोपी ने वापस लेने की बात की है। एक आरोपी ने कहा कि दया याचिका पर उसके हस्ताक्षर नहीं हैं। इस मामले में अगली सुनवाई 13 दिसंबर को होगी, जब दिल्ली की एक अदालत के निर्देश का पालन करते हुए तिहाड़ जेल प्रशासन चारों दोषियों को अदालत के सामने पेश करके उनकी दया याचिका पर लिए गए फैसले की जानकारी देगा।

निर्भया के माता-पिता ने अदालत से तिहाड़ प्रशासन को ये निर्देश देने का अनुरोध किया था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर चारों दोषियों को जल्द से जल्द फांसी की सजा दी जाए।

जब निर्भया मामले में फास्टट्रैक सुनवाई करके आखिरकार सजा-ए-मौत का फैसला आ चुका है तो फिर आशा देवी को ऐसा क्यों लगता है कि पुलिस एनकाउंटर की वजह से ही एक और बेटी को न्याय मिल पाया है? इस बात को समझने के लिए भारत में महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा से जुड़े कुछ आंकड़ों को समझना बेहद जरूरी है।


भारत सरकार की नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक अपराध के बहुत सारे मामले, खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ होनेवाली यौन हिंसा के मामलों की बहुत कम रिपोर्टिंग होती है। कई बार तो मामले दर्ज भी नहीं कराए जाते। दर्ज कराए जानेवाले अपराध के मामलों और वास्तविक अपराध दर के बीच जो ये बड़ा फासला है उसके पीछे हमारा अपना जीर्ण-शीर्ण न्यायिक ढांचा बहुत हद तक जिम्मेदार है।

एनसीआरबी की कन्विक्शन रेट यानी दोषी साबित हो जाने की दर पर नजर डालें तो एक चौंका देनेवाला आंकड़ा सामने आता है। भारत में रेप के मामले में 1973 में कन्विक्शन की दर 44.3 प्रतिशत थी। 1983 में यह दर घटकर 37.7 प्रतिशत, 2009 में 26.9 प्रतिशत, 2010 में 26.6 प्रतिशत, 2011में 26.4 प्रतिशत, 2012 में 24.2 प्रतिशत और 2013 में यह दर 27.1 फीसदी थी यानी मामलों के दर्ज होने में भले बढ़ोत्तरी हुई हो, लेकिन पिछले चालीस सालों में रेप के मामले में सजा होने की दर में लगातार गिरावट ही आई है।

संभवत: इसलिए देश का एक बड़ा तबका इस एनकाउंटर को जस्टिस डेलिवर्ड मान रहा है। इसलिए जिस सांसद जया बच्चन ने अभी दो दिन पहले ही संसद में बलात्कार के आरोपियों की सरेआम लिंचिंग की वकालत की थी। उन्होंने भी कह दिया कि 'देर आए लेकिन दुरुस्त आए। इसलिए मायावती और उमा भारती जैसी नेत्रियों ने भी हैदराबाद पुलिस की खुलकर तारीफ करते हुए दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस को 'सबक' लेने का सुझाव भी दे डाला। गीता फोगाट, पीवी सिंधु और सायना नेहवाल जैसी रोल मॉडल सेलिब्रिटी खिलाड़ियों ने ट्विटर पर हैदराबाद पुलिस का शुक्रिया भी अदा किया।

इस बहस के बीच अहम सवाल यह है कि वाकई न्याय इसी को कहते हैं? कानून कहता है कि जब तक दोष साबित ना हो जाए, आप निर्दोष हैं। क्या इस एनकाउंटर ने इस लिहाज से कानून की धज्जियां नहीं उड़ा दीं? अभी इस सवाल का जवाब आना बाकी है। ऐसा इसलिए भारतीय समाज इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से दो घड़ो में बंट चुका है। अब अदालत को तय करना है कि सही क्या हैं?

Updated on:
08 Dec 2019 02:57 pm
Published on:
08 Dec 2019 02:56 pm
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