राजनीति

MPElection शबनम मौसी: एक किन्नर की जीत ने देश की राजनीति को हिला दिया था

राजनीति के रोचक किस्सेमध्यप्रदेश में फरवरी का महीना वैसे तो दांत किटकिटाने वाली सर्दी का होता है, लेकिन वर्ष 2000 जिसे मिलेनियम इयर नाम दिया गया था। एक चौंकाने वाली राजनीतिक घटना की गर्मी ने पूरे सियासी तंत्र को हिला दिया था। 25 फरवरी 2000 का वह दिन था जब एक किन्नर शबनम मौसी ने मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले की सोहागपुर सीट से विधानसभा उपचुनाव जीतकर इतिहास रच दिया था।
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Updated: 31 Oct 2023, 11:42 PM IST
Ex MLA Shabanam mausi
Film Shabanam mausi promotion

मध्यप्रदेश भर ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में यह किसी अनहोनी से कम नहीं थी। कहां किन्नरों को इससे महज 6 साल पहले 1994 में मतदान का अधिकार मिला था और कहां एक किन्नर ने पुरुषवादी सत्ता को चुनौती दे दी। उस साल होली का पर्व 20 मार्च को था, लेकिन इससे पहले ही लोकतंत्र का गुलाल आसमान पर ऐसा छाया कि सालों तक उसके रंग को महसूस किया जाता रहा है।

इससे पहले शबनम कोई बड़ा नाम नहीं था, उन्होंने अनूपपुर (अब शहडोल से अलग हुआ जिला) को कैसे और कहां से आकर शरणस्थली बना लिया यह सालों तक रहस्य का विषय रहा। आम किन्नरों से थोड़ा हटकर शबनम ने आम इन्सानों की बस्ती के बीच ही रहकर खास किस्म का रिश्ता बनाया और मौसी जिसका अर्थ मां की बहन होता है का संबोधन हासिल कर लिया। उनकी किस्मत ने करवट पूर्व राज्यपाल और कांग्रेस के दिग्गज नेता केपी सिंह के निधन के बाद ली। जो 1998 में सोहागपुर विधानसभा सीट (2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में नहीं है) से कांग्रेस के टिकट पर सातवीं बार विधायक चुने गए थे। लेकिन सितम्बर 1999 में उनका निधन हो गया। रिक्त हुई सीट के उपचुनाव जनवरी 2000 में घोषित किए गए। कांग्रेस ने सहानुभूति को भुनाने के लिए केपी सिंह के पुत्र बृजेश सिंह को उतारा तो भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता लल्लू सिंह को टिकट दिया।

इस उपचुनाव को लेकर शहडोल से 50 किलोमीटर दूर अनूपपुर में अलग ही हलचल शुरू हो गई। लोगों ने शबनम मौसी को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतरने के लिए मनाया। बहुत जद्दोजहद के बाद शबनम नामांकन को तैयार हुईं, जब वे शहडोल जिला मुख्यालय पहुंची तो बहुत नोटिस नहीं किया गया। इर्द-गिर्द किन्नरों का जमावड़ा ज्यादा था, कुछ ही उत्साहित लोग कलेक्टे्रट पहुंचे और पर्चा भरवाया। चुनाव चिन्ह पतंग मिल गया। इसकी खबर फैली तो देशभर से किन्नर सोहागपुर पहुंच गए। कांग्रेस के प्रचार के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सहित प्रदेश के कई बड़े नेता सोहागपुर पहुंचे थे, भाजपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी भी गए। तब तक शबनम मौसी को किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया था। समर्थन में आए किन्नर भावुक अपील करते यही बताते कि उनके आगे-पीछे कोई नहीं है, भ्रष्टाचार किसके लिए करेंगे। चुनाव के आखिरी दिनों में शबनम की लहर पैदा हो गई। महिलाओं सहित हर वर्ग के लोगों ने वोट के वादे के साथ नोट देने भी शुरू कर दिया। उड़ी-उड़ी रे शबनम मौसी की पतंग उड़ी की पैरोडी ने माहौल बना दिया। वोटिंग के दिन शबनम की जैसी आंधी चल पड़ी।

25 फरवरी 2000 को जब मतपेटियां खुलीं तो पहले राउंड से ही शबनम ने भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों पर दोगुने से ज्यादा मतों से बढ़त बना ली और निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के लल्लू सिंह को 17 हजार से अधिक मत से हराया, कांग्रेस तीसरे स्थान पर पहुंच गई। शेष छह प्रत्याशी जमानत नहीं बचा सके। शबनम सच में सोहागपुर की मौसी बन गईं और 39 हजार से अधिक मत हासिल किए, जो कुल पड़े मतों का 40 प्रतिशत से ज्यादा था। बाद में शबनम मौसी के नाम से मसाला फिल्म भी बनी, जिसमें शबनम का किरदार आशुतोष राणा ने निभाया था। उसमें एक डॉयलाग था, जब लोगों ने आपको को जिताया तब तो अच्छे खासे मर्द थे, लेकिन विधानसभा जाकर कैसे हिंजड़ा बन गए। मैं विधानसभा पहुंचकर भी वही रहूंगी, जो हूं... हिंजड़ा। बाद में पता चला कि वे किसी पुलिस अधिकारी की संतान थीं, जिन्होंने प्रतिष्ठा की खातिर किसी किन्नर को सौंप दिया था। 14 भाषाओं को जानने वाली शबनम ने प्रदेश में प्रयोगवादी राजनीति का रास्ता दिखाया और कई किन्नर नगरीय निकायों के महापौर से लेकर पार्षद के चुनाव जीते, इसके बावजूद किन्नरों को वह मुकाम नहीं मिल पाया। 2005 में किन्नरों से जीती जिताई पार्टी भी गठित की, पर उन्हें जल्दी समझ आ गया कि पुरुषवादी सत्ता में वह केवल प्रयोग से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

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