चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े हो गए। और इसके साथ ही 90 के दशक में चुनाव आयोग को देश में मजबूती के साथ पेश करने वाले मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन की सख्त कार्रवाई याद आ गई।
नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने शनिवार को पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया। इस ऐलान के साथ ही एक बार फिर चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े हो गए। और इसके साथ ही 90 के दशक में चुनाव आयोग को देश में मजबूती के साथ पेश करने वाले मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन की सख्त कार्रवाई याद आ गई।
दरअसल, शनिवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान का समय दो बार बदला था, जिसको लेकर कांग्रेस पार्टी समेत तमाम विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर हमला बोलना शुरू कर दिया। चुनाव आयोग पर आरोप लग रहे हैं कि सरकार के निर्देशों पर आयोग ने तारीखों के ऐलान के समय को बदला है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत की छवि पर कई तरह के सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
चुनाव आयोग की साख पर सवाल खड़े होना कोई पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई बार मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत पर सरकार के निर्देशों पर चलने के आरोप लगते रहे हैं। इस साल की शुरुआत में ही कर्नाटक चुनाव में तारीखों के ऐलान से पहले बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय के ट्वीट से हड़कंप मच गया था।
अमित मालवीय ने ट्वीट कर चुनाव आयोग से पहले वोटिंग की तारीखों की घोषणा कर दी थी। अमित मालवीय ने ट्वीट कर जो तारीखें बताई थी वो 12 मई और 18 मई थी, लेकिन चुनाव आयोग ने 12 मई और 15 की घोषणा की थी। खैर जब-जब चुनाव आयोग की साख पर सवाल खड़े हुए हैं तब-तब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का नाम याद किया जाता है, जिन्होंने इलेक्शन कमीशन की साख को बनाए रखने के लिए सरकार तक की नाक में दम कर दिया था, लेकिन चुनाव आयोग के नियमों को तार-तार नहीं होने दिया। टीएन शेषन नियमों को लेकर सरकार से भिड़ गए थे, लेकिन आज चुनाव आयोग पर सरकार के इशारों पर चलने का आरोप लगता रहता है।
1955 में आईएएस टॉपर रहे टीएन शेषन ने जब 1990 में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला तो चुनावी प्रक्रिया चरमराई हुई थी। चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की समस्या आम थी और बिहार इसके लिए बदनाम रहता था। हिंसक घटनाएं चुनावों में आम हो गई थीं। लोकतंत्र के इस काले समय में टीएन शेषन ने कई कठोर कदम उठाए थे।
उन्होंने सबसे पहले तो कई चरणों में चुनाव कराने का फैसला किया। इस ऐलान के बाद सबसे पहले बिहार में पांच चरणों में चुनाव हुए थे। यहीं नही एक रणनीति के तहत कई बार चुनाव की तारीखों में फेरबदल भी किया। बूथ कैप्चरिंग रोकने के लिए पहली बार उन्होंने देश में केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में चुनाव कराया।
टीएन शेषन अपने कार्यकाल में अपने सख्तों फैसलों की वजह से कई बार विवादों में रहे। एक बार तो उन्होंने यह तक कह दिया था कि जब तक सबके वोटर कार्ड नहीं बन जाते, इस देश में चुनाव नहीं होंगे। ऐसे ही कुछ फैसलों की वजह से उन्हें अहंकारी कहा जाने लगा। टीएन शेषन के कई फैसलों में तो अदालत को भी हस्तक्षेप करना पड़ गया था। एक वक्त ऐसा भी आया जब उनकी शक्ति सीमित करने के लिए चुनाव आयोग की संरचना में बदलाव करते हुए एक की जगह तीन चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव सदन में रखा गया।
चुनावों में सख्ती को लेकर टीएन शेषन धीरे-धीरे नेताओं की आंखों में खटकने लगे थे। कई बार नेताओं का उनके साथ विवाद भी हुआ था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने चुनाव में गड़बड़ी करने वाले आपराधिक छवि वाले नेताओं की नाक में खूब दम किया था।
बात 1992 के यूपी विधानसभा चुनाव की है, जब उन्होंने सभी आईएएस-आईपीएस अफसरों को दो टूक कह दिया था कि किसी भी तरह की गड़बड़ी होने पर वही जिम्मेदार होंगे। साथ ही 50 हजार अपराधियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि या तो वो खुद को तुरंत पुलिस के हवाले कर दें या फिर अग्रिम जमानत ले लें, नहीं तो बख्शे नहीं जाएंगे। इसका असर हुआ कि उस समय उत्तर प्रदेश में भी शांतिपूर्वक और पारदर्शिता के साथ चुनाव हुए।
कहा जाता है कि टीएन शेषन को चंद्रशेखर की सरकार में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था। उन पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लग गया था, लेकिन उन्होंने चुनाव आयुक्त का पद संभालते ही कुछ महीनों के अंदर ही अपने फैसलों से साफ कर दिया था कि वो इस पद पर रहकर कांग्रेस का हित चाहने वालों में से कतई नहीं हैं और इसका संकेत उन्होंने अपने एक आर्टिकल के जरिए दे दिया था जो साल 1991 में अखबारों में छपा था।
इसमें लिखा था, 'भूल जाइए कि संसद में गलत तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके पहुंच सकेंगे आप, किसी को ऐसा करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। लोग सालों से चाह रहे थे कि कोई चुनावी गंगा को धनबल, बाहुबल और सत्ताबल से गंदा करने वाले नेताओं पर लगाम कसे और टी.एन. शेषन की खबरदार करती कड़क आवाज गूंजी तो लोगों को लगा यह कोई मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं बल्कि देश का सामूहिक विवेक बोल रहा है।