Mulching Technique Farming: करजू और रावतपुरा के किसानों ने आधुनिक मल्चिंग तकनीक अपनाकर टमाटर व मिर्च जैसी नकदी फसलों की खेती शुरू की है। ड्रिप सिंचाई और प्लास्टिक मल्चिंग शीट से 30-40% पानी की बचत हो रही है और बेहतर उत्पादन की उम्मीद बढ़ी है।
प्रतापगढ़। जिले के गांव करजू और रावतपुरा में किसानों ने आधुनिक मल्चिंग तकनीक अपनाकर नकदी फसलों की खेती शुरू की है। इस तकनीक के तहत खेत में उठी हुई क्यारियां बनाकर ड्रिप सिंचाई लाइन बिछाई जाती है तथा उस पर विशेष प्लास्टिक मल्चिंग शीट लगाई जाती है। इसके बाद निर्धारित दूरी पर छेद कर टमाटर, मिर्च सहित अन्य नकदी फसलों के पौधे लगाए जाते हैं। किसान जगदीश धाकड़ और लाला धाकड़ ने बताया कि इस वर्ष खरीफ फसलों में नुकसान हुआ, जबकि रबी फसल भी उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। ऐसे में अब किसानों को गर्मी के मौसम में बोई जा रही नकदी फसलों से अच्छी आमदनी की उम्मीद है।
किसानों ने बताया कि मल्चिंग तकनीक से 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है तथा खरपतवार की समस्या भी काफी हद तक कम हो जाती है। इससे फसलों की देखभाल आसान होने के साथ उत्पादन बेहतर मिलने की संभावना रहती है। किसानों का कहना है कि किसान 365 दिन खेत-खलिहान में मेहनत करता है। भीषण गर्मी, सर्दी और बारिश के बीच खेती का कार्य लगातार जारी रहता है। खेत तैयार करने, सिंचाई, खाद प्रबंधन और पौधों की देखभाल तक हर कार्य में मेहनत लगती है, लेकिन अच्छी पैदावार और बेहतर मुनाफे की उम्मीद उन्हें लगातार खेती से जोड़े रखती है।
मल्चिंग तकनीक में सिंचाई की सबसे आधुनिक और प्रभावी व्यवस्था अपनाई जाती है, जिसके तहत पौधों को पारंपरिक तरीके से खुला पानी देने के बजाय ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई पद्धति) का उपयोग किया जाता है। इसके लिए सबसे पहले ट्रैक्टर की मदद से खेत में उठी हुई क्यारियां बनाई जाती हैं और इन क्यारियों के ऊपर ड्रिप सिंचाई की इनलाइन पाइपों का जाल बिछाया जाता है। इसके बाद पूरी क्यारी को प्लास्टिक मल्चिंग शीट से अच्छी तरह ढक दिया जाता है और शीट में तय दूरी पर छेद करके पौधे लगाए जाते हैं, जिससे ड्रिप के जरिए पानी सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद करके पहुंचता है। प्लास्टिक शीट से ढके होने के कारण तेज धूप में भी पानी का वाष्पीकरण (भाप बनकर उड़ना) नहीं होता है, जिससे मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है और फसलों को बार-बार सींचने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
मल्चिंग तकनीक में ड्रिप सिंचाई और प्लास्टिक शीट का उपयोग कर फसल तैयार की जाती है। इससे 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, खरपतवार कम उगते हैं और नकदी फसलों के बेहतर उत्पादन की संभावना बढ़ जाती है।