मुस्लिम समाज ने पेश की मिसाल, दुर्गा पूजा के लिए बदली 180 साल पुरानी परम्परा

मुस्लिम समाज के इस फैसले ने संगम नगरी में दिखाई गंगा जमुनी तहजीब

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Oct 08, 2016
muslim sacrifices for durga puja
इलाहाबाद
. संगम नगरी में गंगा जमुनी तहजीब की मिशाल पेश करते हुए मुस्लिम समाज के लोगों ने दुर्गा पूजा को देखते हुए 180 साल पुरानी रिवायत को बदल दिया। शहर के पुराने इलाके चौक के पानदरीबा स्थित इमामबाड़ा मिर्जा सफदर बेग से निकलता है लेकिन दुर्गा पूजा और और मुहर्रम एक साथ पड़ने से जुलुस और पूजा के यात्रा एक समय पर निकलने वाली थी। लेकिन मस्जिद के इमाम ने दुलदुल के जुलुस में समय का परिवर्तन कर दिया । जुलुस अब बदले हुए समय पर निकलते हुए परम्परागत मार्गों से गश्त करते हुए घर-घर जायेगा।



वहीं, शहर भर में सजे दुर्गा पंडाल की प्रभात फेरी से लेकर अन्य पूजन के आयोजन और भंडारे गश्त के समय दुलदुल जुलुस के रास्ते में किसी तरह के व्यवधान नहीं होने देने का इसका आह्वान किया। दुर्गा पूजा के पंडाल चौक के लगभग हर सड़क पर सजाया जाता है और इसी इलाके में ज्यादातर मुस्लिम समाज के लोग रहते हैं। लेकिन देश भर मे में अपनी मिलीजुली संस्कृति के लिये अपनी पहचान रखने वाले शहर ने एक बार फिर दुनिया भर के लिये मिशाल पेश की है । पानदरीबा के पास सजे पंडाल के आयोजक पंडित सुधाकर शास्त्री ने मुस्लिम समाज की इस पहल का स्वागत किया और अपने समाज के लोगों से अपील की है कि हमारा भी कर्तव्य है कि हम उनके प्रथा और मान्यता का सम्मान करें।



अन्जुमन गुन्चा ए कासिमया के प्रवक्ता सै.मो अस्करी के मुताबिक इस वर्ष माहे मोहर्रम व दशहरा एक साथ पड़ने व आपसी सौहार्द कायम करते हुए 1836 में शाहगंज, पान दरीबा स्थित इमाम बाड़ा मिर्जा सफदर बेग से उठने वाले दुलदुल जुलूस को समय परिवर्तन के साथ निकाला जायेगा। इमामबाड़ा के पांचवे वंशज और वर्तमान में दुलदुल जुलूस के संयोजक मो.अली बेग और मिर्जा इकबाल हुसैन व अन्य सदस्यों ने गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल कायम करते हुए 24 घण्टे के दुलदुल जुलूस में समय परिवर्तन किया है।



अस्करी ने बताया कि दो दुलदुल जुलूस सजाये जायेंगे। पहला पान दरीबा तो दूसरा रानीमण्डी में सजेगा जो एक ही वक्त में निर्धारित समय पर लोगों के घर जायेगा। वहीं रानीमण्डी से मातमी दस्तों का जंजीरी जुलूस भी रात्रि 9 बजे के स्थान पर सांय तीन बजे निकलेगा, रानीमण्डी, बच्चाजी धर्मशाला, कोतवाली, लोकनाथ चैराहा, बहादुरगंज होते हुए चक स्थित इमाम बाड़ा वजीर हसन पर पहुंच कर सम्पन्न होगा। अस्करी ने फैसले की सराहना करते हुये उनके ऐतिहासिक कदम पर कहा कि यह भारतीय परम्परा का अनूठा नमूना होगा कि एक ओर रामधुन तो दूसरी ओर या अली या हुसैन की सदा फिजा में गूंजेगी। अल्लाह हमारी एकता को दुश्मन के नापाक इरादों से बचाएं ।

Published on:
08 Oct 2016 05:31 pm
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