इसमें कोई शक नहीं कि पिछले वर्षों में भारत में कौशल विकास के लिए बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ी है। इसी की धमक दावोस में दिखाई पड़ रही है। इसी का असर है कि भारत की आर्थिक वृद्धि के प्रति आश्वस्त 87 फीसदी सीईओ अपना कामकाज बढ़ाने और कर्मचारियों की भी संख्या में बढ़ोतरी की बात करते नजर आए।
दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान पीडब्ल्यूसी के 28वें वार्षिक वैश्विक सीईओ सर्वेक्षण में 10 में से 9 सीईओ का मानना कि भारत की आर्थिक ताकत बढ़ रही है। इसके साथ ही भविष्य की मांग वाले कौशल के लिहाज से भारत का बाजार तैयार हो गया है। निश्चित ही यह संतोष की बात है कि हमारी प्रतिभा का दुनिया लोहा मान रही है। भारतीयों की क्षमता को संदेह की नजर से देखने का जमाना चला गया है। आज दुनिया की शीर्ष कंपनियों में भारतीय प्रतिभाएं अपनी योग्यता का लोहा मनवा रही है। कई बड़ी वैश्विक कंपनियों के सीइओ के रूप में भी भारतीय जलवा बिखेर रहे हैं।
इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद यह स्थिति भारत के लिए संपूर्ण संतुष्टि की वजह नहीं हो सकती। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे यहां से ऐसी प्रयोगधर्मी प्रतिभाएं सामने नहीं आ रही हैं जिनकी खोजों से दुनिया पर भारत की धाक जम सके। दुनियाभर की इंडस्ट्री के हिसाब से कौशल का विकास एक बात है लेकिन अपने आविष्कारों और तकनीकों से दुनिया पर छा जाना दूसरी बात। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले वर्षों में भारत में कौशल विकास के लिए बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ी है। इसी की धमक दावोस में दिखाई पड़ रही है। इसी का असर है कि भारत की आर्थिक वृद्धि के प्रति आश्वस्त 87 फीसदी सीईओ अपना कामकाज बढ़ाने और कर्मचारियों की भी संख्या में बढ़ोतरी की बात करते नजर आए।
दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा नेटवर्क क्यूएस रेटिंग की ओर से जारी क्यूएस वल्र्ड फ्यूचर स्किल्स इंडेक्स के मुताबिक भारत भविष्य की मांग वाले कौशल के लिहाज से तैयार बाजार बन गया है। स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी कई पहलों ने भारतीय कौशल की तस्वीर में व्यापक बदलाव किया है। लेकिन, ध्यान देना होगा कि दुनियाभर में उद्योगों की जरूरतें तेजी से बदल रही हैं। अध्ययनों में कहा जा रहा है कि वर्ष 2030 तक नौकरियों का एक बड़ा हिस्सा एआइ सहित अत्याधुनिक तकनीकों पर आधारित होगा। ऐसे में हमारे युवाओं को भी भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें एक दशक और उससे भी ज्यादा आगे के बारे में सोचकर युवाओं को प्रशिक्षित करना होगा।
सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली को नियोक्ताओं की जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करनी होगी। युवा क्षमताओं के पूरे उपयोग के लिए उच्च शिक्षा में सुधार, कौशल विकास और अर्थव्यवस्था की गति पर भी ध्यान देना होगा। इस मोर्चे पर सफलता ही 2047 तक विकसित भारत के स्वप्न को साकार कर सकती है।