Serial Killer Sadashiv Sahu: ठंडी रात में विश्राम साहू अपने घर के बाहर अलाव ताप रहे थे। साथ में दो-तीन लोग भी बैठे थे। तभी अचानक एक ठायं की आवाज आई। विश्राम की छाती में आग की लकीर जली और वहीं निढाल हो गए। इस वारदात ने गांव के बुजुर्गों में ऐसा खौफ भर दिया कि रात होते ही दरवाजे बंद होने लगे। यह सब उसी सीरियल किलर का खेल था, जो अंधेरे में मौत बनकर घूमता था।
आधी रात का सन्नाटा और अचानक धांय की आवाज। एक ही गोली…और सब कुछ खत्म। न कोई चीख, न कोई पुकार। रायबरेली और सुल्तानपुर की सरहद पर बसे गांवों के लोग सालों तक इस डर में जीते रहे कि अगली सुबह किसकी लाश मिलेगी। कातिल कोई दुश्मन नहीं था, बल्कि वही शख्स था जो दिन में पूजा-पाठ करता और रात होते ही भरवा बंदूक लेकर इंसानी शिकार पर निकल पड़ता। आज की इस क्राइम फाइल में बात उस सदाशिव साहू की, जिसकी आंखों में खून देखने की सनक सवार थी।
उस सुबह जगदीश की चक्की के बाहर सन्नाटा नहीं, बल्कि अफरा-तफरी थी। गांव वाले भागते हुए अंदर पहुंचे और जो देखा, उससे सबकी रूह कांप गई। बिस्तर पर जगदीश की लाश पड़ी थी। सिर का पिछला हिस्सा चकनाचूर था और खून से सना बिस्तर मक्खियों से भरा हुआ था। यह मंजर देखकर पत्नी के हाथ से पल्लू छूट गया और छोटा भाई राजेश भैया-भैया चिल्लाते हुए वहीं गिर पड़ा।
गांव में चर्चा शुरू हो गई कि आखिर जगदीश की किससे दुश्मनी थी? वह तो अकेले चक्की पर सोते थे। पुलिस आई, दरोगा ने नोटबुक खोली और अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। पोस्टमॉर्टम में खुलासा हुआ कि बहुत करीब से भरवा बंदूक की गोली मारी गई थी। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। असली खौफ अभी बाकी था।
जगदीश की हत्या के बाद यह सिलसिला थमा नहीं। एक साल के भीतर तीन-चार और हत्याएं हो गईं। तरीका हर बार एक जैसा। आधी रात को गोली और फिर अंधेरे में दो साए। लोगों ने बताया कि एक लंबा और एक छोटा कद का आदमी काले कपड़ों या बुर्के जैसे लिबास में भागते दिखता था।
दहशत इतनी बढ़ गई कि फुरसतगंज के कई गांवों में लोगों ने बाहर सोना बंद कर दिया। रात होते ही दरवाजे बंद हो जाते। बुजुर्ग शाम के बाद घर से निकलने से डरते। हालात ये थे कि पुलिस की टीमें आतीं रजिस्टर में तारीख और समय लिखतीं और फिर लौट जातीं। सालों तक यह खूनी लुकाछिपी चलती रही।
2003 में ऐसे ही एक केस की जिम्मेदारी असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (ASP) वीपी श्रीवास्तव को सौंपी गई, जो बाद में SSP रैंक से रिटायर्ड हुए। वीपी श्रीवास्तव ने पुरानी फाइलें निकालीं और कड़ियां जोड़ना शुरू कीं।
तारीखें एक कतार में खड़ी होने लगीं। 1998, 1999, 2000, 2001, 2002… हर दो-तीन महीने में खून की एक लकीर। नक्शे पर पिन लगाए, रायबरेली-सुल्तानपुर रोड से सटे पांच-छह गांव में ज्यादा आतंक था। गिनती करीब 35 मर्डर पर खत्म हुई। पैटर्न सामने आया। मरने वाले ज्यादातर 50 से 70 साल के पुरुष थे, जो घर के बाहर सोते थे। और सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि हत्याएं सिर्फ शनिवार, रविवार या सोमवार की रात को होती थीं।
रणनीति बदली गई। गांव के प्राइमरी स्कूल में अस्थायी पुलिस चौकी बनाई गई। सात थानों की फोर्स तैनात हुई। गलियों में ड्रैगन लाइटें लगाई गईं। पुलिस को यकीन था कि कातिल ज्यादा दिन शांत नहीं रह सकता।
8 नवंबर 2004 की शाम सैमसी गांव में विश्राम साहू अलाव ताप रहे थे। तभी अचानक गोली चली और वह वहीं गिर पड़े। हत्यारा नहर की ओर भागा और पानी में कूद गया। तलाशी के दौरान पुलिस को वहां गीली मिट्टी में पैरों के निशान और घास में एक जूता मिला।
पूछताछ में एक ग्रामीण ने बताया कि उसने अपने पड़ोसी सदाशिव साहू को उसी रात गीले कपड़ों में घर में घुसते देखा था। पुलिस ने सदाशिव को हिरासत में लिया। वह एक साधारण दुकानदार था। पूजा-पाठ करता था और कम बोलता था। पुलिस ने जब उसके घर की तलाशी ली तो नकली दाढ़ी-मूंछ, नाटक के कपड़े और पानी में डूबी लाइसेंसी बंदूक मिली।
थाने में जब एएसपी ने सदाशिव से पूछताछ की तो उसने जो कबूला उसने सबके होश उड़ा दिए। उसने 22 हत्याओं की बात कबूल की। कहा कि मुझे खून देखने की हूक उठती है। अगर एक-दो महीने तक किसी को न मारे तो नींद नहीं आती। उसे सुकून तभी मिलता था जब वह खून को जमीन पर गिरते देखता है। इस मामले में उसके बेटे जयकरन का नाम भी सामने आया, जिसे वह धमकाकर अपने साथ ले जाता था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सदाशिव ने मुकरने की कोशिश की, लेकिन सबूतों ने सच्चाई साबित कर दी।
18 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2022 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई। हालांकि 2023 में जेल के अंदर ही उसकी मौत हो गई। वहीं, बेटे को सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया गया।