रायगढ़

पांच बेटियों ने पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए मृत पिता के अंतिम संस्कार में हुईं शामिल, बड़ी बेटी ने पिता को दी मुखाग्नि

- बेटी संजूलता ने बताया कि उनके पिता की ही इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार सभी बेटियां मिलकर करें।

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Aug 02, 2018
पांच बेटियों ने पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए मृत पिता के अंतिम संस्कार में हुईं शामिल, बड़ी बेटी ने पिता को दी मुखाग्नि

रायगढ़. पुरानी रुढिवादी मान्यता है कि बेटा मोक्ष का द्वार होता है, इसके बिना जीवन सफल नहीं होता है, और यही मान्यता आज के दौर में बेटियों को कोख में ही मारने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जिले रायगढ़ में शहर की पांच बेटियों ने इस पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए न सिर्फ अपने मृत पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुईं बल्कि बड़ी बेटी ने पिता को मुखग्नि भी दी। मिली जानकारी के अनुसार शहर के कसेरपारा निवासी टेकमल देवांगन उम्र ७९ वर्ष की मौत ३० जुलाई को हो गई थी।

स्व. टेकमल देवांगन की पांच पुत्रियां हैं। जिसमें पद्मा, संजूलता, निर्मला, संतोषी और मिनू देवांगन हैं। पदमा देवांगन रायगढ़ फूड ऑफिस में कार्यरत हैं, तो संजूलता देवांगन रायपुर में सिविल जज हैं वहीं संतोषी शिक्षिका हैं। स्व. देवांगन की जज बेटी संजूलता ने बताया कि उनके पिता की ही इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार सभी बेटियां मिलकर करें। ऐेसे में पिता की मौत के बाद वो सभी एक साथ उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुईं और उनकी बड़ी बहन ने पिता को मुखाग्नि दी। स्व. टेकमल की बेटियों ने बताया कि उनके पिता जानते थे कि उन्हें कोई बेटा नहीं है पर कभी बेटियों को कम नहीं समझा वो खुद ही यह कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार बेटियां ही करेंगी।

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समाज को बता दिया था
जज बेटी ने बताया कि पिता की मृत्यु के बाद उनके इच्छा की जानकारी अपने समाज को दी गई थी। ऐसे में समाज की ओर से भी पूरा सहयोग किया गया इसके बाद वो सभी पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुईं। संजूलता ने बताया कि दशकर्म के भी सारी विधि और रीति को हम सभी बहनें मिलकर ही निभाएंगी।

दिया संदेश बेटियों को कम नहीं समझें
स्व. टेकमल देवांगन की बेटियों ने पत्रिका को बताया कि आज के दौर में बेटियों को बेटों से कम नहीं समझना चाहिए। हम सभी बहनों ने यही संदेश समाज को दिया है कि पुरानी परंपरा को तोडऩा होगा। ये बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जिला है यहां तो ये संदेश और भी
महत्वपूर्ण है।

बेटों के बराबर ही मानते थे हमारे पिता
पांचों बेटियों ने बताया कि उनके पिता ने कभी उन्हें बेटों से कम नहीं माना। इसका ही परिणाम है कि हर बेटी आत्मनिर्भर है और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रही हैं। उनके पिता एक राशन दुकान में सेल्समैन थे पर कभी कोई कमी नहीं आने दी इसके कारण ही बेटियां आगे बढ़ सकीं।

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Published on:
02 Aug 2018 08:34 pm
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