CG Corruption Case: रायपुर प्रदेश में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में आए करीब 50 वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ जांच प्रस्ताव लंबित पड़े हैं।
CG Corruption Case: छत्तीसगढ़ के रायपुर प्रदेश में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में आए करीब 50 वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ जांच प्रस्ताव लंबित पड़े हैं। इनमें आईएएस, आईपीएस और आईएफएस स्तर के अफसर शामिल हैं। (EOW) और (ACB) ने कई मामलों में राज्य सरकार से अभियोजन स्वीकृति मांगी है, लेकिन नौ अधिकारियों के खिलाफ अब तक अनुमति नहीं मिल पाई है। इससे जांच एजेंसियों की कार्रवाई ठप पड़ी है।
ईओडब्ल्यू-एसीबी ने जिन मामलों में जांच की सिफारिश की है, वे महीनों से लंबित हैं।
प्रदेश में चर्चित कोयला घोटाले में जनवरी 2026 में आईएएस समीर बिश्नोई के खिलाफ जांच की स्वीकृति के बाद दायरा और बढ़ा है। किरण कौशल, भीम सिंह और जय प्रकाश मौर्य जैसे नाम भी जांच के घेरे में बताए जा रहे हैं। वहीं, शराब घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड, अनिल टुटेजा और निरंजन दास पहले से ही जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। इन मामलों ने प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत सीजीएमएससी निविदा प्रकरण में भी जांच जारी है। आईएएस चंद्रकांत वर्मा, अभिजीत सिंह, सीआर प्रसन्ना और कार्तिकेय गोयल के नाम सामने आए हैं। आरोप है कि निविदा प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई। राजस्व विभाग में पटवारी भर्ती परीक्षा में कथित गड़बड़ी को लेकर आईएएस रमेश शर्मा का नाम भी चर्चा में है।
महादेव एप सट्टा घोटाले ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाया है। आईपीएस अधिकारियों—आनंद छाबड़ा, अजय यादव, आरिफ शेख, प्रशांत अग्रवाल, अभिषेक पल्लव और ओपी पाल—पर सट्टा प्रमोटरों को संरक्षण देने और अवैध वसूली के आरोपों की जांच चल रही है।
वन विभाग में नीलगिरी पौधा खरीदी और कैंपा मद के दुरुपयोग के मामलों में आईएफएस अरुण प्रसाद, एके बोआज और विवेक आचार्य समेत कई अफसरों के खिलाफ जांच की अनुमति फिलहाल लंबित है। इससे एजेंसियों की कार्रवाई सीमित हो गई है।
लगातार लंबित स्वीकृतियों ने प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। विपक्ष जहां सरकार पर कार्रवाई में देरी का आरोप लगा रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि सभी मामलों में विधिक प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाएगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि लंबित स्वीकृतियां कब मिलती हैं और क्या जांच एजेंसियां इन मामलों में निर्णायक कार्रवाई कर पाती हैं।