प्रकृति ने इस क्षेत्र को जो नैमत बख्शी है उसी ने जनजीवन को संभाल रखा है, वरना विकास की बयान यहां तक पहुंची नहीं है। जो विकास यहां दिखाई भी देता है उसकी असलियत कुछ और ही है।
नितिन त्रिपाठी/मोहला मानपुर. राजनांदगांव, डोंगरगांव, अंबागढ़ चौकी को पार करने के बाद मोहला-मानपुर विधानसभा की परिधि में पहुंचते ही आपको यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा दिखाई देने लगता है। प्रकृति ने इस क्षेत्र को जो नैमत बख्शी है उसी ने जनजीवन को संभाल रखा है, वरना विकास की बयान यहां तक पहुंची नहीं है। जो विकास यहां दिखाई भी देता है उसकी असलियत कुछ और ही है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसी बुनियादी जरूरतें ही पूरी नहीं हो पाईं तो बड़े मुद्दे और उनकी बातें पीछे छूट जाती हैं। आमतौर पर नेताओं से शिकायत रहती है कि वो जीतने के बाद शक्ल नहीं दिखाते। लेकिन इस इलाके की दिलचस्प बात यह है कि मतदान उन गांवों में भी होता आ रहा है जहां आजादी के बाद से आज तक कोई वोट मांगने तक नहीं पहुंचा। जब उम्मीदवार दरवाजे पर नहीं आते तो उम्मीद किससे करें? इसके बाद भी चुनाव को लेकर जब अलग-अलग आधा दर्जन गांवों के लोगों की नब्ज टटोली तो बहुत कुछ बाहर आ गया।
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अभी प्रशासन भरोसा नहीं जीत पाया
च कहें तो विकास को यहां आने के लिए अच्छा रास्ता भी नहीं मिल रहा। मानपुर मुख्यालय से 8-10 किलोमीटर के फासले पर बसे गांवों में जाने वाले रास्ते देखते ही यह बात साबित हो जाती है। जब ब्लॉक मुख्यालय पर जिंदगी का बोझा उठाए पहुंचने वाले ग्रामीणों से चुनाव की बात करो तो उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती हैै, ग्रामीण एक-दूसरे को देखते हैं और फिर ठहाका लगाकर हंस देते हैं। यह हंसी उस व्यवस्था पर है जिसने इनकी जिंदगी को मजाक बनाकर रख दिया है। इस इलाके के अधिकांश गांवों में घूमने के बाद समझ आया कि राजनीतिक दलों और उनके जनप्रतिनिधियों से इन्हें एक धैले की भी उम्मीद नही है। यह कोई अपेक्षा भी नहीं करते।
पर कभी किसी से भी जवाब नहीं मांगते
बड़ी आबादी वाले मोहला और मानपुर में आमदिनों की भीड़ उन आदिवासियों की होती है जो 50 किलोमीटर तक का फासला तय करके यहां बैंक से धान की उपज या तेंदूपत्ता संग्रहण की राशि निकालने के लिए आते हैं। बैंक के बाहर घंटों कतार में बैठना, वो भी रकम मिलने से पहले एक अदद विड्रॉल फॉर्म के लिए। इस कतार को आप इनकी जिंदगी की जद्दोजहद से सीधे जोडक़र देख सकते हैं। पैदल कई किलोमीटर चलकर मुख्य मार्र्ग तक आना और फिर बस या मालवाहक में भूसे की तरह भरकर ब्लॉक मुख्यालय तक का सफर करना।
हमसे तो कोई वोट मांगने भी नहीं आता...
आप सोचेंगे ऐसा कैसे हो सकता है, कथित तौर पर मुद्दों को लेकर चुनाव हों और उसमें जनता की कोई अपेक्षा न हो? अपेक्षा तो है लेकिन किससे की जाए? पोरोड़ गांव का हाल कुछ ऐसा ही है। यहां के एक 22 वर्षीय नौजवान ने कहा कि उम्मीदवार वोट मांगने भी नहीं पहुंचते, जीतने के बाद आने का तो सवाल ही नहीं उठता। मानपुर मुख्यालय पर आने वाले ग्रामीण किसी तरह बात करने को तैयार हो गए। चुनावी मुद्दों पर बड़ी मासूमियत भरे शब्दों में कहा, यहां तो अभी सब चाहिए।
एक साल पहले बिजली आ गई, लेकिन गांव में टिकी रहे तो खेतों को सींचने के लिए पंप चला सकेंगे। मौसम से धोखा खाने वाले ग्रामीणों को जब बिजली गच्चाा दे जाती है तो सूखती फसल इनकी उम्मीदों को भी सुखा डालती है। अपने गांव में बिजली का मुंह देखने को तरसने वाले ग्रामीण खेती के लिए बारिश के भरोसे हैं। कारेकटा पंचायत क्षेत्र के दरबार सिंह, चावरगांव के गांगसाय, पोरोड़ का दाजूराम, बोरियागांव का उक्कूराम, हीरागांव के सावजीराम, सुनील पटेल जैसे कई लोगों का एक ही सवाल था...नेताओं की शक्ल हम नहीं देख पाते, पंचायत की सभा में अपनी बात रख देते हैं।
पति 3 बार विधायक और मंत्री रहे, अब पत्नी हैं यहां विधायक
मोहला-मानपुर में अभी कांग्रेस की तेजकुंवर नेताम विधायक हैं। उनके पति तीन बार विधायक निर्वाचित हुए और मंत्री रह चुके हैं। नेताम ने भाजपा के भोजेश शाह मंडावी को 956 वोट के मामूली अंतर से हराया था। विधानसभा चुनाव 2018 में 237 मतदान केंद्रों पर 155791 मतदाता हैं। इस आदिवासी सीट पर जोगी कांग्रेस भी पहली बार उतरेगी, जिससे चुनावी मुकाबला रोचक होगा।
तेंदूपत्ता और धान का पिछले साल का भुगतान अब हो रहा
20 किलोमीटर दूर बोरिया गांव से तेंदूपत्ता संग्रहण का भुगतान लेने आए ग्रामीणों ने कहा, कई चक्कर लगाने पर पैसा मिलता है। इस साल का अभी पैसा नहीं आया है, पिछले साल का भुगतान अब किया जा रहा है। इसके बाद लंबा सफर कर यहां पहुंचो तो मिलता है तो सिर्फ विड्रॉल फार्म, क्योंकि बैंक में मात्र एक काउंटर है, इसलिए विड्रॉल मिलने के बाद आप उसे भरकर रख सकते हैं। रकम कब मिलेगी यह तो बैंक प्रबंधक भी नहीं बता सकता। अक्सर सर्वर डाउन हो जाता है, लिंक फेल हो जाती है।
इस बातचीत के बीच बैंक की कतार में खड़े ग्रामीण को मिर्गी का दौरा पड़ गया। उसका करीब 8-9 वर्ष का बच्चा रोते हुए उसे संभालने की कोशिश करता है, तभी पीछे से आवाज आती है, साहब, क्या-क्या बताएं, हमें तो इलाज भी मिलता। स्वास्थ्य केंद्र खुल नहीं पाए हैं जो सड़क किनारे के गांवों में हैं भी उनको डॉक्टर नहीं मिला, जिनमें डॉक्टर हैं वो यहां आते नहीं। उस इंसान की कंपकंपाती काया, यहां की लडख़ड़ाई हुई व्यवस्था की कहानी खुद ही सबकुछ कह रही थी।