चुनावी महासंग्राम में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटों पर सभी राजनीतिक दलों की निगाहें जमी हुई है
रायपुर. छत्तीसगढ़ के चुनावी महासंग्राम में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटों पर सभी राजनीतिक दलों की निगाहें जमी हुई है। बसपा और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के गठबंधन के बाद यह चर्चा आम है कि बहुजन समाज पार्टी का साथ मिलने के बाद इन आरक्षित सीटों पर अलग तरह की लड़ाई नजर आएगी।
भाजपा के खाते में पिछले चुनाव में इन आरक्षित 10 सीटों में में से 9 सीटें आई थी वहीं कांग्रेस को एक सीट मिली। इन सीटों पर अगर भाजपा अपने प्रदर्शन को बरकरार रखती है तो उसके लिए सत्ता हासिल करना आसान होगा वहीं अगर कांग्रेस या फिर जकांछ और बसपा का गठबंधन ,भाजपा को परास्त करने में कामयाब रहता है तो विधानसभा में वो मजबूत होकर आएंगे। मौजूदा विधानसभा में बसपा के केशव चंद्रा जिस सीट से विधायक हैं वो अनारक्षित है।
प्रदेश में अनुसूचित जाति की संख्या 12.82 फीसद है। 2013 में बसपा ने 90 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किये और कुल 5 लाख 58 हजार 424 वोट हासिल किये। यह कुल वोट का 4.27 फीसद था। इस चुनाव में भाजपा को 41 .18 और कांग्रेस को 40.43 फीसदी वोट हासिल हुए । एससी आरक्षित सीटों में से केवल पामगढ़ में ही बसपा का उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहा था। बाकि सीटों पर पार्टी काफी पीछे रही , हाल यह था कि पूरे प्रदेश में 84 सीटों पर बसपा उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। निस्संदेह बसपा इस हाल में कत्तई नहीं है कि अकेले खेल बना या बिगाड़ सके।
एससी आरक्षित सीटों पर 2013 के नतीजों से पता चलता है कि मुंगेली और डोंगरगढ़ को छोडक़र बाकि सीटों पर विजयी और निकटतम उम्मीदवार के बीच जीत हार का अंतर 5 हजार वोटों से ज्यादा रहा है । इन आरक्षित सीटों में से चार सीटें ऐसी हैं जिनमे विजयी उम्मीदवार ने अपने निकटम उम्मीदवार को 20 हजार से ज्यादा मतों से हटाया है ।
पामगढ़ को छोडक़र बाकी सीटों पर जीत का अंतर 10 हजार से ज्यादा रहा है। यह स्थिति तब थी जब जोगी कांग्रेस के साथ थे। मतलब साफ़ है कि अगर बसपा और जोगी कांग्रेस मिल भी जाते हैं तो मुंगेली और डोंगरगढ़ को छोडक़र किसी और विधानसभा में कोई बड़ा उलटफेर करेंगे इसकी संभावना कम है।