
बस्तर, ये नाम सुनते ही कुछ वर्ष पहले जेहन में सिर्फ एक ही बात आती थी, नक्सली घटनाएं। लेकिन बीते साढ़े तीन वर्षों में इस बस्तर में बहुत कुछ बदल गया है। यहां की फिजाओं में अब स्वावलंबन की बयार बह रही है। यहां की धरती वनोपज के रूप में सोना उगल रही है और इस सोने का मूल्य बस्तर की महिलाएं बखूबी समझने लगी हैं। ऐसी ही कहानी है बस्तर ब्लाक के तारापुर गांव की रहने वाली द्रौपदी ठाकुर की।
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द्रौपदी ठाकुर बीते साढ़े तीन वर्षों में कर्जमाफी का लाभ उठाते हुए 6100 महिला किसानों को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया और बना दिया भूमगादी महिला किसान उत्पादक संघ। यहां भूम का अर्थ है जमीन और गादी का अर्थ है जमीन से निकलने वाला पदार्थ। भूमगादी एफपीओ को ये समझ आ गया था कि आदिवासियों के पास कृषि और वन उत्पाद तो हैं, लेकिन वो इन्हें बेचने में सक्षम नहीं हैं। बकावंड में भेंट-मुलाकात कार्यक्रम के दौरान द्रौपदी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपने संघर्ष और सफलता का किस्सा साझा किया।
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द्रौपदी ठाकुर ने बताया कि महिला किसानों को संगठित करने का जिम्मा उन्होंने उठाया और नजदीकी तीन जिलों के 9 विकासखंडों में 6100 महिला किसानों को एकजुट किया। ये महिला किसान अपने-अपने गांवों में जाकर कृषि एवं वन उत्पादों को समर्थन मूल्य पर खरीदते हैं। भूमगादी संगठन किसानों से इमली, कोदो-कुटकी, हल्दी, मिर्ची समर्थन मूल्य पर खरीदता है। फिर वैल्यू एडिशन और पैकेजिंग कर जगदलपुर के हरियाली बाजार में ले जाकर बड़े व्यापारियों को बेचते हैं। इससे किसानों को उनके उपज की सही कीमत मिलती है और महिला किसानों को मुनाफे का लाभांश भी मिल जाता है। द्रौपदी ठाकुर ने बताया कि महिला भूमगादी किसान उत्पादक संघ ने पिछले वर्ष में साढ़े चार करोड़ रुपए के प्रोडक्ट बाजार में बेचे हैं। इनका खुद का 5 टन का कोल्ड स्टोरेज है। भूमगादी महिला स्व-सहायता समूह के ब्रांडनेम हरिहर बस्तर को आईएसओ का दर्जा भी मिला हुआ है।
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