
Dhamtari Madamsill Dam: सिंचाई विभाग की गंभीर लापरवाही ने प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहर और एशिया के पहले सायफन सिस्टम वाले 103 वर्ष पुराने मुरुमसिल्ली (मैडमसिल्ली) बांध को खतरे में डाल दिया है। मानसून से डेढ़ महीने पहले पूरा हो जाने वाला नियमित रखरखाव समय पर नहीं होने का परिणाम अब सामने आया है। मुख्य गेट के समीप बांध का एक हिस्सा धंसने और दरार जैसी स्थिति बनने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है।
आनन-फानन में मरम्मत शुरू कर बांध का जलस्तर घटाया जा रहा है। पिछले दो दिनों में करीब 1.025 टीएमसी पानी नहर के जरिए गंगरेल बांध की ओर छोड़ा जा चुका है। जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते रखरखाव किया जाता तो ऐसी नौबत नहीं आती। अब मानसून शुरू होने के बाद स्थायी मरम्मत संभव नहीं है। ऐसे में इस वर्ष प्रदेश में अच्छी बारिश होने पर भी सुरक्षा कारणों से मुरुमसिल्ली बांध को पूरी क्षमता तक भरना मुश्किल हो सकता है।
पूर्व अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार बांध के रखरखाव का कार्य हर साल मानसून से पहले पूरा किया जाता है, ताकि बारिश के दौरान किसी प्रकार का जोखिम न रहे। लेकिन इस बार जल संसाधन विभाग क्रमांक-38 की लापरवाही के कारण मरम्मत कार्य समय पर नहीं हुआ और नुकसान सामने आने के बाद विभाग सक्रिय हुआ।
इंजीनियरों और जिम्मेदार अधिकारियों की इस घोर लापरवाही का खमियाजा अब क्षेत्र की जनता को भुगतना पड़ेगा।तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान मानसून के दौरान बांध के क्षतिग्रस्त हिस्से की स्थायी मरम्मत संभव नहीं है। सुरक्षा को देखते हुए जलस्तर सीमित रखना पड़ सकता है। इसका सीधा असर बांध की जल भंडारण क्षमता पर पड़ेगा और अच्छी बारिश होने के बावजूद जलाशय पूरी तरह नहीं भर सकेगा। अधिकारी अपनी लापरवाही छुपाने के लिए लीपा-पोती में जुट गया है। बांध के पूर्व जानकार बताते हैं कि मेंटनेंस का काम हर साल मानसून आने के डेढ़ महीने पहले किया जाता है।
राहत की बात यह है कि वर्ष 1978 से मुरुमसिल्ली बांध का पानी सीधे सिंचाई के लिए उपयोग नहीं किया जा रहा है। यदि खरीफ सीजन में किसान इस बांध पर निर्भर होते, तो जलस्तर कम करने के कारण हजारों एकड़ फसल प्रभावित हो सकती थी। फिलहाल विभागीय अधिकारी मौके पर मरम्मत कार्य में जुटे हैं, लेकिन सवाल यह है कि मानसून से पहले जरूरी रखरखाव समय पर क्यों नहीं कराया गया। क्या इस ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान पहुंचाने वाले लापरवाह अधिकारियों पर कोई कड़ी कार्रवाई होगी?
पत्रिका ने जल संसाधन विभाग क्रमांक-38 के कार्यपालन अभियंता हेमलाल कुरेशिया और एसडीओ भाविन देवांगन से बांध को हुए नुकसान और उसके संभावित प्रभाव को लेकर संपर्क किया। प्रारंभ में दोनों अधिकारियों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बाद में ईई हेमलाल कुरेशिया ने कहा कि "बांध को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। यह सामान्य मरम्मत कार्य है। मानसून पूर्व ही रिपेयरिंग की जा रही है। अच्छी बारिश होने पर भी बांध पूरी क्षमता से भरेगा और किसी प्रकार का खतरा नहीं है।"
मानसून पूर्व रिपेयरिंग कार्य किस वजह से पूरा नहीं करा पाए सवाल पर कहा कि मरम्मत मानसून पूर्व ही हो रहा है। अच्छी बारिश हुई तो भी बांध पूरा भरेगा। बांध पर कोई आंच नहीं आएगा।
पत्रिका का प्रश्न : बांधों और गेटों के रखरखाव को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। मानसून से पहले क्या कोई सेफ्टी ऑडिट होता है?
यह बेहद महत्वपूर्ण विषय है। छत्तीसगढ़ की जल संरचनाओं की औसत आयु लगभग 55 वर्ष है। कुछ संरचनाएं 100 से 140 वर्ष पुरानी है। इतनी पुरानी संरचनाओं की सुरक्षा तय करना बड़ी जिम्मेदारी है। भारत सरकार ने भी इस दिशा में बड़ा कदम उठाया और 2021-22 में डैम सेफ्टी एक्ट लागू किया गया। इसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ में लगभग 329 संरचनाओं को चिन्हित किया गया है।
इन संरचनाओं की उम्र, डिजाइन और अन्य तकनीकी मानकों के आधार पर इन्हें चिह्नित किया गया है। पिछले तीन-चार वर्षों से विभाग इन पर लगातार काम कर रहा है। इनके लिए कार्ययोजना बनाई गई है, बजट प्रावधान किया गया है और रिपेयर व रेनोवेशन का काम लगातार चल रहा है। हमारा उद्देश्य इन संरचनाओं को सुरक्षित रखना और उनकी आयु में आने वाले दशकों तक वृद्धि करना है।
मानसून पूर्व रखरखाव समय पर क्यों नहीं हुआ?
बांध का हिस्सा धंसने के बाद ही विभाग क्यों सक्रिय हुआ?
क्या ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
यदि नुकसान मामूली है, तो फिर 1.025 टीएमसी पानी छोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?