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आंसू बहा रहीं जीवनदायिनी जल संरचनाएं, छत्तीसगढ़ के 65% डैम गेट जर्जर, कई गांवों पर मंडराया बाढ़ का खतरा

Monsoon Flood Threat in Chhattisgarh: राज्यभर में बांधों, बैराजों और एनीकटों के करीब 65% गेट जर्जर हो चुके हैं, जिससे लाखों गैलन पानी बर्बाद हो रहा है। मानसून से पहले इनकी बदहाल स्थिति तटवर्ती गांवों के लिए भी खतरे की घंटी बन गई है।

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रायपुर

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Khyati Parihar

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सुबोध कुमार झा

Jun 08, 2026

Chhattisgarh Dam Crisis

फाइल फोटो

रायपुर@सुबोध कुमार झा।Chhattisgarh Dam Crisis: प्रदेश की जीवनदायिनी जल संरचनाएं इन दिनों गंभीर प्रशासनिक उपेक्षा और रखरखाव की कमी के चलते 'आंसू' बहा रही हैं, जिससे अब गांवों पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है। पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि राज्यभर में बने बांधों, बैराजों और एनीकटों के करीब 65 प्रतिशत गेट जर्जर हो चुके हैं। ये गेट न केवल बहुमूल्य जल संसाधनों की बर्बादी का कारण बन रहे हैं, बल्कि समय पर मरम्मत न होने से इनके टूटने या अचानक खुलने का डर ग्रामीणों के लिए किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है।

राज्य के जल संसाधन विभाग के तहत मौजूद हजारों संरचनाओं की 'जीवन रेखा' माने जाने वाले गेट रिसाव और जंग की भेंट चढ़ चुके हैं। एक ओर जहां 2800 लघु सिंचाई, 29 मध्यम और 8 वृहद परियोजनाएं, 16 बैराज, 545 एनीकट और 3500 से अधिक स्टॉप डैम मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर इन संरचनाओं की जर्जर स्थिति लाखों गैलन पानी बर्बाद कर रही है और तटवर्ती बस्तियों के लिए गंभीर संकट का सबब बन चुकी है।

वेतन पर खर्च 50 करोड़, फिर भी बदहाल गेट

विभाग की कार्यप्रणाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में रखरखाव के लिए 65 सहायक अभियंता, 165 उप अभियंता और सात कार्यपालन अभियंता तैनात हैं, जिनके वेतन और भत्तों पर प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ रुपए का भारी-भरकम खर्च किया जाता है। इसके बावजूद, दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित स्टॉप डैमों और एनीकटों के गेट या तो गायब हो चुके हैं या फिर कबाड़ में बेचे जा चुके हैं।

कागजी मरम्मत और जमीनी हकीकत

पत्रिका की पड़ताल में यह स्पष्ट हुआ है कि जहां करोड़ों की लागत से बांध और एनीकट बनाए जाते हैं, वहां उनके गेटों की देखरेख पर महज 20 से 25 लाख रुपए की आवश्यकता होती है। यदि यह छोटी राशि समय पर खर्च कर दी जाए, तो करोड़ों की परियोजनाएं निष्प्रभावी होने से बच सकती हैं।

हालांकि, ई एंड एम (विद्युत एवं यांत्रिकी) विभाग की कार्यप्रणाली केवल कागजों तक सीमित है। मरम्मत के नाम पर प्रतिवर्ष होने वाला खर्च धरातल पर कहीं नजर नहीं आता, जिससे सरकारी संपत्ति का तो नुकसान हो ही रहा है, साथ ही किसान और ग्रामीण भी बूंद-बूंद पानी को तरसने को मजबूर हैं।

जल संरचनाओं की बदहाली का प्रमाण

केस 1: कांदुल एनीकट (बालोद): खरखरा नदी पर 2.31 करोड़ रुपए की लागत से बना एनीकट महज छह माह में बेकार हो गया। गुणवत्ता में कमी के कारण इसमें लगातार रिसाव हो रहा है, जिससे 4500 की आबादी वाले गांव का भूजल स्तर नीचे गिर गया है और जल स्रोत सूख रहे हैं।

केस 2: पीतईबंद एनीकट (राजिम): 32.79 करोड़ रुपए की लागत से 2013 में निर्मित यह एनीकट अब भगवान भरोसे है। इसके नौ गेटों से लगातार रिसाव हो रहा है। इसके अलावा, पूरा क्षेत्र गाद और जलकुंभी से पट चुका है, जिससे एनीकट का अस्तित्व खतरे में है। जिम्मेदार अधिकारी जानकारी देने के बजाय पल्ला झाड़ते नजर आते हैं।

केस 3: दूरस्थ क्षेत्रों के स्टॉप डैम: जंगलों और ग्रामीण अंचलों में स्थित स्टॉप डैमों की स्थिति सबसे भयावह है। कहीं गेट चोरी हो गए हैं तो कहीं कबाड़ में बेच दिए गए। मात्र 50 हजार से एक लाख रुपए के खर्च से मरम्मत संभव है, लेकिन अनदेखी के कारण 50 लाख से एक करोड़ की लागत वाली ये संरचनाएं निष्प्रभावी हो गई हैं।

केस 4: बड़े बैराजों में भी रिसाव: कलमा और शिवरीनारायण जैसे बड़े बैराजों में भी जल रिसाव की शिकायतें आम हैं। भले ही वहां स्थायी कर्मचारी तैनात हैं, लेकिन तकनीकी खामियां बनी हुई हैं। यह स्पष्ट करता है कि रखरखाव की पूरी व्यवस्था ही कमजोर है।

प्रथम दृष्टया क्षेत्र के कार्यपालन अभियंता की जिम्मेदारी बनती है। वे इलेक्ट्रिकल मेकेनिकल को चिठ्ठी जारी करते हैं, इसके बाद निरीक्षण करते हुए गेट की मरम्मत होती है। कई स्थानों पर ऐसी स्थिति पाए जाने पर गेट की जांच कर ठीक किया जाता है। - एसवी भागवत, चीफ इंजीनियर(मॉनिटरिंग), जल संसाधन विभाग