
Sunday Guest Editor: छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक चित्रकला आज आधुनिक कला के दौर में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे समय में कोंडागांव की युवा कलाकार हर्षदीप कौर (रागिनी) अपनी फोक फ्यूजन शैली के माध्यम से इस विलुप्त होती विरासत को नया जीवन दे रही हैं।
उन्होंने लोक चित्रकला के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए उसे आधुनिक रंग, आकर्षक बॉर्डर और समकालीन प्रस्तुति के साथ कैनवास पर उतारा है। यही कारण है कि उनकी पेंटिंग्स अब केवल कलादीर्घाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लोगों के घरों की सजावट और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन रही हैं।
हर्षदीप कहती हैं कि फोक फ्यूजन का मतलब परंपरा को बदलना नहीं, बल्कि उसे आज की पीढ़ी की पसंद के अनुरूप प्रस्तुत करना है। उन्होंने अपनी हर पेंटिंग का आधार पारंपरिक छत्तीसगढ़ी लोक चित्रकला को ही रखा है। केवल रंगों के संयोजन, बॉर्डर और प्रस्तुति में आधुनिक प्रयोग किए हैं, ताकि युवा वर्ग भी इस कला से जुड़ सके।
इस कला की विरासत उन्हें बचपन में ही अपने पिता और प्रसिद्ध लोक चित्रकार खेम वैष्णव से मिली। महज 13 वर्ष की उम्र से उन्होंने चित्र बनाना शुरू कर दिया था। आज वह उसी विरासत को नए आयाम देते हुए आगे बढ़ा रही हैं।
सिर्फ चित्र बनाना ही उनका उद्देश्य नहीं है। हर्षदीप नियमित रूप से युवाओं और बच्चों को लोक चित्रकला का प्रशिक्षण भी देती हैं। उनका मानना है कि जब तक नई पीढ़ी इस कला को सीखेगी नहीं, तब तक इसका संरक्षण संभव नहीं होगा। वे कहती हैं कि कला केवल रोजगार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत है, जिसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हर कलाकार की जिम्मेदारी है।
हर्षदीप का कहना है कि प्रदेश के सार्वजनिक स्थलों और सरकारी भवनों में अक्सर वारली आर्ट का उपयोग किया जाता है, जिसे लोग छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला समझ लेते हैं। जबकि दोनों शैलियां पूरी तरह अलग हैं। उनके अनुसार छत्तीसगढ़ की लोक चित्रकला में जन्म से लेकर जीवन के विभिन्न संस्कारों और सामाजिक परंपराओं का विस्तृत चित्रण मिलता है। इसलिए सरकार को सार्वजनिक भवनों, दीवारों और पर्यटन स्थलों पर स्थानीय लोक चित्रकला को प्राथमिकता देनी चाहिए।
सरकार से ये अपेक्षाएं:
1-स्कूलों और कॉलेजों में नियमित कार्यशालाएं आयोजित हों। सरकारी भवनों और सार्वजनिक दीवारों पर छत्तीसगढ़ की लोक चित्रकला को स्थान मिले।
2-लोक कलाकारों को बाजार और प्रदर्शन के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएं।
3-गांवों के वरिष्ठ कलाकारों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़कर उनकी पारंपरिक जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचाई जाए।
संदेश: अपनी हॉबी को कभी मरने मत दीजिए। यदि वही आपका पेशा बन जाए तो उससे बड़ा सौभाग्य नहीं हो सकता। हमारी लोककलाएं हमारी पहचान हैं, इन्हें आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ाना समय की जरूरत है। (रायपुर से सरिता दुबे की स्पेशल स्टोरी)
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Updated on:
26 Jul 2026 03:05 am
Published on:
26 Jul 2026 02:54 am
