
Chhatisgarh Patrika News: @ताबीर हुसैन। छत्तीसगढ़ की पहचान धान और चावल के साथ यहां की पारंपरिक भाजी और कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज से भी है। दाल-चावल, मौसमी सब्जियां और स्थानीय खाद्य पदार्थ स्वाद के साथ शरीर की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी करने में भी भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या हमारी रोज की थाली में इन खाद्य पदार्थों को पर्याप्त जगह मिल रही है? विश्व खाद्य दिवस पर स्थानीय भोजन की खूबियों के साथ यह समझना भी जरूरी है कि खानपान की छोटी-छोटी गलतियां पोषण का संतुलन कैसे बिगाड़ सकती हैं। छत्तीसगढ़ में उपलब्ध विविध प्रकार की भाजियां भोजन में पोषक तत्वों की विविधता बढ़ाती हैं। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और स्तनपान कराने वाली माताओं के भोजन में पर्याप्त मात्रा और विविधता का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।
डायटिशियन डॉ. नेहा जैन के अनुसार, छत्तीसगढ़ की पारंपरिक थाली में कोदो, कुटकी, दाल और चावल का विशेष महत्व है। ये खाद्य पदार्थ शरीर को ऊर्जा देने, मांसपेशियों के रखरखाव और आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति में मदद करते हैं। स्थानीय और मौसमी खाद्य पदार्थों को शामिल करके कम खर्च में भी संतुलित आहार लिया जा सकता है। दाल और चावल का संयोजन भोजन में प्रोटीन की गुणवत्ता बेहतर करने का किफायती तरीका है। इसके साथ स्थानीय हरी पत्तेदार भाजियों को भी नियमित रूप से शामिल करना चाहिए।
भोजन में केवल चावल या रोटी की मात्रा अधिक रखना और दाल-सब्जियों को कम जगह देना पोषण के संतुलन को प्रभावित कर सकता है। रोज पर्याप्त हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खाना, फलों के स्थान पर चाय-बिस्कुट या नमकीन लेना और दाल, चना, राजमा, दूध, दही या सोया जैसे प्रोटीन स्रोतों को नजरअंदाज करना भी आम गलतियां हैं। इसके अलावा नमक और चीनी का अधिक सेवन, तली हुई चीजें बार-बार खाना तथा जरूरत से ज्यादा तेल डालना सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
छत्तीसगढ़ में कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज पारंपरिक खानपान का हिस्सा रहे हैं। इनके उत्पादन, प्रसंस्करण और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ मिलेट मिशन महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य मिलेट्स की खेती को प्रोत्साहित करने के साथ किसानों के लिए बेहतर अवसर तैयार करना और इन अनाजों की खपत बढ़ाना है। हालांकि, इन्हें चावल या गेहूं का एकमात्र विकल्प मानने के बजाय दाल, सब्जियों और दूसरे खाद्य पदार्थों के साथ संतुलित भोजन में शामिल करना बेहतर है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के शोधकर्ताओं ने जशपुर जिले के 100 किसान परिवारों के सर्वेक्षण के आधार पर कोदो और रागी की खेती, किसानों की धारणा तथा आर्थिक व्यवहार्यता का अध्ययन किया। अध्ययन के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में छोटे अनाजों का खेती रकबा 2014-15 के 1.19 लाख हेक्टेयर से घटकर 2022-23 में 44 हजार हेक्टेयर रह गया, जबकि उत्पादकता 232 से बढ़कर 492 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हुई। कोदो की औसत खेती लागत 19334 रुपए और शुद्ध लाभ करीब 18025 रुपए प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया। सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज और बाजार तक पहुंच प्रमुख चुनौतियां रहीं।