रायपुर

बदलती दुनिया मेंसांस्कृतिक पहचान जरूरी: डॉ.गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी, आईआईएम रायपुर के डायरेक्टर रामकुमार काकानी, सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री फूलबासन देवी और यंग एंटरप्रेन्योर अपूर्वा त्रिवेदी ने संबोधित किया।

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Apr 21, 2025

Raipur: पत्रिका समूह के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्मशती वर्ष के तहत रविवार, 20 अप्रैल को रायपुर की होटल बेबीलॉन केपिटल में पत्रिका की-नोट का आयोजन किया गया। पत्रिका की-नोट सामाजिक मुद्दों पर गहन चिंतन की शृंखला है, जो देशभर में आयोजित की जाती है। इस बार के संवाद कार्यक्रम का विषय रहा- नए दौर की भागदौड़ में पीछे छूटते भारतीयता के संस्कार…।

जिसमें अतिथि वक्ता के रूप में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी, आईआईएम रायपुर के डायरेक्टर रामकुमार काकानी, सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री फूलबासन देवी और यंग एंटरप्रेन्योर अपूर्वा त्रिवेदी ने संबोधित किया। कार्य₹म का संचालन गौरव गिरिजा शुक्ला ने किया। की-नोट में शहर के हर वर्ग से चिंतक बुद्धिजीवी जुटे।

बदलती दुनिया में सांस्कृतिक पहचान जरूरी

पाठक ही ईश्वर और पाठक पूजा

आज लोग पत्रिका क्यों पढ़ते हैं? क्योंकि उसका भी शरीर और आत्मा है। आत्मा खबरों में है, शरीर अखबार में। पाठक ही ईश्वर है और पाठक पूजा है। उसको राजी रखना हमारा धर्म है। कर्म को भावना बड़ा करती है, और वही भावना मां से आती है।

इस शृंखला की शुरुआत पिता की स्मृति को प्रणाम करने और उनके दिखाए मार्ग को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से की गई है। हम आज दो हिस्सों में जी रहे हैं। एक शरीर के स्तर पर, जो बाहरी दुनिया से जुड़ा है, और दूसरा वह जो मन और आत्मा से जुड़ा है, लेकिन उपेक्षित है। बदलाव को स्वीकारना ज़रूरी है, लेकिन यह भी देखना होगा कि उस बदलाव में क्या रखना है और क्या नहीं।

मीडिया आज आईटी से जी रहा है, लेकिन मेरे जीवन का मूल हिस्सा दृष्टि (विजन) है। भारत का पुरातन स्वरूप। अगर हम बदलती दुनिया में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखें, तो ही हम विश्व को कुछ देने योग्य बन पाएंगे। इसके लिए हमें अपने विवेक के साथ बदलाव को स्वीकारते हुए आगे बढ़ना पड़ेगा।

स्त्री संस्कृति और पुरुष सभ्यता है

स्त्री संस्कृति है और पुरुष सभ्यता। शरीर और बुद्धि के विकास में सारी ताकत लगा दी गई है, लेकिन मन को कोई दिशा नहीं दी जा रही। अगर मन को मरने दिया गया, तो फिर हमारी संस्कृति भी समाप्त हो जाएगी। उन्होंने आज के खानपान, सोच और जीवनशैली पर भी सवाल उठाए। अन्न वैसा खा रहे हैं तो मन भी वैसा बन रहा है। संस्कार चाहिए तो संस्कार देने वालों को जीवित करना होगा। कोठारी ने यह भी कहा कि हम तो विदेशी बनना चाह रहे हैं, बिना किसी भाषा या साधन के बस ट्रेंड में बह रहे हैं।

भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि हम केवल शरीर नहीं, आत्मस्वरूप हैं। सूचना और ज्ञान बाहर से आते हैं, लेकिन विजन और जीवन की दिशा भीतर से आती है। आज यही भीतर हमसे छूट रहा है। आधुनिक शिक्षा ने हमें मानव संसाधन बना दिया है, जबकि संस्कृति को जीवित रखना आवश्यक है।

गुलाब कोठारी
प्रधान संपादक, पत्रिका समूह

Updated on:
21 Apr 2025 01:06 pm
Published on:
21 Apr 2025 01:00 pm
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