
ताबीर हुसैन@रायपुर कहते हैं कामयाबी में गुरु की अहम भूमिका होती है। गुरु आपका टीचर भी हो सकता है या एेसा कोई व्यक्तित्व जिसने आपकी जिंदगी को नई दिशा दी। राजधानी में संगीत से लेकर विभिन्न आयामों में गुरुओं की प्रेरणा से शिष्यों ने सफलता के आसमान को छुआ है। इसमें कई एेसे हैं जिनके प्रथम गुरु उनके पिता ही हैं। हमारे देश में गुरुओं की परंपरा आदिकाल से रही है। समय के साथ-साथ गुरु परंपरा में कुछ ही विधाओं में सिमट कर रह गई है। आज कुछ एेसे लोगों से मिला रहे हैं जो अपनी सफलता में गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहे हैं।
कलक्टर ओपी चौधरी ने बताया कि शासकीय प्राथमिक शाला बायन जिला रायगढ़ में वे कक्षा पांचवीं के छात्र थे। स्कूल कैप्टन के लिए बच्चों को नाम देना था। ज्यादातर बच्चों ने मेरा नाम लिख दिया। इस तरह मैं स्कूल कैप्टन बन गया। उस टाइम कोई प्यून वगैरह तो रहते नहीं थे। इसलिए कई काम मुझे ही करने पड़ते थे। क्लास में कोई शोर मचाए तो उसका नाम लिखना भी महंगा साबित हो रहा था। इसी बात को लेकर लड़ाई हो जाया करती थी। मैं इन सब बातों से आजीज आकर लंबोदर गुरुजी के पास गया और कहा कि मुझे कैप्टनगिरी नहीं करनी है। उन्होंने पूछा क्यों तो मैंने सारी बातें बताई। पहले तो वे मंद-मंद मुस्कुराए उसके बाद मुझे बुलाकर अपने पास बिठाया। उन्होंने गंभीर लहजे में कहा कि क्या तुम हमेशा लोगों के पीछे चलना चाहते हो। क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम आगे चलो और लोग तुम्हारे पीछे हों। जिम्मेदारी से भागने वाले कभी कामयाब नहीं हो सकते। गुरुजी की बात मुझे लग गई। हालांकि इसे मैंने बड़े स्वरूप में नहीं सोचा था, लेकिन उस वक्त दिमाग में यही आया कि मुझे किसी के पीछे नहीं चलना है।
सिटी की गरिमा और स्वर्णा दिवाकर गायकी के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है। रियल्टी शो से लेकर स्टेज परफॉर्म तक दोनों ने खूब शोहरत हासिल की है। गरिमा और स्वर्णा ने बताया कि हमारे प्रथम गुरु तो पापा ही हैं। चूंकि वे खुद गीत-संगीत से जुड़े रहे तो शुरुआती तालीम हमें उन्होंने ही दी। इसके बाद मदन चौहान से संगीत के विविध आयाम सीखकर आगे बढ़े।
प्रदीप दक्षिणे प्राइवेट स्कूल में स्पोर्ट टीचर हैं। वे २०१७ में दुबई में टेनिस बॉल क्रिकेट स्पर्धा खेल चुके हैं। साथ ही कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान , झारखंड, मथुरा, आगरा में परफॉर्म किया। कई पदक भी जीते। इसके अलावा इंटर स्कूल, इंटर कॉलेज और इंटर यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट ड्यूस बॉल में क्रिकेट खेल चुके हैं। वे कहते हैं कि मेरे गुरु तो मेरे पैरेंट्स हैं। उन्होंने ही मेरे हर कदम में साथ दिया और प्रेरित किया।
सीए छोड़ पेंटिंग को बनाया प्रोफेशन तेलघानी नाका की रहने वाली इन दिनों कांदीवली मुंबई में रह रही हैं। वे सीए की आर्टिकलशिप कर रही थीं, उसी वक्त युनूस खान से पेंटिंग सीखने पहुंची। उधर सीए का रिजल्ट आया, इधर ड्राइंग के प्रति रुझान बढ़ चुका था। उन्होंने सीए छोड़ पेंटिंग को ही प्रोफेशन बना लिया। शादी के बाद करीब डेढ़ साल तक अमरीका में रहीं। वहां आर्ट बनाकर सेल किया करती थीं। अभी मुंबई में पेंटिंग टीचर हैं। वे कहती हैं कि मेरे गुरु युनूस सर ने मेरे टैलेंट को परखा और मुझे मेरी हॉबी के हिसाब से तालीम दी।
मौका मिला।
ये कहानी है आइजी प्रदीप गुप्ता और उनकी टीचर अचम्मा जॉर्ज की। गुप्ता क्लास फोर्थ की पढ़ाई भारत माता स्कूल टाटीबंध कर रहे थे। एग्जाम खत्म होते ही जॉर्ज मैम केरल जा रही थीं, लेकिन बच्चों से बिछडऩे का उन्हें काफी दुख था, वे आंसुओं को रोक नहीं पा रही थीं। ये दृश्य 9 साल के स्टूडेंट के मन के किसी हिस्से में कैद हो गया था। वक्त बीतता गया। 1988 में ट्वेल्थ की पढ़ाई कर किशोर ने स्कूल तो छोड़ दिया लेकिन वहां की यादें साथ ले गया।
जिंदगी आगे बढ़ती गई। कॅरियर की लंबी छलांग और दुनियादारी के बीच गाहे-बगाहे वह मर्मस्पर्शीय दृश्य याद जरूर आता लेकिन वे किसी से शेयर नहीं करते थे। 2016 में जब वे आइजी बनकर रायपुर आए तो पुराने दोस्तों से मुलाकात की। यहां पहली बार उन्होंने जॉर्ज मैडम की चर्चा की। एक मित्र ने बताया कि उनका पुराना एडे्रस है लेकिन अभी वे वहां रहती है या नहीं मुझे पता नहीं। गुप्ता ने वह एड्रेस लिया और इंटरनेट की मदद से कोटम्मा (केरल) के एसपी से संपर्क किया। उन्हें किस्सा सुनाते हुए उस पते पर किसी को भेजकर फोन नंबर का भेजने का आग्रह किया। पुलिस ने पतासाजी की लेकिन पता बदल चुका था। वहां के एसपी ने कहा कि आप निश्चिंत रहिए मैं उन्हें खोज निकालूंगा। आखिरकर एक दिन उनका पता लग गया। वे पाला में रहने लगे थे।
जब पुलिस उनके घर पहुंची तो वे घबरा गए। उन्हें समझाया गया कि रायपुर से किसी ने आपका नंबर मांगा है। गुप्ता तक नंबर पहुंच चुका था। लेकिन उन्होंने शाम को कॉल किया। उधर वे लोग दिनभर बेचैन थे कि कौन है जो बात करना चाहता है। जब गुप्ता ने फोन पर बात की तो जॉर्ज मैम ने आवाज से ही पहचान लिया। उन्हें एक-एक स्टूडेंट और उस वक्त की बातें याद थी। जॉर्ज मैम ने गुप्ता को गृहप्रवेश का आमंत्रण दिया जिस पर उन्होंने तत्काल हामी भर दी। यहां उनके साथ ४ दोस्त गए जो उनके पढ़ाए हुए थे। रायपुर से मुंबई बाय प्लेन, फिर वहां से कोचीन। उसके बाद पाला पहुंचे। न सिर्फ मैडम जॉर्ज का सम्मान किया बल्कि जिन पुलिसकर्मियों ने उन्हें खोज निकाला था उन्हें भी पुरस्कृत किया। वहां के लोग हैरत में थे कि एेसे कौन से स्टूडेंट हैं जो ३६ साल बाद अपनी टीचर से मिलने आए हैं।
पूजा देवांगन ४ साल से कराते सीख रही है। पापा टेलर हैं। वह चेन्नई में नेशनल खेल चुकी हैं। स्कूल से दो बार नेशनल खेलने के अलावा इंदौर, जबलपुर और रीवां में भी परफॉर्म कर चुकी हैं। पूजा कहती हैं कि हर्षा मैम की तरह इंटरनेशनल खिलाड़ी बनना चाहती हूं।