
Chhattisgarh News: @ पीलूराम साहू। प्रदेश में 2 सितंबर को संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए हलषष्ठी (खमरछठ) का पर्व पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर माताओं द्वारा रखा जाने वाला व्रत धार्मिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, इस दिन खाया जाने वाला विशेष भोजन स्वास्थ्य के लिहाज से भी उतना ही फायदेमंद है। डॉक्टरों के अनुसार, इस पर्व पर खाया जाने वाला पसहर चावल और 6 प्रकार की भाजियां डायबिटीज, कमजोरी और कैंसर जैसी बीमारियों से बचाव व नियंत्रण में बेहद मददगार हैं।
पसहर चावल बिना हल चलाए उगने वाला धान होता है। सामान्य सफेद चावल की तुलना में इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होता है, जिससे यह खून में ग्लूकोज का स्तर अचानक नहीं बढ़ाता। यह बिना पॉलिश किया हुआ मोटा अनाज (मिलेट) है, जिसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर होता है। यह पाचन क्रिया को धीमा कर शुगर को नियंत्रित रखता है। साथ ही, इसमें मौजूद विटामिन-बी, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की कमजोरी दूर करते हैं और खून की मात्रा बढ़ाते हैं।
हलषष्ठी पर मुनगा, चेंच, कांदा, बोहार, कुम्हड़ा और अमारी जैसी 6 विशेष भाजियों को मिलाकर पकाने की परंपरा है।
इंसुलिन में सुधार: मुनगा (सहजन) और चेंच जैसी भाजियों के तत्व शरीर में इंसुलिन की कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं।
वजन व शुगर नियंत्रण: इन भाजियों में कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट न के बराबर होते हैं, जिससे पेट भरने पर भी वजन या शुगर लेवल नहीं बढ़ता।
डिटॉक्स व इम्युनिटी: ये भाजियां शरीर से हानिकारक टॉक्सिन बाहर निकालने, मेटाबॉलिज्म दुरुस्त करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हैं।
परंपरा के अनुसार पसहर चावल को भैंस के दूध, घी और सेंधा नमक के साथ पकाया जाता है, जबकि भाजियों को महुआ घी व सेंधा नमक में बनाया जाता है। इसमें तेल, सामान्य नमक या मसालों का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता। यह सात्विक और उबला हुआ भोजन पचने में हल्का होता है, जो लिवर और पैंक्रियाज (अग्न्याशय) को आराम पहुंचाता है।
विभिन्न भाजियों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर और फाइटो-केमिकल्स कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने में मदद करते हैं, जिससे कैंसर का खतरा कम होता है। उदाहरण के लिए, ब्रोकली व फूलगोभी में सल्फोराफेन होता है, जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में सहायक है। वहीं, पसहर चावल का कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स शरीर में शुगर लेवल को बढ़ने नहीं देता।