रायपुर

Chhattisgarh News: किसी का सहारा छिना, कोई जिंदगीभर के लिए अपाहिज… वन्यजीवों के हमलों में 6 साल में 541 मौतें, 1492 घायल

Chhattisgarh Wildlife News: छत्तीसगढ़ में मानव-वन्यजीव संघर्ष ने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी है। बीते छह वित्तीय वर्षों में वन्यजीवों के हमलों में 541 लोगों की मौत हुई, जबकि 1,492 लोग घायल या अपाहिज हुए।
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Oct 19, 2026
Chhattisgarh Elephant News
वन्यजीवों का आतंक (Photo Source- Patrika File Photo)

Human Wildlife Conflict: ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में वन्यजीवों की दस्तक अब केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि स्थायी सामाजिक-आर्थिक संकट बन चुकी है। आरटीआई कार्यकर्ता राकेश चौबे से मिली जानकारी के अनुसार, बीते छह वित्तीय वर्षों (2020-21 से 2025-26) में सरकार ने 112240 प्रकरणों का निपटारा कर 120.96 करोड़ रुपए का मुआवजा बांटे जाने का दावा किया है। हालांकि, यह व्यवस्था हादसों के बाद राहत राशि बांटने तक सिमटी दिखती है, जबकि मौत से पहले सुरक्षा देने में नाकाम साबित हो रही है।

आंकड़ों के मुताबिक, छह वर्षों में 541 लोगों की जान गई और 1,492 लोग घायल या अपाहिज हुए हैं। इन आंकड़ों के पीछे दर्दनाक कहानियां हैं। किसी घर का इकलौता कमाने वाला चला गया, तो कोई जिंदगी भर के लिए अपाहिज होकर बच्चों की पढ़ाई तक का खर्च उठाने में असमर्थ है। वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि संघर्ष के हॉटस्पॉट बदल रहे हैं।

सरगुजा, रायगढ़, कोरबा, सूरजपुर और धमतरी-बालोद क्षेत्र हाथियों व तेंदुओं के हमलों के लिहाज से सबसे संवेदनशील हैं। फसल कटाई के मौसम में वन्यजीवों की आवाजाही बढ़ने से खौफ रहता है। वन विभाग का सोलर फेंसिंग और गश्त का ढांचा कागजों तक सीमित रहने से ग्रामीणों को समय पर सटीक अलर्ट नहीं मिल पाता।

फसल बर्बाद, दावों का दम घोंटती लालफीताशाही

वन्यजीवों ने 28036.98 हेक्टेयर खेतों की फसल को चौपट किया, जिस पर 56.48 करोड़ का मुआवजा दिया गया। लेकिन वास्तविक जमीनी हकीकत यह है कि पटवारी से लेकर रेंजर तक के चक्कर काटने, कागजी प्रक्रियाओं और आवेदनों के निरस्त होने के डर से किसान परेशान रहते हैं। मुआवजा मिलने में महीनों का समय लगता है, जबकि वर्तमान मुआवजा दरें फसल की वास्तविक बाजार लागत के सामने बेहद कम हैं।

बजट भारी, नतीजे सिफर: कहां गया सुरक्षा का पैसा

रेडियो कॉलर ट्रैकिंग, गजराज ऐप, हाथी मित्र दल और सोलर फेंसिंग जैसी योजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपए का बजट खर्च किया जाता है। इसके बावजूद मौतों और फसल तबाही का आंकड़ा थमने का नाम नहीं ले रहा है। खर्च और नतीजों की तुलना करें तो विभाग का रिस्पॉन्स टाइम बेहद धीमा साबित हो रहा है।

केस-1: कांकेर के लारगांव में भालू का तांडव

कांकेर के लारगांव में भालू के हमले से एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई। परिवार पर रोजी-रोटी का संकट है। डीएफओ के अनुसार 6-6 लाख मुआवजा मिलना है, पर परिजनों का आरोप है कि उन्हें राशि और खोरिन जुर्री की पीएम रिपोर्ट अब तक नहीं मिली है।

केस-2: बालोद के कुंज कन्हार में हाथी का हमला

अगस्त 2023 में बालोद के डौंडी क्षेत्र में सुबह घर से बाहर निकली 60 वर्षीय गीताबाई की दंतैल हाथी के कुचलने से मौत हो गई थी। वन विभाग द्वारा समय पर मुआवजा मिलने से परिवार की स्थिति ठीक है। राहत है कि 2026 में यहां ऐसी कोई घटना नहीं हुई।

पत्रिका व्यू: राहत से आगे ठोस नीति की जरूरत

मुआवजा सिर्फ एक मरहम है, समाधान नहीं। जब तक वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स को अतिक्रमण मुक्त नहीं किया जाएगा, जंगलों के भीतर भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं होगी और पारदर्शी डिजिटल मुआवजा ट्रैकिंग सिस्टम लागू नहीं होगा, तब तक ग्रामीणों की जान और माल यूं ही दांव पर लगी रहेगी।

Updated on:
19 Oct 2026 08:46 am
Published on:
19 Oct 2026 08:46 am