Illegal Plotting Case: खैरागढ़ में सरकारी जमीन पर कथित अवैध प्लाटिंग को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। कोर्ट परिसर के सामने सरकारी जमीन को 22 हिस्सों में बांटने और कब्जों के बावजूद आठ महीने बाद भी कार्रवाई नहीं होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।
Illegal Plotting Case: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ शहर में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ न्यायालय परिसर के सामने सड़क किनारे वर्षों से रोजी-रोटी चला रहे छोटे ठेले और खोमचे हटाने के लिए प्रशासनिक अमला सक्रिय दिखाई दिया, वहीं ठीक उसी परिसर के सामने सरकारी जमीन पर कथित अवैध प्लाटिंग और कब्जों पर आठ महीने बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है। इस पूरे मामले ने प्रशासन की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पूरा मामला एडवर्ड पार्क के सामने न्यायालय से लगी नजूल भूमि का है। तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी की संयुक्त जांच में यह सामने आया कि नजूल प्लॉट नंबर 114 और 115, मूल खसरा नंबर 169 की जमीन को बिना वैधानिक अनुमति 22 हिस्सों में विभाजित कर अलग-अलग लोगों को बेचा गया।
जांच रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में इस जमीन पर 17 कब्जाधारी मौजूद हैं और कई हिस्सों में पक्के निर्माण भी कर लिए गए हैं। राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर 169 का कुल रकबा 2.259 हेक्टेयर दर्ज है और इसकी प्रकृति “छोटे झाड़ का जंगल एवं घास भूमि” बताई गई है। नियमानुसार ऐसी जमीन का निजी उपयोग, प्लाटिंग, विक्रय या व्यावसायिक हस्तांतरण नहीं किया जा सकता।
जांच दस्तावेजों के अनुसार लगभग 85,627 वर्गफीट सरकारी जमीन की रजिस्ट्रियां अलग-अलग लोगों के नाम किए जाने का मामला सामने आया है। नगर तथा ग्राम निवेश विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि संबंधित भूमि का कोई वैध ले-आउट स्वीकृत नहीं किया गया था और पूरी प्रक्रिया अवैध प्लाटिंग की श्रेणी में आती है।
इसके बाद 29 सितंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय की ओर से नगर पालिका परिषद को नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए थे। लेकिन आदेश जारी होने के आठ महीने बाद भी न तो अवैध निर्माण हटाए गए और न ही कथित रूप से शामिल लोगों पर कोई कठोर कार्रवाई की गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन छोटे ठेले और खोमचे वालों पर तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन सरकारी जमीन पर करोड़ों रुपये की कथित अवैध प्लाटिंग करने वालों पर कार्रवाई फाइलों तक सीमित रह जाती है।
हाल ही में मुख्य मार्ग से अतिक्रमण हटाने को लेकर प्रशासनिक माहौल बनाया गया था। कार्रवाई की आशंका से कई छोटे दुकानदारों ने अपना सामान तक समेट लिया। मौके पर पालिका कर्मचारी और पुलिस बल घंटों मौजूद रहे, लेकिन नगर पालिका और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे। अंततः केवल दो ठेले जब्त कर औपचारिक कार्रवाई पूरी कर दी गई।
सूत्रों के अनुसार “मेंटेनेंस खसरा” के नाम पर शहर की अन्य जमीनों में भी इसी तरह कब्जे और प्लाटिंग का खेल लंबे समय से चल रहा है। अटल परिसर और कोर्ट परिसर के आसपास की जमीनों को लेकर भी पहले विवाद सामने आ चुके हैं।
मामले में उप पंजीयक कार्यालय की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि नगर तथा ग्राम निवेश विभाग की अनुमति के बिना रजिस्ट्रियां की गईं, जबकि राजस्व विभाग, एसडीएम कार्यालय और नगर निवेश विभाग अपनी जांच में संबंधित प्लाटिंग को अवैध बता चुके हैं।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय एसआईटी जांच कराने की मांग उठाई है। साथ ही सभी 22 रजिस्ट्रियों को निरस्त करने, संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने और कथित भू-माफियाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की जा रही है।
नगर पालिका परिषद के सीएमओ पुनीत राम वर्मा ने कहा कि उन्होंने दो महीने पहले ही पदभार ग्रहण किया है और पूरी फाइल का परीक्षण करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट कर पाएंगे। वहीं नजूल अधिकारी रेणुका रात्रे ने बताया कि अवैध प्लाटिंग की पुष्टि होने के बाद नगर पालिका को नियमानुसार कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया था, लेकिन अब तक वहां से कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन की कार्रवाई केवल कमजोर और छोटे कारोबारियों तक सीमित रहेगी, या फिर सरकारी जमीन पर हुए कथित अवैध कब्जों और प्लाटिंग पर भी वैसी ही सख्ती दिखाई जाएगी।