रायपुर

जहां छुट्टी, वहां ‘मां की कक्षा’, छत्तीसगढ़ के 7 ऐसे शिक्षकों की कहानी जिन्होंने पेश की अनोखी मिसाल

Teachers day 2026: शिक्षा के प्रति जान की परवाह नहीं करना, बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना, शारीरिक अक्षमताओं को मात देकर भी शिक्षा के प्रति अपने कर्तव्य को निष्ठा के साथ निभाने वाले ऐसे 7 शिक्षकों की प्रेरक कहानी आपके सामने है। आइए जानते हैं..
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Sep 05, 2026
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शिक्षक रश्मि गुप्ता, बच्चों के साथ ( Photo - Patrika )

Chhattisgarh News: शिक्षक दिवस पर प्रदेश के दुर्गम, संवेदनशीन और वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाने वाले उन शिक्षकों प्रेरक कहानियां जो हालातों से कभी नहीं हारे। सुदूर जंगलों, उफनती नदियों और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं है। पत्रिका आपके उन सक्षम शिक्षक नायकों के हौसलों को सलाम करते हुए प्रस्तुत कर रहा है। ( Teachers day ) ​जिन्होंने भौगोलिक विषमताओं, समाजिक रूढ़ियों और शारीरिक अक्षमताओं को मात देकर उज्जवल भविष्य की नींव रखी है। आइए जानते है ऐसे 7 शिक्षक नायकों की प्रेरक कहानी, जिन्होंने अपने हौसलों से मिसाल पेश की है..

Teachers day 2026: जहां छुट्टी, वहां रश्मि की 'मां की कक्षा'

बिलासपुर के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय लिंगियाडीह की हिंदी व्याख्याता रश्मि गुप्ता कमजोर बच्चों की शैक्षणिक नींव मजबूत करने के लिए एक अनोखी मिसाल पेश कर रही हैं। वे हर छुट्टी के दिन अपने घर पर कमजोर विद्यार्थियों के लिए नि:शुल्क कक्षाएं चलाती हैं, जिसे 'मां की कक्षा' नाम दिया गया है। वर्ष 2012 से लगातार जारी इस पहल के जरिए वे बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ महिलाओं को साक्षर कर आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने में जुटी हैं। रश्मि गुप्ता का मानना है कि पढ़ाई में पिछड़ रहे बच्चों को आगे बढ़ाना ही एक शिक्षक का असली दायित्व और सबसे बड़ा सम्मान है।

जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचते सुकमा के शिक्षक

सुकमा. नाड़ीगुफा गांव तक पहुंचने का रास्ता बेहद जोखिमभरा है। शबरी नदी के तेज बहाव और जलकुंभियों के बीच शिक्षक छोटी डोंगी के सहारे स्कूल पहुंचते हैं। कई बार झाड़ियों में फंसकर नाव पलटी और शिक्षकों ने तैरकर अपनी जान बचाई। इसके बावजूद उनका हौसला डिगा नहीं। करीब दो दशक बाद गांव में स्कूल खुला, तो शिक्षकों ने संकल्प लिया कि नदी का खतरा बच्चों के भविष्य के आड़े नहीं आएगा। आज भी ये शिक्षक जान जोखिम में डालकर कर्तव्य निभा रहे हैं।

नाव कई बार पलटी, शिक्षक नहीं डिगे (Photo Source- Patrika)

मानू कोर्राम: 17 किमी पैदल सफर और शिक्षा की अलख

अबूझमाड़ के पीडियाकोट आश्रम शाला तक पहुंचने के लिए शिक्षक मानू कोर्राम वर्ष 2009 से निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। वे पहले इंद्रावती नदी को नाव से पार करते हैं, फिर जंगलों और पहाड़ियों के बीच 17 किमी पैदल सफर तय करते हैं। बारिश में नदी का जलस्तर बढ़ने पर उन्हें रास्ते में ही रात गुजारनी पड़ती है। जर्जर भवन और सीमित संसाधनों के बावजूद वे कभी नक्सलवाद के साये में रहे इस क्षेत्र में बच्चों की तकदीर बदल रहे हैं।

जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचते सुकमा के शिक्षक

के. शारदा: व्हीलचेयर से एआई और एआर की उड़ान

भिलाई के खेदामारा शासकीय स्कूल की गणित शिक्षिका के. शारदा ने शारीरिक दिव्यांगता को कभी अपनी राह में रोड़ा नहीं बनने दिया। राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से सम्मानित शारदा ने कोरोनाकाल में गणित के 270 वीडियो बनाए, जिनमें से 200 वीडियो शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर हैं। इसके बाद उन्होंने एआई, ऑगमेंटेड रियलिटी, कार्टून और पॉडकास्ट के जरिए 2000 से ज्यादा ई-कंटेंट तैयार किए। उनकी लिखी 20 शैक्षणिक किताबों में दिए क्यूआर कोड से छात्र अतिरिक्त वीडियो देख सकते हैं।

के. शारदा: व्हीलचेयर से एआई और एआर की उड़ान

राजेंद्र ठाकुर: सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ बेटियों को लाए स्कूल

मोहला-मानपुर के जबकसा गांव में पहली पोस्टिंग के दौरान विज्ञान शिक्षक राजेंद्र कुमार ठाकुर ने देखा कि पीरियड्स के दौरान बालिकाएं स्कूल नहीं आती थीं और उन्हें 'कुमरा घर' में रखा जाता था। उन्होंने विरोध के बजाय गांव की नर्स के साथ मिलकर पालकों को वैज्ञानिक प्रक्रिया समझाई और अपने खर्च से सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए। अनुपयोगी वस्तुओं से साइंस मॉडल और स्वनिर्मित माइक्रोस्कोप जैसे प्रयोगों से पढ़ाई को आसान बनाने के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं।

शिक्षक राजेंद्र ठाकुर

संतोष साहू: वनांचल में नवाचार से बदली स्कूल की सूरत

कवर्धा के सोमनापुर नया हाई स्कूल में पदस्थ व्याख्याता संतोष कुमार साहू ने स्थानीय संसाधनों और खेल गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाई को आसान बनाया। उनके प्रयासों से निजी स्कूलों के बच्चे भी यहाँ प्रवेश लेने लगे। बोर्ड परीक्षा में शत-प्रतिशत परिणाम के साथ यहाँ के विद्यार्थियों ने राज्य की मेरिट सूची में स्थान बनाकर जापान यात्रा का अवसर हासिल किया। जिले के पहले तंबाकू मुक्त स्कूल की पहचान बनाने वाले संतोष साहू को राज्यपाल पुरस्कार से नवाजा गया है।

शिक्षक संतोष साहू
Updated on:
05 Sept 2026 11:09 am
Published on:
05 Sept 2026 11:09 am