
बालोद की ममता (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Teachers' Day 2026: शिक्षक दिवस पर हम हर साल गुरु के सम्मान और उनके योगदान की बात करते हैं। लेकिन बालोद की एक शिक्षिका ने गुरु के सम्मान को अपने काम के जरिए एक अलग ही पहचान दी है। डौंडी ब्लॉक के छोटे से गांव कंजेली के प्राइमरी स्कूल में पदस्थ शिक्षिका ममता सोनेश्वर ने अपनी आवाज को उन हजारों बच्चों की आंखें बना दिया है, जो देख नहीं सकते। उनका यह प्रयास न सिर्फ शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि एक शिक्षक अपनी जिम्मेदारी स्कूल की चारदीवारी से कहीं आगे तक निभा सकता है।
ममता सोनेश्वर के इसी समर्पण और तपस्या का हिस्सा बनी छत्तीसगढ़ के शिक्षकों की एक टीम, जिसने मिलकर 11 हजार ऑडियो बुक तैयार कर गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया है। इन ऑडियो बुक के जरिए दृष्टिबाधित विद्यार्थियों तक पढ़ाई की सामग्री उनकी आवाज के माध्यम से पहुंचाई जा रही है।
ममता सोनेश्वर रोज की तरह कंजेली के प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं। उनके लिए शिक्षक की जिम्मेदारी सिर्फ कक्षा में बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं है। स्कूल की घंटी बजने के बाद उनकी दूसरी ड्यूटी शुरू होती है। वे माइक के सामने बैठती हैं और किताबों के पन्नों को अपनी आवाज में रिकॉर्ड करने लगती हैं।
कभी कक्षा 9वीं के संस्कृत के श्लोक, तो कभी 12वीं के इतिहास के पाठ। घंटों तक लगातार रिकॉर्डिंग करने के दौरान वे हर शब्द को साफ और सही तरीके से बोलने की कोशिश करती हैं, ताकि सुनने वाले बच्चों को पाठ समझने में किसी तरह की परेशानी न हो। इस साल उन्हें वर्ल्ड ऑडियो बुक बाई के. शारदा' टीम से जुड़कर इस अभियान में योगदान देने का मौका मिला। टीम से जुड़ने के बाद ममता ने शुरुआत से ही पूरी जिम्मेदारी के साथ काम किया और 200 से अधिक पाठों को ऑडियो में बदल दिया।
ऑडियो बुक तैयार करना उनके लिए सिर्फ एक काम नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। स्कूल की ड्यूटी पूरी करने के बाद वे रिकॉर्डिंग में जुट जाती थीं। कई बार रात-रात भर जागकर अपनी आवाज को बार-बार रिकॉर्ड किया और जहां जरूरत महसूस हुई, वहां उसे दोबारा सुधारा।
उनका प्रयास था कि किताबों के पाठ सिर्फ रिकॉर्ड होकर ऑडियो न बन जाएं, बल्कि सुनने वाले बच्चे को ऐसा महसूस हो कि कोई शिक्षक उसके सामने बैठकर उसे प्यार से पढ़ा रहा है। इसी सोच के साथ उन्होंने संस्कृत के श्लोक और इतिहास के पाठों को अपनी आवाज में रिकॉर्ड किया। ममता के लिए यह काम इसलिए भी खास था, क्योंकि उनकी आवाज उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का माध्यम बन रही थी, जिनके लिए किताब के पन्नों को देख पाना संभव नहीं है। ऐसे में उनकी आवाज ही उन बच्चों के लिए पढ़ाई का सहारा बन गई।
अपने इस प्रयास को लेकर ममता सोनेश्वर कहती हैं, "मैंने सोचा कि मेरी आवाज अगर किसी बच्चे की आँख बन सकती है, तो इससे बड़ा शिक्षक दिवस का तोहफा क्या हो सकता है।"
ममता की यही सोच उनके काम को खास बनाती है। एक छोटे से गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षिका आज अपनी आवाज के जरिए उन विद्यार्थियों तक पहुंच रही हैं, जो देखने में सक्षम नहीं हैं। उनके द्वारा तैयार किए गए ऑडियो पाठ शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास हैं।
शिक्षक दिवस पर जहां गुरु के सम्मान में तरह-तरह के आयोजन होते हैं, वहीं ममता सोनेश्वर ने अपने काम से यह साबित किया है कि शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान तब है, जब उसकी शिक्षा किसी जरूरतमंद विद्यार्थी के काम आए। उनकी आवाज से तैयार ये ऑडियो बुक न सिर्फ हजारों दृष्टिबाधित बच्चों के लिए पढ़ाई का माध्यम बन रही हैं, बल्कि शिक्षक के समर्पण और संवेदनशीलता की भी मिसाल पेश कर रही हैं।
Updated on:
04 Sept 2026 08:48 pm
Published on:
04 Sept 2026 08:48 pm
