रायपुर

Medical College: जूनियर डॉक्टर खुद चुकाएं सीनियर्स का नाश्ता, मेडिकल कॉलेजों में टॉक्सिक कल्चर का भंडाफोड़, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

Medical College: प्रदेश के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में जूनियर डॉक्टरों (पीजी छात्र) पर चल रहा टॉक्सिक माहौल चौंकाने वाला है। नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर, रिम्स, सिम्स जैसी संस्थाओं में जूनियर डॉक्टर न सिर्फ अपनी जेब से सीनियर्स के लिए नाश्ता-चाय का बिल भरते हैं, बल्कि उन्हें मानसिक और शारीरिक दबाव का सामना भी करना पड़ता है।

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Apr 02, 2026
सीनियर्स के लिए नाश्ता अपनी जेब से! (फोटो सोर्स- photo- AI)

रायपुर @पीलूराम साहू। Medical College: प्रदेश के सरकारी ही नहीं निजी मेडिकल कॉलेजों में टॉक्सिक कल्चर चौंकाने वाला है। प्रदेश के सबसे बड़े व पुराने नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर में जूनियर डॉक्टर (पीजी छात्र) सीनियर्स को रोज चाय-नाश्ता कराते हैं। वे बाकायदा बिल का भुगतान भी करते हैं। यही नहीं जूनियर डॉक्टरों ने सीनियर्स व फैकल्टी द्वारा इंसान नहीं समझने तक की शिकायत की है।

ये खुलासा केंद्र की ऑनलाइन रिपोर्ट में हुई है। इसमें न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देश के अन्य राज्यों के मेडिकल कॉलेजों की भी रिपोर्ट है। ये रिपोर्ट पिछले साल की है, जिसमें देशभर के 261 कॉलेज शामिल हैं।

सीनियर को नाश्ता कराकर अपनी जेब से बिल भरते हैं जूनियर डॉक्टर

पत्रिका के पास देशभर के कॉलेजों की रिपोर्ट है। इसमें हम प्रदेश के विभिन्न कॉलेजों की रिपोर्ट पेश कर रहे हैं। नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर के ऑर्थोपीडिक विभाग के फस्र्ट ईयर के पीजी छात्रों ने रोजाना सीनियर के लिए चाय-नाश्ता लाने व बिल भुगतान की बात कही है। एनेस्थीसिया विभाग के बारे में गंभीर शिकायतें की गई हैं। इसमें फैकल्टी की यह मानसिकता है कि छात्र इंसान नहीं हैं। जैसे छात्र अपने कंसल्टेंट डॉक्टरों की केवल इच्छा पूरा करने के लिए हैं। वे मुश्किल से पढ़ाते हैं।

अगर कोई गलती होती है तो समस्या सुलझाने के बजाय वे दोषारोपण शुरू कर देते हैं। जनरल सर्जरी, पीडियाट्रिक, पीएसएम, रेडियोथैरेपी व जनरल मेडिसिन विभाग में छात्रों को मानसिक यातना से गुजरनी पड़ती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि छात्र पूरे तीन साल तक मानसिक तनाव में रहते हैं । यदि किसी रेजिडेंट से कोई गलती हो जाती है, तो विभाग में उसे सुधारने या सिखाने के बजाय ब्लेम गेम (दोषारोपण) शुरू हो जाता है ।

सिम्स बिलासपुर में भी हालात ठीक नहीं

बिलासपुर के छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (सिम्स) से भी गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। यहां के मेडिसिन विभाग के एचओडी पर पिछले दिनों उत्पीडऩ का मामला सामने आया है। वहीं ऑप्थल्मोलॉजी (नेत्र रोग) विभाग में कंसल्टेंट््स के व्यवहार को बेहद टॉक्सिक बताया गया है । हालांकि पीडियाट्रिक्स विभाग में टॉक्सिसिटी कम है, लेकिन वर्कलोड इतना अधिक है कि छात्रों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता।

रिम्स: करता है कॉलेज छोड़ने का मन

मंदिरहसौद स्थित रिम्स निजी मेडिकल कॉलेज के फस्र्ट ईयर के छात्र ने कहा कि सीनियर बहुत टॉक्सिक है, यहां तक कि कॉलेज भी। हर चीज में फाइन और स्टाइपेंड में कटौती। इससे केवल आधा स्टाइपेंड ही मिलता है। सारे काम जूनियर से करवाते हैं। वीकली ऑफ भी नहीं मिलता। न रात में सोने को मिलता है। हॉस्टल में रहना अनिवार्य कर दिया है और कभी रात में कॉल कर बुला लेते हैं।

कहीं भी जाना है, सीनियर से परमिशन लेकर जाना है। मानसिक रूप से परेशान किया जाता है। कॉलेज छोडऩे का मन करता है। ड्यूटी ऑवर 16 से 18 घंटे है। कोई भी चीज यहां सिस्टमेटिक ढंग से नहीं है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक व तमिलनाडु जैसे राज्यों में ज्यादा शिकायतें

रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश व तमिलनाडु जैसे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों से सबसे अधिक संख्या में और सबसे गंभीर किस्म की शिकायतें सामने आई हैं। पुणे के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में गैर-मराठी और उत्तर भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव के गंभीर आरोप हैं। सामान्य श्रेणी के ऑल इंडिया कोटे से आए छात्रों को 30-30 घंटे तक लगातार काम कराया जाता है।

छात्र शिकायत करे तो की जा सकती है कार्रवाई

डॉ. गंभीर सिंह, डीन, रिम्स के मुताबिक, पीजी छात्रों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। इमरजेंसी केस आने पर ड्यूटी में कभी भी बुलाया जा सकता है। छात्र शिकायत करे तो कार्रवाई की जा सकती है। छात्र सामने नहीं आना चाहता तो इसमें क्या किया जा सकता है? ड्यूटी नहीं करने पर स्टाइपेंड तो कटेगा। पिछले साल रैगिंग संबंधी गुमनाम पत्र भी आया था, जो गलत निकला।

डॉ. विष्णु दत्त, रिटायर्ड, डीएमई, छग में कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि पीजी फस्र्ट ईयर के छात्रों को काफी मेहनत की जरूरत होती है। चूंकि वे रेसीडेंट डॉक्टर होते हैं इसलिए इमरजेंसी में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सभी विभागों का माहौल खराब होता है, ऐसा भी नहीं है। ड्यूटी के घंटे तो फिक्स होते हैं, लेकिन इमरजेंसी कभी भी आ सकती है। इसलिए रेसीडेंट डॉक्टरों को हर समय ड्यूटी के लिए तैयार रहने की जरूरत होती है। पढ़ाई का माहौल होना ही चाहिए।

Published on:
02 Apr 2026 08:12 pm
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