थानखम्हरिया में कविता पाठ करने आए थे शशिकांत यादव
हम बड़े संकटों से स्थापित हुए हैं। किसी स्टार के घर तो पैदा नहीं हुए। मिल मजदूर के घर पैदा होकर कोई व्यक्ति उस शिखर तक पहुंचता है जो उसकी कल्पना के भी बाहर था। उसके मन में डर बना रहता है। बना भी रहना चाहिए। वही उस व्यक्ति को स्थापित रखता है। मैंने मंच की पवित्रता और मंच पर शुद्धता के लिए पूरा जीवन लगा दिया। उसी का परिणाम है कि मेरे पास सिद्धि, प्रसिद्धि और समृद्धि तीनों है। लोग सोच नहीं सकते जितना पैसा मुझे कविता ने दिया है। इसलिए मैं कविता पाठ से पहले ब्रश करता हूं। यह कहा जाने-माने कवि शशिकांत यादव ने। वे थानखम्हरिया में आयोजित कवि सम्मेलन में आए थे। स्टेशन रोड स्थित होटल में पत्रिका से विशेष साक्षात्कार में साहित्यिक जीवन पर चर्चा की। इस दौरान एक सवाल के जवाब में ऊपर लिखी बातें कहीं।
पहली कविता कब लिखी?
बचपन से इंदिराजी और अटलजी के प्रति अलग तरह का लगाव था। अटलजी का चित्र घर पर ही लगा रहता था क्योंकि मैं संघ परिवार से हूं। इंदिराजी में मुझे शक्ति का स्वरूप दिखाई देता था। जब उनकी हत्या हुई तब मैं मात्र 12 साल का था। मेरा मन बहुत आंदोलित हुआ। जिस सरकारी में मैं पढ़ता था वहां बाल सभाएं होती थीं। मैंने उन पर कविता पढ़ी। वहीं से कविता का सफर शुरू हुआ। मां के साथ कवि सम्मेलन में कविताएं सुनने जाता था, उन्हीं दिनों कविता से प्रेम भी हो गया था।
काव्य पाठ से पहली कमाई कितनी थी ?
हम पगडंडियों से निकलकर हाईवे, और हाईवे से रव-वे तक पहुंचे हुए लोग हैं। 15 साल तो हमको एसी के डिब्बे में बैठने में लग गए थे। पहली बार जब हवाई जहाज में बैठा था तो मुंबई में आयोजित चकल्लस के संचालन का मौका मिला था। उसमें मेरा पेमेंट 3 हजार लेकिन प्लेन का एक साइड का किराया साढ़े चार हजार रुपए था। इस कार्यक्रम के चलते मुझे लाल किलेे में संचालन का मौका मिला था। उस समय डेढ़ हजार भले मेरी जेब से गए लेकिन वहीं से उपलब्धियों का रास्ता खुल गया। हालांकि कविता से मुझे पहली बार 50 रुपए मिले थे। आजकल तो एक कवि सोशल मीडिया में कविता डालता है और दूसरे दिन महाकवि हो जाता है। हमारे टाइम में सोशल मीडिया तो था नहीं, माउथ पब्लिसिटी से ही हमें आमंत्रण मिला करते थे।
कविता पाठ में कॅरियर बनाने के लिए सबसे जरूरी बात क्या है?
हमारा ग्लैमर देखकर नए लोग कवि सम्मेलनों की दुनिया में आना चाहते हैं। आज आप जितने भी दिग्गज कवियों को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि ये पहले दिन से ही धनाड्य हैं। आज मुझे 35 साल हो गए। हमने पगडंडियों से सफर नापा है। हमारे उस्ताद गिरवरसिंह भंवर कहते थे कि कवि और कलाकार के पास दाल-रोटी का इंतजाम होना चाहिए। तो उसको कविता घी रोटी देती है। लेकिन अगर आपके पास दाल-रोटी नहीं है तो आपको निराला होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए जरूरी है कि कविता में कॅरियर बनाने से पहले कोई वैकल्पिक दाल-रोटी का इंतजाम हो।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को किस नजरिए से देखते हैं?
देखिए, हमारी 75 साल की यात्रा है और हम सतत् सुधार की ओर अग्रसर हैं। प्रगति की ओर अग्रसर हैं। ऐसा नहीं है कि पिछली सरकारों ने कुछ न किया और इस सरकार ने सब कुछ कर दिया। कवि कभी संतुष्ट होता नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। हम जिस मानवीय सभ्यता के चौकीदार के रूप में काम करते हैं उसमें सुधार की प्रबल संभानाएं हैं। निश्चित रूप से आज कुछ कष्ट कम हुए हैं लेकिन बहुत कुछ करना बाकी है।
आपको सरकारी अवॉर्ड की अभिलाषा है?
जिस दिन सरकारी सम्मान मिल जाएंगे लेखनी अपने आप कुंद हो जाएगी। सरकारी सम्मान की अपेक्षा कवि या कलाकार को कभी नहीं करनी चाहिए। अगर कवि या कलाकार को आवेदन देकर सम्मान की गुहार लगानी पड़े तो कवि उसी दिन मर जाता है। सरकार ढूंढे हमारे काम को। मूल्यांकन करे और हमने किसी क्षेत्र में काम किया है तो सम्मानित करे। मैं कभी भी किसी सरकारी सम्मान के लिए आवेदन नहीं करूंगा।