
ताबीर हुसैन@रायपुर. माउंट एवरेस्ट समेत 20 पहाड़ों पर चढ़ाई कर चुकी रेवाणी (हरियाणा) की बेटी सुनीता चौकन भिलाई होते हुए राजधानी पहुंचीं। उन्हें वर्ष 2016 का नारी शक्ति अवॉर्ड राष्ट्रपति के हाथों मिला है। वे हरियाणा में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की ब्रांड अंबेसडर हैं। इन दिनों साइक्लिंग करते हुए प्लांटेशन का मैसेज लेकर लोगों को अवेयर कर रही हैं। इसी सिलसिले में वे रायपुर आईं। उन्होंने पर्वतारोहण, प्लांटेशन और साइक्लिंग से जुड़ी तमाम बातें सविस्तार ‘पत्रिका प्लस’ से साझा की।
जो भी आपका ड्रीम है उसे आप अचीव कर सकते हैं। इसके लिए दो चीज करनी होगी। पहली यह कि गिवअप नहीं करना है, दूसरा आपको कंटीन्यू एफर्ड लगाना है। जब तक आपका ड्रीम पूरा नहीं होता आप कोशिश करते रहें। उसके बाद ही सेकंड ऑप्शन रखें। प्लान बी लेकर नहीं चलें। सिर्फ ए ही लेकर चलें।
पापा बीएसएफ में थे। उनकी पोस्टिंग कश्मीर में थी। उन्हें पता था कि पर्वतारोहण में किस तरह की डिफिकल्टीज आती है। कश्मीर में दिक्कत आती है और ये तो टॉप ऑफ द वल्र्ड की बात कर रही है। दूसरी वजह ये भी हो सकती थी कि मैं उनकी डॉटर हंू। कल को शादी करनी है तो कोई ऊंच-नीच हो गई तो कैसे करेंगे। मम्मा ने साथ दिया। 2001 से लेकर 2011 तक मैं पैरेंट्स को सिर्फ कन्वेंस करती रही। २०११ में मुझे परमिशन मिली। दादी अरावली माउंटेन के बीच में रहा करती थी। जब मैं वहां जाती थी तो पहाड़ पर चढऩा ही पड़ता था। मेरी दादी ने ही इंस्प्रेशन दिया।
पिछले साल मैंने दो माउंटेन प्लान किए थे। वे अननोन थे। उन्हें मैंने मां और बेटी नाम दिया था। ये गंगोत्री ग्लेशियर में है। यहां मुझे डिजास्टर चेंज नजर आया। तब मुझे लगा कि माउंटेन व नेचर लवर मेरी भी जिम्मेदारी बनती प्रकृति के प्रति, इसलिए मैंने प्लांटेशन की सोची। यह मेरी दूसरी साइकिलिंग है। पिछली बार एक एनजीओ की पहल पर कन्या कुमारी से खारदुंभ किया था। उस वक्त मैं लोगों के घरों में , माउंटेनर या साइकिलिस्ट के यहां रुका करती थी, क्योंकि होटल में रहकर प्लांटेशन संभव नहीं था। इस बार मैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और पौधरोपण का संदेश लेकर सोमनाथ वाया सिक्किम नेपाल तक जा रही हूं। इसे रोटरी क्लब रेवाडी डिस्ट्रिक्ट 301 ने स्पांसर किया। उन्हीं के खर्चे से में यह यात्रा पूरी कर रही हूं। जहां भी प्लांट लगा रही हूं उसके देखरेख की जिम्मेदारी भी रोटरी क्लब ले रहा है।
एवरेस्ट क्लाइंब कर उतर रही थी तो मेरा एक शूज के नीचे केन्पेल निकल गया था। तब मैंने सुसाइड जंप मारा था। शू के नीचे स्पाइक लगे होते हैं ताकि ग्रिप बनी रहे। उस वक्त मैं बहुत थकी हुई थी। एक पैर से चढऩा तो मुझे आता था लेकिन पिछले तीन महीने से मैं चल रही थी। मैंने जंप मारा। लकीली मैं बच गई। इसके बाद खुद को हिडन खाई मैं बैठा पाया। बहुत छोटी सी खाई थी। मैंने उसमें हाथ रखे और लटक गई। तब मुझे लगा कि १० मिनट पहले भगवान ने बचाया है, अब मुझे बचने के लिए स्ट्रगल करना होगा। क्योंकि भगवान चाहते हैं कि मैं बचूं और यह बात पैरेंट्स को भी बताऊं।