
PM Narendra Modi Birthday: 17 सितंबर का दिन देश के करोड़ों नागरिकों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह उस व्यक्तित्व का जन्मदिवस है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्रसेवा के संकल्प को लेकर जिया और आज प्रधानमंत्री के रूप में भारत को नई दिशा प्रदान कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सार्वजनिक जीवन जितना व्यापक है, उतना ही आत्मीय उनका छत्तीसगढ़ से जुड़ाव भी रहा है।
मुझ जैसे छत्तीसगढ़वासियों के लिए नरेंद्र मोदी एक राजनेता से भी आगे हमारे परिवार के मुखिया जैसे हैं। छत्तीसगढ़ की धरती और लोगों से उनकी आत्मीयता को मैंने कई वर्षों तक करीब से देखा और महसूस किया है। मैंने हमेशा उनके भीतर एक ऐसे कार्यकर्ता को देखा है, जिसके लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण संगठन है, राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र है और व्यक्तिगत सफलता से कहीं बड़ा लक्ष्य लोक सेवा है।
आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिवस पर छत्तीसगढ़ समेत पूरा देश उत्साहित है, तब प्रधानमंत्री और छत्तीसगढ़ से जुड़े संस्मरण स्मृति में आ रहे हैं। मुझे आज भी वह दिन याद है, जब 2003 में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनी और मेरे मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी पधारे थे। जैसा सामान्यतः होता है, वैसे ही उनकी गरिमा के अनुरूप मंच पर व्यवस्थाएं निर्धारित थीं, लेकिन मोदी ने आसन के सम्मान को छोड़कर न केवल कार्यकर्ताओं के बीच व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाली, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।
वह दृश्य कितना अद्भुत था कि शासकीय कार्यक्रम में दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री, जो हमारे अतिथि थे, उन्होंने अपनी जड़ों से जुड़कर कार्यकर्ताओं के बीच जगह चुनी। मेहमान के रूप में आकर मेजबान बन जाना यह सिर्फ तभी संभव हो सकता है, जब वह मेहमान नरेंद्र भाई मोदी जैसा हो। यह जुड़ाव यहीं तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2007 में जब हमारी सरकार ने 3 रुपए किलो (बाद में 1 रुपए किलो) चावल योजना का शुभारंभ किया, तब भी मोदी वहां उपस्थित थे। उन्होंने बड़े विश्वास से कहा था, “डॉक्टर साहब, यह योजना छत्तीसगढ़ को बदल कर रख देगी, इससे अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने में आपको बड़ी भूमिका निभानी है।” उनके ये शब्द मेरे लिए प्रोत्साहित करने वाले थे और आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि हमने मोदी की उस बात को प्रदेश में साकार करके दिखाया है।
आज यह देश मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में जानता है। सभी को यह जानकारी है कि प्रधानमंत्री पद का दायित्व ग्रहण करने के बाद उन्होंने अब तक 13 बार दिल्ली के लाल किले से संबोधन किया है, लेकिन हम छत्तीसगढ़वासियों की कहानी थोड़ी अलग है। हमने मोदी को 14 बार लाल किले से सुना है, क्योंकि 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान अंबिकापुर में मोदी का एक कार्यक्रम निश्चित था। तब हमें यह विश्वास था कि मोदी जल्द ही दिल्ली के लाल किले पर झंडा फहराने वाले हैं, इसलिए हमने पहले ही अंबिकापुर में लाल किले का एक प्रारूप बनवाया था और वह पहला लाल किला था, जहां उन्होंने भाषण दिया। उस प्रारूप से दिए गए भाषण ने पूरे देश को यह विश्वास दिलाया कि लाल किले पर उन्हें किस प्रकार का प्रधानमंत्री चाहिए।
राजनीतिक मंचों से परे, मोदी के व्यक्तित्व का एक और पहलू है, जो मुझे सदैव प्रभावित करता रहा है। वह है बच्चों और विशेषकर दिव्यांग बच्चों के प्रति उनकी सहजता। वर्ष 2015 में दंतेवाड़ा में जावांगा एजुकेशन सिटी में मोदी का आगमन हुआ। बतौर मुख्यमंत्री मैं उनके साथ गया और इस कार्यक्रम में शामिल हुआ। मैं उस दृश्य का साक्षी हूं, जब प्रधानमंत्री मोदी बच्चों के बीच ऐसे घुल-मिल गए कि कब डेढ़ घंटे का समय बीत गया, हमें पता ही नहीं चला। मेरे लिए वह दृश्य बेहद भावुक करने वाला था, जब मोदी बच्चों की कुर्सी पर बैठे और स्कूल की टेबल को तबले की तरह बजाने लगे। वह मुलाकात वहां मौजूद हर व्यक्ति के लिए जीवन भर की स्मृति बन गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेषता है कि जब वह बच्चों के बीच मौजूद होते हैं, तब उनके व्यवहार में ढलकर उन्हें प्रेरित करते हैं और जब कभी कोई विरला व्यक्तित्व उनके समक्ष हो, तब कल्पना से परे मोदी विनम्रता की मिसाल कायम कर जाते हैं। वर्ष 2016 में डोंगरगढ़ की एक जनसभा में जब धमतरी की कुंवरबाई मंच पर आईं, जिन्होंने अपनी बकरियां बेचकर घर में शौचालय बनवाया था, तो मोदी ने न सिर्फ 104 वर्ष की इस वयोवृद्ध महिला का सम्मान किया, बल्कि झुककर उनके चरण भी छुए।
मुझे आज भी उनके वे शब्द याद हैं। मोदी ने कहा था, “आज मुझे यहां 104 वर्ष की मां कुंवरबाई का आशीर्वाद पाने का सौभाग्य मिला। जो लोग अपने आप को नौजवान मानते हैं, वे तय करें कि उनकी सोच भी जवान है क्या? 104 वर्ष की मां कुंवरबाई न टीवी देखती हैं और न ही पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन उन्हें पता चला कि देश के प्रधानमंत्री लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के लिए कहते हैं, तो उन्होंने बकरी पालन की राशि से अपने घर में शौचालय बनवाया और गांव वालों को भी प्रेरित किया।”
ऐसे ही जांगला, बीजापुर के एक कार्यक्रम में हमें चरण-पादुकाएं वितरित करनी थीं। मंच पर ग्रामीण महिलाएं आईं तो सारी सभा उस वक्त आश्चर्यचकित रह गई, जब एक आदिवासी महिला को मोदी ने अपने हाथों से चरण-पादुका पहनाकर उनका सम्मान किया था। यह सरलता और विनम्रता तभी संभव है, जब कोई व्यक्ति केवल पद से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व से भी ऊंचा हो और मैंने अनेक अवसरों पर मोदी के साथ यह अनुभव किया है।
जिस बस्तर में मोदी ने सभाएं कीं, वहां दशकों से एक समस्या अपनी जड़ें फैला रही थी। हर आदिवासी उस समस्या से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित था और वह समस्या थी “नक्सलवाद”, जिसने बस्तर को मुख्यधारा से दूर रखा था। लेकिन जिस समस्या की चर्चा से सब कतराते थे, मोदी ने उस समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने का निश्चय किया। आज बस्तर समेत पूरा देश यदि नक्सलवाद के दंश से मुक्त हुआ है, तो यह मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति, अडिग निर्णय और राष्ट्र के प्रति सतत समर्पण का परिणाम है।
आज जब ऐसे विरले व्यक्तित्व और मां भारती के सपूत नरेंद्र भाई मोदी का जन्मदिन है, तब छत्तीसगढ़ के जन-जन और अपने मन के कण-कण से मैं उनके लिए मंगलकामनाएं करता हूं। मैं माता बम्लेश्वरी से यह प्रार्थना करता हूं कि भारत के सपूत नरेंद्र मोदी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरंतर ऊर्जा प्रदान करें और वो सतत मां भारती की सेवा में तत्पर रहें।