धान का कटोरा कहे जाने वाला छत्तीसगढ़ अब अन्नदाताओं की 'कब्रगाह' बन रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ का यह भयावह सच सामने आया है। इसका स्थान देश में महाराष्ट्र, तेलंगाना और मध्यप्रदेश के बाद चौथे पायदान पर है, जहां वर्ष 2014 में कर्ज, फसल की तबाही एवं पारिवारिक कारणों से 443 किसानों ने अपनी जान गंवा दी।
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में किसानों की कुल 5650 आत्महत्याओं में से 89.5 प्रतिशत मौत इन चार राज्यों में हुई। गंभीर तथ्य यह है कि छत्तीसगढ़ से इन तीनों राज्यों की सीमा जुड़ती है, जिसे कृषि विशेषज्ञ 'किसानों की बदहाली का जोन' संज्ञा दे रहे हैं। हालांकि एनसीआरबी ने किसानों की मौत को लेकर जो अनुसंधान पद्धति अपनाई उसके मुताबिक पिछले वर्ष की तुलना में किसानों की 50 प्रतिशत कम मौतें हुई हैं।
महिला किसान भी लगा रहीं मौत को गले
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार खेती की बदहाल स्थिति को देखकर प्रदेश में महिला किसानों की भी कमर टूट रही है। महिला किसानों की आत्महत्या में भी यह टॉप चार राज्यों में है। देश में किसान परिवार की कुल 472 महिलाओं ने आत्महत्या की है। इनमें से आत्महत्या करने वाली 52 महिला किसान छत्तीसगढ़ की हैं, जो 11 प्रतिशत है। तेलंगाना में सर्वाधिक 147, मध्यप्रदेश में 138 और महाराष्ट्र 70 महिला किसानों ने आत्महत्या की।
इन कारणों से कर रहे खुदकुशी
कि सानों की आत्महत्या में छोटे राज्य छत्तीसगढ़ की भयावह स्थिति ने सभी को चौंकाया है। पहले कर्नाटक चौथे नम्बर पर था, लेकिन आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ों के चलते छत्तीसगढ़ शीर्ष चार राज्यों में शुमार हो गया। रिपोर्ट में प्रदेश के 65 किसानों की आत्महत्या का कारण कोई भी दर्शाया नहीं है।
हालांकि, प्रदेश में कर्ज के कारण एक भी आत्महत्या नहीं दर्शाई गई है, लेकिन कृषि जानकारों का मानना है कि यहां सरकारी एजेंसियों के बजाय सूदखोरी पर ब्याज लेने की प्रचलन है, जो इन आत्महत्याओं की मुख्य वजह हो सकती है। बीमारी से 12 महिलाओं सहित 110 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि पारिवारिक समस्या के चलते 59 किसानों ने जान दे दी। इतना ही नहीं, 14 किसानों ने फसल नहीं बिकने पर, 4 किसानों ने फसल बर्बादी और दो किसानों ने प्राकृतिक आपदा से फसल खराबा पर आत्महत्या कर ली। प्रदेश में 28 किसानों की आत्महत्या की वजह नशे की आदत रही।