भीषण गर्मी और भूख-प्यास ने गजराज को नाराज कर दिया है। सिर्फ अप्रैल-मई में वन्यजीवों के हमले में 15 निर्दोष ग्रामीणों की जान जा चुकी है। कहीं हाथी आतंक मचाए हैं तो कहीं भालू और तेंदुए। इनके हमलों में दर्जनों की संख्या में पालतू पशु भी मारे गए हैं। भयभीत ग्रामीण अलाव जलाकर रतजगा कर रहे हैं। कई जगहों पर गुस्साए ग्रामीणों ने जानवरों को जहर देकर मारने की भी कोशिश की है।
दूसरी तरफ वन विभाग जानवरों के नियंत्रण के लिए बनाई गई अपनी दो योजनाओं को मूर्तरूप देने के लिए शासन की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। सरगुजा से लेकर बिलासपुर वन वृत्त के दर्जनों गांवों में ग्रामीणों और महुआ बीनती महिलाओं पर हाथियों का कहर मौत बनकर टूट रहा है। सिर्फ अप्रैल और मई माह में ही बिलासपुर व अंबिकापुर संभाग में वन्य जीवों के हमले में 15 ग्रामीणों की जान गई है। हाथियों ने लाखों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है। वन्य जीवों के हमले की वजह से ग्रामीणों की नींद उड़ गई है। वे रात-रात भर आग जलाकर हाथी, भालू व तेदुए से सुरक्षा कर रहे हैं। दिन में भी ग्रामीणों के बच्चे घर के बाहर नहीं खेल पा रहे हैं।
2700 से ज्यादा हमले : बीते दो वर्ष में वन्य प्राणियों के हमले के २७०० से ज्यादा प्रकरण दर्ज हुए हैं। 60लाख रुपए का मुआवजा दिया गया है। बावजूद इसके हाथियों को खदेडऩे की कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई जा सकी है।
बिजली चमकी, भालू की हार्टअटैक से मौत- कोरबा : कोरबा वनमंडल के अंतर्गत आने वाले ढेंगूरडीह गांव के जंगल में सोमवार को एक मरा हुआ भालू मिला। प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक आकाशीय बिजली की चमक से भालू घबरा गया और उसकी हार्टअटैक से मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। भालू के शरीर पर किसी तरह के कोई चोट के निशान नहीं मिले हैं।
प्रदेश का हर हिस्सा प्रभावित
कोरबा वन वृत्त में पिछले माह में चार मौत। दर्जनभर से ज्यादा घायल। एक ग्रामीण का मकान ढहाया।
अप्रैल से मई के बीच हाथियों के हमले में पांच लोगों को मौत।
मई में भालुओं के हमले में तीन की मौत। आधा दर्जन घायल।
बलरामपुर जिले में भालुओं के हमले से मई में तीन की जान गई। एक घायल।
मरवाही क्षेत्र में हाथी और भालू आए दिन हो रहे हमले। गरियाबंद के मैनपुर में तेंदुए का आतंक। कांकेर में भालुओं से परेशानी।
हाथी और भालुओं को महुआ की गंध गांवों की ओर खींच लाती है, इसीलिए ज्यादातर हमले महुआ बीनते समय हुए हैं।
गर्मी की वजह से जंगल में पानी की भयंकर कमी हो गई है। प्यास से बेहाल वन्यजीव गांवों में घुस रहे हैं और ग्रामीणों पर हमले कर रहे हैं।
वन्यजीवों के रहवास क्षेत्र में अतिक्रमण बढ़ा है। जंगल कट रहे हैं या फिर जंगलों के अंदर मानव गतिविधियां बढ़ी हैं। इससे वे गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।
हाथियों का उत्पात रोकने के लिए एलीफेंट रिजर्व पर फिर से विचार करना होगा। जबकि, पूर्व में हाथियों के माइग्रेशन रूट वाले क्षेत्र को शामिल किया गया था।
भालुओं और हाथियों को नियंत्रित करने के लिए जामवंत योजना और गजराज परियोजना का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। ताकि दोनों वन्य प्राणियों को उनके नैसॢगक वातावरण मिल सके। इस योजना के पूरा होने पर हमले रुकेंगे।