जंगलों से गायब हो रहे कंद-मूल

जैव विविधता के असंतुलन से जंगल में पाए जाने वाले गुणकारी कांदे विलुप्ति की कगार पर हैं।
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Updated: 22 May 2015, 11:14 AM IST
Root vegetable
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रायपुर.
जैव विविधता के असंतुलन से जंगल में पाए जाने वाले गुणकारी कांदे विलुप्ति की कगार पर हैं। प्रदेश के कवर्धा जिले में कांदावानी, पंडरीपानी, कुई, कुकदुर जैसे कई गांव हैं, जहां कांदे की कई प्रजातियां पाई जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे जंगल सिमटता जा रहा है, वैसे-वैसे कांदे की प्रजातियां भी कम होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैव विविधता के संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रभावी वर्किंग प्लान बनाना चाहिए, जिससे कांदे के साथ ही अन्य वनोपज के अस्तित्व को बचाया जा सके।


बढऩे लगी पोषण की समस्या


जंगल में रहने वाले आदिवासियों की आजीविका का मुख्य स्त्रोत वनोपज है। हिन्दी में इसे कंदमूल कहते हैं और आदिवासी इसे कांदा कहते हैं। आदिवासियों को अनाज के अतिरिक्त जंगल से कंदमूल, फल, भाजी के साथ ही लकड़ी की भी पूर्ति होती थी। लेकिन वनों की कटाई के बाद जनजातियों के पोषण में सहायक कई तरह के फल, कंद, मशरूम व भाजियां खत्म हो गई हैं। इससे कुपोषण की समस्या बढऩे लगी है।


कंद की प्रजातियां


जब पूरे इलाके में जंगल हराभरा था, तब इनमें रताल, रविकांदा, कनिहा, डोंगची, कुलु, केंवची, भूत, पांडरी सहित कंद के कई प्रजातियां पाए जाते थे। इनमें से कई कांदे का खाने में तो कइयों का उपयोग दवाइयों के रूप में किया जाता था।


कांदा का पौष्टिक महत्व


राष्ट्रीय पोषण संस्थान के शोध के अनुसार कांदा कार्बोहाइड्रेट, कैरेटीन और विटामिन सी का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। कांदा में काफी मात्रा में कैल्शियम भी पाया जाता है। प्रति 100 ग्राम जंगली कांदे में मोईस्चर 70.4 ग्राम, प्रोटीन 2.5 ग्राम, फैट 0.3 ग्राम, मिनरल 1.4ग्राम, फाईबर 1.0 ग्राम, कार्बोहाईड्रेट 24.4 ग्राम, एनर्जी 110 कैलोरी, कैल्शियम 20 मिग्रा, फॉस्फोरस 74 मिग्रा, आयरन 1.0 मिग्रा, विटामिन सी 1 मिग्रा, कैरेटीन 565 माईक्रो ग्राम, ऑक्सेलिक एसिड 15 मिग्रा और पाईथिन फॉस्फोरस 7 मिग्रा होता है।

(स्रोत-राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद)


वन विभाग को जंगल प्रबंधन को देखते हुए वर्किंग प्लान बनाना चाहिए। सिर्फ राजस्व बढ़ाने की दिशा में पेड़ों को काटने से जैव विविधता बिगड़ रही है। वहीं जंगलों को आग से भी बचाना जरूरी है।

बलवंत राहंगडाले,
समाजसेवी


यदि जंगल में उपलब्ध कांदे की खेती को बढ़ावा दिया जाए तो बैगाओं की प्राकृतिक खाद्य व्यवस्था के साथ वैकल्पिक इलाज की पद्धति भी मजबूत होगी। इससे जैव विविधता का संरक्षण भी होगा।

नरेश विश्वास,
सचिव निर्माण संस्था कवर्धा


-श्वेता शुक्ला


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