रायपुर

मकान बनाना होगा और महंगा? रायपुर में रेत की कीमत और लोडिंग चार्ज पर मनमानी के आरोप

Sand Mining Scam Allegations: रायपुर में आठ प्रमुख रेत घाटों के सीमांकन और खनन के हिसाब को लेकर सवाल उठे हैं। सरकारी दर 5,500 रुपये के मुकाबले 10 हजार रुपये तक रेत बेचने और लोडिंग शुल्क में अधिक वसूली के आरोप हैं।
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Updated: 25 Oct 2026, 5:38 PM IST
Sand Mine Renewal
रायपुर में रेत सिंडीकेट की मनमानी! (Photo Source- Patrika File Photo)

Sand Mine Renewal: रायपुर और आसपास के इलाकों में रेत खदानों के संचालन और आवंटन की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि जिले के आठ प्रमुख रेत घाटों से अब तक कितनी रेत निकाली गई, निर्धारित सीमा से अधिक खनन तो नहीं हुआ और पुराने ठेकेदारों ने तय शर्तों का कितना पालन किया, इसका पूरा हिसाब सामने आए बिना ही खदानों के रिनिवल और नए टेंडर की तैयारी की जा रही है। दूसरी ओर, रेत की कीमतों को लेकर भी मनमानी के आरोप लग रहे हैं। दावा है कि सरकारी दर पर 5,500 रुपये में मिलने वाली रेत के लिए बाजार में 10 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं।

Sand Syndicate Raipur: सीमांकन पूरा होने से पहले रिनिवल की तैयारी पर सवाल

रेत खदानों के सीमांकन का उद्देश्य खनन क्षेत्र की वास्तविक सीमा तय करना और यह पता लगाना है कि संबंधित घाट से निर्धारित मात्रा के अनुसार ही रेत निकाली गई है या नहीं। इसके जरिए यह भी आकलन किया जाता है कि कहीं तय सीमा से बाहर या निर्धारित मात्रा से अधिक खनन तो नहीं हुआ है। आरोप है कि रायपुर जिले के आठ प्रमुख रेत घाटों का सीमांकन और खनन का पूरा हिसाब स्पष्ट होने से पहले ही आगे की आवंटन प्रक्रिया बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पुराने खनन का आकलन पूरी तरह सामने नहीं आया है, तो नए सिरे से रिनिवल या टेंडर की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। रेत घाटों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होना इसलिए भी जरूरी है, ताकि खनन की निर्धारित सीमा का पालन सुनिश्चित किया जा सके और सरकारी नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जा सके।

सरकारी दर 5,500 रुपये, बाजार में 10 हजार तक कीमत का आरोप

रेत की कीमतों को लेकर भी उपभोक्ताओं और कारोबारियों के बीच नाराजगी की बात सामने आ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 500 घनफीट रेत से भरी एक हाइवा की सरकारी दर 5,500 रुपये बताई जा रही है। हालांकि, आरोप है कि कुछ जगहों पर इसी मात्रा की रेत के लिए 10 हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं। यदि सरकारी दर और बाजार में वसूली जा रही कथित कीमत के बीच इतना अंतर है, तो इसका सीधा असर मकान बनाने वाले लोगों और निर्माण कार्य कराने वालों पर पड़ सकता है।

रेत की कीमत बढ़ने से निर्माण की लागत भी बढ़ती है, जिसका बोझ आखिरकार आम लोगों को उठाना पड़ता है। हालांकि, अलग-अलग स्थानों पर बताई जा रही कीमतों और वसूली की शिकायतों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी दर में परिवहन समेत कौन-कौन से शुल्क शामिल हैं और अलग से किन मदों में राशि ली जा रही है।

650 रुपये की लोडिंग के बदले 3 हजार तक वसूली की शिकायत

रेत की कीमत के साथ लोडिंग शुल्क को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि विभाग की ओर से निर्धारित 650 रुपये के लोडिंग शुल्क के मुकाबले कुछ मामलों में एक वाहन से 3,000 रुपये तक लिए जा रहे हैं। यदि निर्धारित शुल्क से अधिक राशि वसूली जा रही है, तो इसकी जांच और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि लोडिंग के नाम पर कितनी राशि लेने की अनुमति है और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित घाट संचालकों या अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी। रेत की वास्तविक कीमत, लोडिंग शुल्क और परिवहन लागत को अलग-अलग स्पष्ट करने से उपभोक्ताओं को यह समझने में मदद मिलेगी कि उनसे किस मद में कितनी राशि ली जा रही है।

ऑनलाइन की जगह ऑफलाइन टेंडर पर भी उठे सवाल

रेत घाटों के आवंटन की प्रक्रिया को लेकर भी पारदर्शिता का मुद्दा उठ रहा है। आम तौर पर ऑनलाइन ई-टेंडर प्रक्रिया में अधिक लोगों को भाग लेने का अवसर मिलता है और बोली से जुड़ी जानकारी डिजिटल माध्यम से दर्ज होती है। वहीं, ऑफलाइन टेंडर की प्रक्रिया को लेकर कुछ स्थानीय कारोबारियों और जानकारों ने आशंका जताई है कि इससे प्रतिस्पर्धा सीमित हो सकती है और प्रभावशाली कारोबारियों को फायदा मिल सकता है।

आरोप है कि ऑफलाइन प्रक्रिया होने पर सीमित लोगों की भागीदारी से रेत कारोबार में पहले से सक्रिय समूहों का दबदबा बना रह सकता है। हालांकि, केवल ऑफलाइन टेंडर होने के आधार पर किसी सिंडीकेट या अनियमितता की पुष्टि नहीं होती। इसके लिए टेंडर की शर्तों, आवेदन करने वालों की संख्या, बोली प्रक्रिया और आवंटन के आधार की जांच जरूरी होगी। ऐसे में विभाग के सामने चुनौती है कि घाटों के आवंटन में पारदर्शिता बनाए रखते हुए सभी पात्र आवेदकों को समान अवसर उपलब्ध कराए।

बारिश के बाद सीमांकन करना क्यों जरूरी?

बरसात के दौरान नदियों में पानी का बहाव बढ़ने और रेत के नए जमाव के कारण घाटों की स्थिति बदल सकती है। ऐसे में पुराने खनन क्षेत्र और बारिश के बाद जमा हुई नई रेत का वैज्ञानिक आकलन करना महत्वपूर्ण होता है। सीमांकन से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि पहले कितना खनन हुआ और आगे कितनी मात्रा में रेत निकालने की अनुमति दी जा सकती है।

यदि यह प्रक्रिया पूरी किए बिना आवंटन से जुड़ा फैसला लिया जाता है, तो पुराने खनन का सही आकलन करने और नियमों के पालन की निगरानी में कठिनाई हो सकती है। इसलिए रिनिवल या नए टेंडर से पहले सीमांकन, खनन रिकॉर्ड और निर्धारित मात्रा से जुड़े दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।

Sand Loading Charges: खनिज विभाग का पक्ष: जल्द पूरा होगा सीमांकन

इस मामले में खनिज विभाग के उप संचालक राजेश मालवे का कहना है कि रेत घाटों का सीमांकन करने की प्रक्रिया चल रही है और इसे जल्द पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि टेंडर ऑनलाइन के बजाय ऑफलाइन प्रक्रिया से कराया जाएगा। इसके लिए इसी सप्ताह औपचारिक विज्ञापन जारी किए जाने की संभावना है। विभाग के इस बयान के बाद अब सीमांकन पूरा होने की समय-सीमा और टेंडर की शर्तों पर नजर रहेगी। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पुराने खनन का हिसाब, निर्धारित मात्रा और शुल्क से जुड़ी जानकारी कितनी स्पष्टता के साथ सार्वजनिक की जाती है।

आम लोगों को पारदर्शी व्यवस्था का इंतजार

रेत निर्माण कार्यों की एक जरूरी सामग्री है। इसकी कीमत और उपलब्धता में होने वाला बदलाव सीधे मकान बनाने वाले परिवारों, ठेकेदारों और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों को प्रभावित करता है। ऐसे में रेत घाटों का सीमांकन, खनन का रिकॉर्ड, सरकारी दर और लोडिंग शुल्क स्पष्ट होना जरूरी है। अब देखना होगा कि खनिज विभाग सीमांकन की प्रक्रिया कब पूरी करता है और आगामी टेंडर में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है। साथ ही, सरकारी दर से अधिक वसूली की शिकायतों की जांच होती है या नहीं, यह भी इस पूरे मामले का अहम पहलू रहेगा।

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25 Oct 2026, 5:38 PM IST
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