
Rakshabandhan Special: कहते हैं भाई-बहन का रिश्ता दुनिया के सबसे पवित्र रिश्तों में से एक होता है। राखी का त्योहार इसी प्यार और विश्वास की डोर का प्रतीक है। रायपुर की एक बहन ने रक्षाबंधन पर ऐसा फैसला लिया, जिसने भाई-बहन के रिश्ते की एक अनोखी मिसाल कायम कर दी। 36 वर्षीय बहन ने अपनी एक आंख की कॉर्निया 17 वर्षीय छोटे भाई को दान कर उसकी अंधेरी दुनिया में फिर से रोशनी भर दी। 28 अगस्त को रक्षाबंधन है। इस मौके पर यह कहानी भाई-बहन के रिश्ते और त्याग की ऐसी मिसाल है, जो हर किसी को भावुक कर देती है।
राजधानी रायपुर के एक परिवार के 17 वर्षीय युवक राजीव का नाम बदला हुआ है। वह एक निजी कंपनी में काम करता था। हंसमुख, मेहनती और परिवार का लाडला राजीव करीब एक साल पहले सड़क हादसे का शिकार हो गया। ऑफिस से घर लौटते समय तेज रफ्तार ट्रक ने उसकी बाइक को टक्कर मार दी। हादसे में उसके सिर पर गंभीर चोट आई। जान तो बच गई, लेकिन दोनों आंखों की रोशनी चली गई।
डॉक्टरों के मुताबिक उसकी दोनों कॉर्निया गंभीर रूप से खराब हो चुकी थीं और रोशनी लौटने की उम्मीद बेहद कम थी। हादसे के बाद राजीव की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। जो युवक हमेशा हंसता-मुस्कुराता था, वह अब दिनभर चुपचाप बैठा रहता था। वह अक्सर अपनी दीदी से कहता था, “दीदी, अब मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, अब मैं क्या करूंगा?”
भाई की हालत उसकी बड़ी बहन सुनीता (बदला हुआ नाम) से देखी नहीं जा रही थी। सुनीता की शादी 11 साल पहले हो चुकी है और वह दो बच्चों की मां है, लेकिन भाई के प्रति उसका प्यार आज भी बचपन जैसा ही है। भाई की परेशानी देखकर उसने डॉक्टरों से पूछा कि क्या वह अपनी एक आंख की कॉर्निया अपने भाई को दान कर सकती है। डॉक्टरों ने उसे समझाया कि एक आंख की रोशनी के साथ भी इंसान सामान्य जीवन जी सकता है।
इसके बाद सुनीता ने अपना फैसला कर लिया। उसने पति और बच्चों से बात की। शुरुआत में परिवार ने इसका विरोध किया, लेकिन भाई के लिए बहन के प्यार और उसके फैसले के आगे सभी मान गए। सुनीता ने कहा कि बचपन में उसका भाई हमेशा उसकी रक्षा करता था। आज जब उसकी आंखों की रोशनी चली गई है तो भाई के लिए कुछ करना उसका फर्ज है।
नेत्र रोग विशेषज्ञों की टीम ने सुनीता की कॉर्निया राजीव को ट्रांसप्लांट की। ऑपरेशन के बाद चार दिन तक डॉक्टरों की निगरानी में रहने के बाद जब राजीव की आंखों से पट्टी खोली गई तो उसे धुंधला ही सही, लेकिन दिखाई देने लगा। उसने सबसे पहले सामने खड़ी अपनी दीदी को देखा। बहन को देखते ही राजीव भावुक हो गया और उससे लिपटकर रोने लगा। राजीव ने कहा, “दीदी, तुमने तो मुझे नई जिंदगी दे दी।” यह भावुक पल देखकर वहां मौजूद डॉक्टर और नर्स भी भावुक हो गए। अब राजीव धीरे-धीरे चीजों को देख पा रहा है और सामान्य जिंदगी की ओर लौट रहा है।
नेत्रदान और कॉर्निया ट्रांसप्लांट में डोनर और मरीज की पहचान गोपनीय रखी जाती है। इसी वजह से इस कहानी में भाई और बहन के नाम बदल दिए गए हैं।
प्रदेश में 25 अगस्त से 8 सितंबर तक नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इस दौरान रायपुर के आंबेडकर अस्पताल को अब तक तीन आंखें दान में मिल चुकी हैं। 25 अगस्त को धमतरी जिले के एक नेत्र सहायक पिता ने अपने दिवंगत बेटे की आंखें खुद निकालकर आंबेडकर अस्पताल में दान कीं। उनका उद्देश्य भी यही था कि किसी जरूरतमंद की अंधेरी दुनिया में रोशनी लाई जा सके।
सीनियर नेत्र सर्जन और पूर्व कुलपति डॉ. एके चंद्राकर का कहना है कि नेत्रदान महादान है। इसके लिए समाज में मौजूद अंधविश्वास और भ्रांतियों को दूर करने की जरूरत है। पहले की तुलना में नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन कई गलत धारणाएं आज भी लोगों को नेत्रदान से रोकती हैं।
डॉ. चंद्राकर के अनुसार, बहन द्वारा अपने भाई को कॉर्निया दान करने का मामला बेहद दुर्लभ है। यह भाई-बहन के रिश्ते में त्याग और समर्पण की असाधारण मिसाल है।