
रायपुर@संतराम साहू। Smart City Project: प्रदेश के शहरों को आधुनिक सुविधाओं से लैस कर स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने का सपना करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद पूरी तरह साकार नहीं हो पाया है। राजधानी और न्यायधानी बिलासपुर में स्मार्ट सिटी की परिकल्पना के अनुरूप कार्य नजर नहीं आ रहे हैं, वहीं नवा रायपुर में अधोसंरचना के विकास पर जोर देने के बाद भी लोगों की बसाहट अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है।
स्मार्ट सिटी बनाने के दौरान जो प्लान तैयार किए गए थे वह सब हवा-हवाई ही साबित हुए। एक भी बड़े प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतरे। न सड़कें, न बाजार और रही रहवासी क्षेत्रों को स्मार्ट सिटी के अनुरूप विकासित कर पाए। अब शहरों के विकास और उन्नयन के लिए अर्बन फंड चैलेंज योजना के तहत नए सिरे से कार्ययोजना तैयार करने की कवायद की जा रही है।
स्मार्ट सिटी परियोजना का उद्देश्य शहरों में बेहतर सड़कें, सुव्यवस्थित यातायात, आधुनिक नागरिक सुविधाएं, स्वच्छता, बेहतर जल निकासी और तकनीक आधारित शहरी प्रबंधन विकसित करना था। लेकिन रायपुर और बिलासपुर में इन उद्देश्यों के अनुरूप व्यापक बदलाव नहीं दिखने से परियोजना की उपयोगिता और खर्च को लेकर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं।
नवा रायपुर में सड़कों, शासकीय भवनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास पर काम हुआ है। इसके बावजूद शहर में आम लोगों की बसाहट को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई है। किसी भी नए शहर की सफलता केवल अधोसंरचना तैयार करने से नहीं, बल्कि वहां रोजगार, आवास, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की सुविधाओं के साथ स्थायी आबादी विकसित होने से तय होती है।
शहरों के अधूरे विकास को गति देने के लिए अब अर्बन फंड चैलेंज योजना के तहत उन्नयन की तैयारी की जा रही है। इस पहल के जरिए शहरी अधोसंरचना को मजबूत करने, नागरिक सुविधाओं में सुधार लाने और शहरों को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में काम किए जाने की उम्मीद है।
स्मार्ट सिटी के कार्यों और खर्च को लेकर पहले शिकायतें करने वालों की भूमिका भी अब सवालों के घेरे में है। आरोप है कि सत्ता में आने के बाद जिन लोगों ने इन मामलों में शिकायतें की थीं, वे ही जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सक्रिय नहीं दिखे। बता दें कि स्मार्ट सिटी के कार्यों को लेकर नगर निगम रायपुर में कांग्रेस का शासन था। उस दौरान विपक्ष में भाजपा थी। नेताप्रतिपक्ष से लेकर पार्षदों ने खूब हल्ला बोला था। साथ ही क्षेत्र के सांसद, विधायक के साथ दिल्ली तक पहुंचकर शिकायतों का पुलिंदा केंद्रीय मंत्री तक को सौंपा था, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
तीनों शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 9,627.70 करोड़ की कुल परियोजना लागत स्वीकृत थी। मार्च 2023 तक 476 कार्यादेशों के तहत 2,644.44 करोड़ के काम आवंटित किए गए थे, जबकि वास्तविक व्यय 1,213.12 करोड़ दर्ज हुआ। यह रिपोर्ट कैग की है।
अरुण साव, नगरीय प्रशासन मंत्री के मुताबिक, स्मार्ट सिटी के कार्यों में कांग्रेस ने जमकर भ्रष्टाचार किया है। स्मार्ट सिटी के अनुरूप एक भी कार्य नहीं किए है। अब हमारी सरकार में प्रमुख शहरों को विकसित के अनुरूप बुनियाद सुविधाएं मुहैया कराने का काम किया जा रहा है।